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राजनीति एक प्रकार का व्यापार बन गयी है। पहले वोट खरीदने में निवेश किया जाता है। सट्टा खरा उतरने पर घूस के माध्यम से निवेश की गई रकम को वसूल किया जाता है। मतदाता भी व्यापार करता है। वह सड़क अथवा साड़ी के एवज में वोट देता है। वर्तमान में यह व्यापार नेताओं के पक्ष में झुका हुआ है। नेताजी को लाभ अधिक और मतदाता को कम मिल रहा है। उपाय ढूंढ़ना है कि इस व्यापार को मतदाता के पक्ष में कैसे मोड़ा जाए। प्रतिस्पर्धा से हर व्यापार पर नियंत्रण स्थापित होता है। जैसे नुक्कड़ पर एक अकेला आटो रिक्शा खड़ा हो तो वह मनमाना भाड़ा वसूल करता है। पांच रिक्शा वाले खड़े हों तो भाड़ा स्वत: नीचे आ जाता है। यह सिद्धान्त राजनीति पर भी लागू होता है। यदि गम्भीर प्रत्याशियों की संख्या अधिक होगी तो मतदाता उसे चुनेगा जिससे उसे अधिकतम लाभ मिलेगा। जैसे कई दुकान हों तो उपभोक्ता उस दुकान से माल खरीदता है जो अच्छा और सस्ता माल दे। अत: नेताओं पर अंकुश लगाने के लिये जरूरी है कि गम्भीर प्रत्याशियों की संख्या में वृद्धि की जाए।
वित्तीय मदद के तरीके
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये नये गम्भीर प्रत्याशियों को वित्तीय मदद देना चाहिये। उद्योग के क्षेत्र से उदाहरण लें। छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहन देने के लिये 'कैपिटल सब्सिडी स्कीम' चलाई गयी थी। इन्हें 'टैक्स' की छूट दी जाती है। उद्देश्य है कि बड़ी कम्पनियों के सामने खड़े होने के लिये छोटे उद्यमी को सहारा चाहिये। छोटा उद्यमी खड़ा हो जाये तो वह बाद में बड़े को भी मात दे सकता है। इसी प्रकार नये गम्भीर प्रत्याशियों को समर्थन देने की जरूरत है जिससे स्थापित नेताओं की 'मोनोपोली' को चुनौती दी जा सके। इन संसाधनविहीन गंभीर प्रत्याशियों को वित्तीय मदद को देने के कई तरीके हो सकते हैं। एक, यह कि पिछले चुनाव में जितने वोट मिले हों उनके अनुसार मदद दी जाए। दूसरा, हर मतदाता को एक वाउचर दिया जा सकता है। प्रत्याशी द्वारा जितने वाउचर एकत्रित किये जा सकें, उतनी रकम उसे दे दी जाये। और भी रास्ते खोजे जा सकते हैं। पर मुख्य बात यह है कि नेताओं पर अंकुश लगाने के लिये नए गम्भीर प्रत्याशियों को प्रोत्साहन देना चाहिये।
राजनीतिक भ्रष्टाचार में वृद्धि का दूसरा कारण है कि हमने लोकतंत्र को पार्टी तंत्र में बदल दिया है। किसी विषय पर अपना मन्तव्य बनाने के पहले विधायक और सांसदों द्वारा पार्टी के नेताओ से हरी झंडी लेना आवश्यक हो गया है। जन प्रतिनिधि स्वयं अपनी बुध्दि से कार्य नहीं कर सकता है। वास्तव में मतदाता द्वारा जन प्रतिनिधि को नहीं, पार्टी को चुना जाता है। मतदाता को दो या तीन पार्टी के बीच चयन करना होता है। जनता को मात्र यह अधिकार रह गया है कि पार्टियों द्वारा प्रस्तुत 'मीनू' में से एक का चयन करें। जनता अपना मीनू नहीं बना सकती है। लोकतंत्र पर पार्टियों के इस शिकंजे को तोडने के लिये सुझाव है कि ईमानदार लोग स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ें। इन प्रत्याशियों का संकल्प होगा कि वे किसी भी पार्टी को समर्थन नहीं देंगे और हर विषय पर अपना स्वतंत्र मत डालेंगे। इससे सरकार सदा अल्पमत में रहेगी। किसी भी कानून को पारित कराने के लिये सत्तारूढ़ पार्टी को इन स्वतंत्र सांसदों में से कुछ का समर्थन प्राप्त करना ही होगा। इन स्वतंत्र सांसदों द्वारा डाला गया मत जनता की आवाज के अनुरूप हो सकता है, चूंकि ये पार्टी के अंकुश के बाहर होंगे।
समस्या है कि पिछले 60 वर्षों में स्वतंत्र प्रत्याशियों की गति निराशाजनक रही है, हमें इससे हतोत्साहित नहीं होना चाहिये। चूंकि वर्तमान स्वतंत्र प्रत्याशी पार्टी से व्यक्तिगत समीकरण न बैठने के कारण स्वतंत्र के रूप में चुनाव लड़ते हैं। इनकी वैचारिक विशेषता नहीं है। प्रस्तावित स्वतंत्र प्रत्याशियों के समूह को जनता को समझाना होगा कि हम सब मिलकर सरकार पर नियंत्रण करेंगे।
ऐसे लग सकती है लगाम
भ्रष्टाचार नियंत्रण का तीसरा पहलू सत्तारूढ़ नेताओं पर अंकुश लगाने का है। संविधान में राष्ट्रपति, नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक केन्द्रीय सतर्कता आयोग जैसे कई पदों की स्थापना की गई है, जो कि स्वतंत्र हैं। परन्तु इन पदों पर आसीन लोगों के द्वारा सरकार की ही भाषा बोली जाती है। कारण कि इन व्यक्तियों की नियुक्ति उन्हीं सरकार के द्वारा की जाती है जिसके गलत कार्यों पर इन्हें अकंुश लगाना है। जैसे किसी चोर द्वारा नियुक्त सिपाही चोरी नहीं रोक सकता है, उसी प्रकार भ्रष्ट नेताओं के द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी भ्रष्टाचार को नहीं रोक सकते हैं। लोकपाल कानून यदि पारित हो गया तो उसके परिणाम भी ऐसे ही होंगे। नियुक्ति की प्रक्रिया में विपक्ष की भागीदारी से परिस्थिति में मौलिक अंतर नहीं पड़ेगा। कई संवैधानिक पदों पर नियुक्ति करते समय वर्तमान में भी विपक्ष की राय ली जाती है, परन्तु यह निष्प्रभावी ही है।
इन पदों पर नियुक्ति की दूसरी प्रक्रिया अपनानी चाहिये। ऐसी प्रक्रिया बनानी होगी जो कि कानून के दायरे में हो परन्तु सरकार के दायरे के बाहर हो। जैसे भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति सभी राज्यों के बार काउंसिल के अध्यक्षों के समूह द्वारा की जा सकती है। इस प्रक्रिया से नियुक्त मुख्य न्यायाधीश पर सरकारी आकाओं का दबाव कम रहेगा। अथवा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति चार्टर्ड अकाउंटेन्ट्स इन्स्टीट्यूट एवं चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्षों के समूह के द्वारा की जा सकती है। राष्ट्रपति को सीधे जनता द्वारा अमरीकी पद्धति के अनुरूप चुना जा सकता है। इस प्रक्रिया से स्वतंत्र व्यक्तियों के पदासीन होने की संभावना अधिक होगी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण में कुछ सफलता मिल सकती है। डा. भरत झुनझुनवाला











