दिंनाक: 08 Jun 2013 13:14:46 जय बोलें भारतमाता की कैग उधेड़ रहा है परतें नित्य नए घोटालों की। चिकने-चुपड़े चेहरों की, सत्ता के सपड़दलालों की ।।1।। जिनने छीनी भारत माता के मुखमण्डल की लाली। बलिदानी वीरों के सपनों के महलों की खुशहाली।।2।। इनको कोई भय न रहा अब न्यायिक दण्ड-विधानों का। क्योंकि प्रभावित करता उनको मन सत्ताधिष्ठानों का।।3।। यह विडम्बना देख बढ़ीं सामाजिक उच्छृंखलताएं। विदेशियों की घुसपैठें, आतंकवर्धिनी घटनाएं ।।4।। दुष्कर्मों, हत्या-अपराधों के कारण ये ही तो हैं। भाषा कोई भी हो लेकिन, उच्चारण ये ही तो हैं।। 5।। कब तक चुप रहकर बोलो, हम ये त्रासदियां ढोएंगे? कायर बनकर कब तक यों दुर्भाग्यों पर ही रोएंगे?66।। पानीदारों को अपना चिन्तन खंगालना ही होगा। किसी युक्ति से उन्हें मुक्ति का पथ निकालना ही होगा।।7।। कई मोरचों पर इन बटमारों से हमको लड़ना है। क्या समाज, क्या संविधान, सबको मिल आगे बढ़ना है।।8।। न्यायालय अति शीघ्र करें निस्तारित इन मक्कारों को। और, लोक भी करें बहिष्कृत दुष्टों के परिवारों को।।9।। जो इनको संरक्षण देते हैं, उनको भी पहचानें। उनके आकाओं को अपना दुश्मन नम्बर वन मानें।।10।। उन्हें प्रशासन, सत्ता की कुर्सी तक जाने से रोकें। इस निमित्त ईश्वर ने जितनी दी, वह सब ताकत झोंकें।।11।। उसको सौंपे देश कि जिसका ओजस् प्रकट प्रभावी हो। सुनकर जिसका नाम अमंगल कोई कहीं न हावी हो।।12।। जोड़ राष्ट्र से राजधर्म जो मोद बढ़ाये प्राणों का। कर्मठता का बने भगीरथ, प्रेरक जन कल्याणों का।। 13।। अभिलाषा पूरी हो सच्चे भारत-भाग्य-विधाता की। सभी कण्ठ एकस्वर में जय बोलें भारतमाता की।। 14।। आचार्य देवेन्द्र देव