|
अभी पिछले दिनों भारत–चीन सीमा पर विवाद गहरा हो गया था। चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत एक बार फिर भारत में घुस आया था और भारत सरकार की काफी मनुहार के बाद वापस गया था। उसके बाद भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद चीन की यात्रा पर गए और अब 19 मई से 21 मई तक 3 दिवसीय भारत यात्रा पर आए थे चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग। इस दौरान संबंध को सुधारने और द्विपक्षीय सम्बंधों को मजबूत करने के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए। चीन की आक्रामक कूटनीति और दोगले व्यवहार का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण यहां प्रस्तुत है –
भारत की स्वतंत्रता के एक दशक बाद एक भारतीय विद्वान ने चीन
की विस्तारवादी नीति तथा नीयत का विश्लेषण करते हुए भारत के सन्दर्भ में चीन के 'खूनी पंजे' की बात कही थी। उन्होंने कहा था 'तिब्बत एक हथेली है, लद्दाख, भूटान, सिक्किम, नेपाल व असम चीनी हाथ की पांच अंगुलियां हैं।' चीन की इस मानसिकता को और अधिक स्पष्ट किया था चीन के प्रधानमंत्री चाऊ इन लाई ने, स्वयं 23 जनवरी, 1959 को भारत के प्रधानमंत्री पं. नेहरू को लिखे एक पत्र में, 'सर्वप्रथम मैं यह बताना चाहूंगा कि चीन-भारत सीमा कभी भी निश्चित नहीं की गई।' (देखें, नोट्स, मेमोरण्डम एण्ड लैटर्स एक्सचेंजेड़, एण्ड एग्रीमेन्ट्स साइन्ड विट्विन द गर्वमेन्ट ऑफ इण्डिया एण्ड चाइना 1954-1959, व्हाइट पेपर, 1959, पृ. 52-53)
ऐतिहासिक सन्दर्भ में देखें तो यह साफ होता है कि बीसवीं शताब्दी के मध्य चीन तथा भारत — दो प्राचीन राष्ट्रों को स्वतंत्रता विश्व इतिहास की परिवर्तनकारी घटना थी। भारत ने अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भुलाकर पाश्चात्य राजनीतिक आर्थिकवाद को अपनाया जबकि चीन ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को छोड़कर मार्क्सवादी राजनीतिक व्यवस्था का रास्ता अपनाया। चीन के निरंकुश तथा अधिनायकवादी शासक माओत्से तुंग तथा चाउ एन लाई ने अपनी सीमाओं तथा प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के लिए निरन्तर घुसपैठ, अचानक आक्रमण तथा पड़ोसी देशों को भयभीत रखने का मार्ग अपनाया जबकि भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने अपनी अन्तरराष्ट्रीय ख्याति तथा नेतृत्व की चाह में तटस्थता तथा विश्व शांति का नारा लगाया। स्पष्ट है कि दोनों देशों के मार्ग भिन्न थे।
चीन की आक्रामक नीति
चीन की विस्तारवादी नीति सदैव उनकी मानसिकता तथा क्रियाकलापों का एक भाग रही है। उसने 7 अक्तूबर, 1950 को ही तिब्बत में अपनी सेनाएं भेजकर आक्रामक नीति का परिचय दिया था। पं. नेहरू नेे इस पर आश्चर्य जताया तो चीन के उन्हें गालियां दीं। फिर चीन ने भारत की मुख्य सीमा में घुसपैठ प्रारम्भ की, भारत सरकार ने प्रारम्भ में अपनी जनता से इन घसपैठों के निरन्तर क्रम को छिपाया। इसका रहस्योद्घाटन तब तक हुआ जब भारत सरकार को श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर्स) प्रकाशित करने के लिए विवश किया गया। पहला श्वेत पत्र 1959 में प्रकाशित हुआ, जिसमें 1954-1959 तक चीनी घुसपैठों, वार्तालापों तथा उसके साथ पत्र-व्यवहार को प्रकाशित किया गया। भारत का चीन से पहला समझौता 29 अप्रैल, 1954 को हुआ जिसमें छह प्रस्ताव थे, जो भारत-चीन के बीच व्यापार, व्यापार केन्द्रों, धार्मिक यात्राओं पर छूट, दर्रों की स्थिति, पासपोर्ट तथा वीजा तथा समझौते की अवधि आठ वर्ष के बारे में प्रस्ताव पारित हुए थे। 15 जून, 1954 को चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई पहली राजकीय यात्रा पर भारत आए। पंचशील की दुहाई दी गई तथा 'हिन्दी-चीनी-भाई-भाई' के नारे लगे। परन्तु इसके डेढ़ महीने पश्चात अर्थात 17 जुलाई, 1954 को चीन ने पहली बार बड़ी घुसपैठ प्रारम्भ की। चीन के कभी 'बूजे' कभी 'होती मैदान', कभी 'देमचोक' क्षेत्र में अपनी सैनिक टुकड़ियां भेजीं।
भारत सरकार ने पहला विरोध पत्र 2 मई, 1956 को भेजा पर चीन ने उसकी कोई परवाह नहीं की। इसी काल में 28 नवम्बर, 1956 को दूसरी बार चाउ एन लाई राजकीय यात्रा पर भारत आए। चीन घुसपैठ का यही क्रम 1957 में भारत के लोहित डिवीजन के केलोंग तक 1958 में लद्दाख तथा बड़ाहोती क्षेत्र में तथा खुर्नाक किले तथा अक्षय चिन (अक्साई चिन) क्षेत्र में होती रही। 1958 में चीन ने जबरदस्ती तिब्बत पर कब्जा कर लिया, जिसे भारतीय पत्रों में 'तिब्बत का बलात्कार' कहा गया। (देखें, द हिन्दुस्थान टाइम्स, 30 मार्च, 1959) साथ ही भारत की दब्बू नीति की कटु आलोचना भी हुई। अप्रैल, 1960 में चाउ एन लाई का तीसरा बार राजकीय यात्रा पर भारत आना हुआ। परिणाम, 20 अक्तूबर, 1962 को चीन का भारत पर सीधा आक्रमण हुआ। 32 दिन बाद अर्थात् 21 नवम्बर, 1962 का चीन ने मनमाने ढंग से युद्ध विराम भी कर दिया। निश्चय ही वह भारत की शर्मनाक हार थी। उसमें भारत के 3840 जवान शहीद हुए। पराजय का मुख्य कारण पं. नेहरू तथा उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन की ढुलमुल नीति तथा अकर्मण्यता थी। ब्रिगेडियर जान पुरुषोत्तम दलवी ने इने इसे अपनी पुस्तक 'हिमालयन बलण्डर' में भारतीय नेताओं को इतिहास से शिक्षा न लेने का कारण बताया। पूर्व वायु सेनाध्यक्ष ए.वाई. टिपणीस ने लिखा “अन्तरराष्ट्रीय नेता बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए पं. नेहरू ने राष्ट्र के सुरक्षा हितों को त्याग दिया। युद्ध में अपमानजनक पराजय के लिए वे उत्तरादायी हैं।'
1962 के बाद भी चीन द्वारा भारतीय सीमा में घुसपैठ रुकी नहीं। उदाहरणत: 1987 में चीन ने समदोरोग चू वेली में घुसपैठ की। दिसम्बर, 1991 में चीनी प्रधानमंत्री ली फेंग भारत आए तथा नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आधार पर सीमा निर्धारण की बात कही गई। यही क्रम 1993 तथा 1996 में भी किया गया। 2003 तथा 2005 में भी ढुलमुल प्रयत्न चलते रहे। आंकड़ों के अनुसार चीन ने 2008 से अब तक लगभग 500 बार घुसपैठ की है। गत 15 अप्रैल, 2013 को भारत-चीनी सीमा के पश्चिम सेक्टर में पूर्वी लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में बर्थे नामक स्थान पर चीनी सैनिकों द्वारा तम्बू गाड़ने तथा 20 दिन बाद उन्हें हटाना उसकी मनमानी का ही प्रमाण है, जिसे चीन के विदेश विभाग की प्रवक्त्ता ले चुनायिंग ने 'फलदायक सलाह' का परिणाम बताया।
चीन के झूठे दावे, वास्तविक कब्जे
चीन की निरंतर घुसपैठ के साथ उसके झूठे तथा तर्कहीन दावे बढ़ते गए। चीन ने 1954 में भारत का 50,000 वर्ग मील क्षेत्र अपना बताया। फिर उसने नेफा ने पांचों डिवीजन को भी अपना बताया। 1959 में पुन: इसे दोहराया। जुलाई, 1962 में उसने 50,000 वर्ग मील क्षेत्र की बजाय 70,000 वर्ग मील पर दावा किया। (देखें, श्वेतपत्र VII 7 जुलाई, 1962 अक्तूबर, 1962 तक) अब यह दावा 1,20,000 वर्ग मील का हो गया है। चीन ने अपनी अत्यधिक आलोचना होने पर इसका प्रतिवाद भी बड़े बचकाने ढंग से किया। जब 18 अक्तूबर, 1954 को चीन मानचित्रों में पचास हजार मील भारतीय भू-भाग दिखाने पर पूछा गया तो चीन ने कहा, 'नक्शे पुराने हैं तथा पीपुल्स रिपब्लिकन चीन को सुधारों का मौका नहीं मिला। इसी भांति चाउ एन लाई ने दूसरी बार भारत आगमन पर कहा कि सीमा का कोई झगड़ा नहीं है। साथ ही कहा कि हम मैकमोहन रेखा को मानते ही नहीं।' परन्तु यह सत्य है कि भारतीय संसद में यह बताया गया कि 1959 में चीन ने 12,000 वर्ग मील भारतीय क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था। इसी भांति अक्तूबर, 1962 के युद्ध के पश्चात 14,000 वर्ग मील पर चीनी अधिकार को स्वीकार किया गया।
भारत की ढुलमुल नीति
जहां चीन ने अपने साम्राज्यवादी अधिनायकवादी प्रशासन के द्वारा भारत के भीतर मनमानी घुसपैठ की तथा आक्रामक रवैया अपनाया, वहीं लोकतांत्रिक भारत प्रारम्भ से ही उसकी खुशामद में लग गया। 1 अक्तूबर, 1949 को चीन में साम्यवादी शासन स्थापित होते ही एशियाई देशों में बधाई देने वाले राष्ट्रों में भारत पहला था। भारत विश्व का एकमात्र राष्ट्र है जिसने चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनाने के लिए नौ बार समर्थन जताया। (देखें, 19 सितम्बर, 1950, 1 फरवरी, 1951, 14 नवम्बर, 1951, 24 अक्तूबर, 1952, 28 सितम्बर, 1953, सितम्बर, 1954, 20 सितम्बर, 1955, 10 नवम्बर, 1956, 13 सितम्बर, 1957) के वक्तव्य। यह वही समय था जब चीन भारत में घुसपैठ कर रहा था या भारतभूमि पर अपना दावा कर रहा था। भारतीय जनता के अत्याधिक दबाव के बाद ही भारत के 13 श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर्स) भारत-चीन सम्बंधों के बारे में प्रकाशित करने पड़े। 1959 में भारत के प्रधानमंत्री ने चीन द्वारा 12,000 मील पर कब्जे का वर्णन करते समय भारतीय संसद में यह भी कहा, 'वहां पर कोई भारतीय नहीं रहता, केवल भारतीय चरवाहे गर्मियों में जाते हैं।' 1962 के चीन के आक्रमण को एक 'पेचीदा योजना' बताया। इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि अपने इस व्यवहार के कारण भारत अपने पड़ोसी देशों को भारत के पक्ष में बोलने की स्थिति में नहीं ला पाया। भारत के पड़ोसी म्यांमार (बर्मा), नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान सभी ने चीन के आक्रमण को चीन की भूमि-विस्तार नीति न कहकर वैचारिक अभिव्यक्ति कहा (देखें, फ्रेडरिक ए ग्रीनहट द्वितीय, 'द तिब्बेटन फ्रंटियर्स क्वशन फ्राम कर्जन दू द कोलम्बो कांफ्रेस पृ. 136)। भारत की चीन के प्रति दब्बू नीति पर परिणाम यह हुआ कि न तो चीनी भारत का सहायक तथा मित्र बन सका और न ही भारत के पड़ोसी उसके साथ रहे। उल्टे पाकिस्तान ने 1963 में पहले चीन को बाल्टिस्तान की भूमि दे दी तथा उसके बाद कब्जे में लिए गए भारतीय कश्मीर के एक तिहाई भाग, अर्थात 5180 वर्ग किलोमीटर भी चीन को सौंप दिया। नेपाल, जो विश्व में एकमात्र 'हिन्दू राष्ट्र' माना जाता था, भारत का उससे ऐतिहासिक संबंध है, उसने नेपाल के काठमाण्डू में तिब्बतियों के गुरू दलाई लामा का कार्यालय बन्द करने, चीन के साथ व्यापारिक तथा सैनिक हथियारों के समझौते होने से वह भारत विरोध के लिए तत्पर हुआ। इतना ही नहीं, चीन के प्रति दब्बू नीति के कारण म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, यहां तक कि मालदीप जैसे देशों का झुकाव चीन की ओर बढ़ रहा है।
गत वर्ष 20 अक्तूबर, 2012 को भारत के रक्षामंत्री ए.के. एन्टोनी द्वारा पचास वर्ष पूर्व चीन के आक्रमण पर भारत के शहीदों को भावभीनी श्रद्धाञ्जलि देना अत्यंत स्वागतयोग्य प्रसंग था। इस पर एन्टोनी ने कहा 'आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। हमने इतिहास से सबक सीख लिया है। भारत अपनी जमीन की सुरक्षा के लिए सक्षम है।' विचारणीय यह भी है कि चीन भी 1962 का चीन नहीं है। क्या भारत के नेताओं ने अब अपनी हीन भावना त्याग दी है? आखिर भारत सरकार ने 28 भागों में प्रकाशित 'हैण्डरसन ब्रुक्स' रपट जो 1962 के युद्ध के बारे में है, क्यों 'गुप्त' रखी है? आवश्यकता है भारत की सेनाओं को नवीनतम शस्त्रों से सुसज्जित किया जाए। चीन के साथ व्यापार सम्बंध कम से कम किया जाए तथा कभी भी सीमा विवाद के समाधान का यह आधार न बने। भारत के जापान की साथ सम्बंध मजबूत हों। तिब्बत को स्वतंत्र कराने के पुन: प्रयास हों। पड़ोसी देशों के साथ प्राचीन सांस्कृतिक-सामाजिक सम्बंधों के आधार पर सम्बंध सुदृढ़ किया जाए। भारत की विदेश तथा रक्षा नीति का आधार चीन द्वारा 15 अप्रैल, 2013 को गाड़े गए तम्बुओं तथा स्वयं बीस दिन बाद उनके उखाड़ने से नहीं, बल्कि 16 अप्रैल को प्रसारित चीन के आठवे श्वेतपत्र' तथा उसमें नियोजित चीन सेनाओं के विस्तार तथा अन्तरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं तथा चहुंओर भारत को घेरने की नीति के कुप्रयासों के सन्दर्भ में देखना होगा
. सतीश चन्द्र मित्तल










