न्यायालय में ध्वस्त हुआ मुलायम का मुस्लिम एजेण्डा
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न्यायालय ने पूछा–मामले को वापस लेने से कैसे सधेगा जनहित?
सरकार की मंशा के अनुसार अभियोजन पक्ष ने मुकद्मों की वापसी के लिए याचिका दी तो न्यायालय ने सवाल खड़ा कर दिया। विशेष जिला एवं सत्र न्यायाधीश कल्पना मिश्रा ने कहा कि आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने वाले व्यक्ति किसी जाति या सम्प्रदाय से नहीं जुड़े होते। उनका एकमात्र उद्देश्य जनता के बीच आतंक फैलाना होता है। याचिका में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे जनहित, न्यायहित, देश की सुरक्षा, साम्प्रदायिक सौहार्द व न्याय व्यवस्था के उद्देश्य से मुकद्मा वापस लिया जा सके। विद्वान न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष की अर्जी खारिज करते हुए अपने आदेश में साफ लिखा कि मामला आतंकवादी गतिविधियों से सम्बन्धित है। अभियुक्तों के खिलाफ पर्याप्त सबूत होने के बाद ही आरोप पत्र पेश किया गया है। इस मामले में सभी सबूत पेश किये जा चुके हैं, अन्तिम साक्षी के तौर पर जांचकर्ता की ओर से गवाही भी समाप्ति की ओर है। ऐसे में अभियोजन की अपील सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं और सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि मात्र राज्य सरकार के आदेश के अनुपालन में मुकद्मा वापसी की अर्जी दी गई है। ऐसे में इस अर्जी को खारिज किया जाता है।
उत्तर प्रदेश की मुस्लिमपरस्त अखिलेश सरकार को बाराबंकी न्यायालय में जोर का झटका दिया है। वाराणसी, लखनऊ और फैजाबाद के के जिला न्यायालय परिसरों में हुए बम धमाकों में शामिल आतंकी तारिक काजमी और खालिद मुजाहिद पर चल रहे मुकद्मों की वापसी के लिए राज्य सरकार की अपील न्यायालय ने खारिज कर दी है। यही नहीं, न्यायालय ने राज्य सरकार की उस दलील को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है जिसमें कहा गया है कि 'सरकार मुकदमों को जनहित में वापस लेना चाहती है।' न्यायालय ने कहा कि जनहित में आतंकियों से जुड़े मुकद्मा वापस करने की सरकार की मंशा समझ से परे है। यह भी पूछा कि ऐसे मुकद्मा वापसी से जनहित कैसे सध रहा है।
उल्लेखनीय है कि इन दोनों आतंकवादियों का संबंध प्रतिबंधित आतंकी संगठन 'हूजी' से है। तीनों न्यायालयों में हुए विस्फोटों में इनकी संलिप्तता के पुख्ता सुबूत मिलने के बाद ही उत्तर प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स (एस.टी.एफ) और आतंकवाद निरोधी दस्ता (ए.टी.एस.) के संयुक्त अभियान में इन दोनों को बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों के पास से प्रतिबंधित हथियार और बड़ी मात्रा में गोला-बारूद बरामद हुए थे। इन पर अन्य आपराधिक धाराओं के अलावा देश विरोधी काम करने का भी पुख्ता आरोप था। पुलिस ने इन्हें बाराबंकी न्यायालय में पेश किया और मुकद्मा शुरू हो गया।
इस बीच मुस्लिम और सेकुलर दलों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि ये दोनों निर्दोष हैं। मुस्लिम परस्त राजनीति शुरू हो गयी। मायावती ने एक जांच आयोग का गठन किया और उस जांच आयोग ने सरकार की मंशा के अनुरूप पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा दिये। हांलाकि मायावती सरकार ने इस सन्दर्भ में चुप रहना ही उचित समझा। फिर विधानसभा चुनाव हुए तो प्रदेश में सपा की सरकार आ गयी और शुरू हो गया मुस्लिम तुष्टिकरण का अभियान। मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में मुलायम के इशारे पर अखिलेश सरकार ने इन दोनों आतंकियों पर से मुकद्मा वापस लेने का फैसला कर लिया।
नई राज्य सरकार की मंशा पर मुकद्मा वापसी की अर्जी के बाद पूरे प्रदेश के वकीलों का रोष चरम पर था और प्राय: सभी वकीलों ने मुकद्मा वापसी का विरोध किया। मामला इतना गम्भीर था कि राज्य सरकार की मंशा के बावजूद जिला प्रशासन और अभियोजन पक्ष की रपट सत्य पर ही आधारित रही। सरकार ने सितम्बर व अक्तूबर, 2012 में इस बारे में जिला प्रशासन से आख्या तलब की थी। अक्तूबर, 2012 में अभियोजन कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजी गयी रपट में पुलिस अधीक्षक के हवाले से कहा गया था कि हूजी जैसे आतंकी संगठन से संबंध रखने वाले इन अभियुक्तों के खिलाफ देशद्रोह जैसा संगीन मामला चल रहा है, जिसमें लगभग सभी गवाहियां पूरी हो चुकी हैं। रपट में यह भी कहा गया कि इस मामले की तहकीकात करने वाले आतंकवाद निरोधी दस्ते के क्षेत्राधिकारी रहे राजेश श्रीवास्तव की गवाही चल रही है। इसके बाद केवल औपचारिक गवाही होनी शेष है। ऐसे में मुकद्में की वापसी उचित नहीं होगी। इसी तरह 10 अक्तूबर, 2012 को शासन को भेजी अपनी रपट में मामले की पैरवी कर रहे तत्कालीन अतिरिक्त जिला अभियोजन अधिकारी (अपराध) कैलाश नारायण श्रीवास्तव ने स्पष्ट लिखा था कि जनहित और राष्ट्रहित के मद्देनजर मुकद्मा वापसी योग्य नहीं है। यह भी कहा गया था कि अभियुक्तों का सम्बन्ध प्रतिबन्धित आतंकी संगठनों से है। राष्ट्र में अपराध फैलाना और उसे कमजोर करना उनका मुख्य उद्देश्य है। इन सबके बावजूद राज्य सरकार ने अभियोजन पक्ष को मुकद्मा वापसी के लिए न्यायालय में अर्जी देने का निर्देश दिया। इसी क्रम में अतिरिक्त जिला अभियोजन अधिकारी विनोद कुमार द्विवेदी ने 3 मई को मुकद्मा वापस करने की अर्जी दी थी, जिसे न्यायालय ने 10 मई को खारिज कर दिया। शशि सिंह
आजम खां 'दु:खी'
उत्तर प्रदेश के कट्टरवादी मुस्लिम नेता और सरकार के वरिष्ठ मंत्री आजम खां न्यायालय के फैसले से बेहद आहत बताये जाते हैं। क्योंकि इस मामले में किरकिरी होने पर उनकी राजनीति कमजोर पड़ सकती है। वे स्वयं को पूरे देश में गैरकांग्रेसी राजनीतिक क्षेत्र में सबसे बड़ा मुस्लिम नेता मानते हैं। न्यायालय के फैसले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायालय के अपने अधिकार हैं और सरकार के अपने अधिकार। सरकार को कोई बेगुनाह लगता है तो पुलिस जांच कराने के बाद वह मुकद्मा वापस लेती है। उन्होंने कहा कि बेगुनाहों को न्याय देने की प्रक्रिया नहीं रुकनी चाहिए, क्योंकि न्याय नहीं मिलता है तभी आतंकवाद फैलता है। यह फैसला सरकार के लिए झटका नहीं है, पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए हम उच्च न्यायालय जाएगे।
राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने कहा-
दोषियों को मिले कड़ी सजा
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने बाराबंकी न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक मिहिरध्वज ने कहा कि न्यायालय को पर्याप्त सबूत मिले थे। राज्य सरकार की ओर से पहले भेजी गयी रपट में दोनों पर आरोपों का पर्याप्त आधार है। मुलायम सरकार मुस्लिम वोटों के चक्कर में ऐसे मुसलमानों का समर्थन कर रही है जो देशहित में काम नहीं कर रहे हैं। सरकार का यह कदम देशहित में सोचने वाले मुसलमानों का प्रकारान्तर से अपमान है। न्यायालय ने पर्याप्त सबूतों को देखते हुए मुकद्मा वापसी की अर्जी खारिज करने का जो फैसला लिया है, वह उचित है। उन्होंने यह भी कहा कि दोषियों को हर हाल में कड़ा दण्ड मिलना ही चाहिए।
क्या था मामला?
l 23 नवम्बर, 2007 को प्रदेश के तीन न्यायालय परिसरों- लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी में करीब-करीब एक साथ बम धमाके हुए। इनमें कई लोगों की मौत हो गयी थी और अन्य अनेक घायल हो गये थे।
l धमाकों के दो आरोपियों-तारिक काजमी (निवासी सम्मोपुर, थाना रानी की सराय-आजमगढ़) और खालिद मुजाहिद (निवासी मोहल्ला मडियाहू, थाना मडियाहू-जौनपुर) की 22 दिसम्बर, 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर एसटीएफ और एटीएस ने संयुक्त रूप से गिरफ्तारी की थी। इन दोनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 121 ए/122/124ए/332 एवं 4/5 विस्फोटक पदार्थ अधिनियम व 16/18/20/23 विधि विरुद्ध अधिनियम के तहत विवेचक राजेश कुमार श्रीवास्तव ने 20 मार्च, 2008 को आरोप पत्र दाखिल किया था।
l अब तक इस मामले में सात गवाहों के बयान हो चुके हैं। विवेचक राजेश कुमार श्रीवास्तव से जिरह पिछले छ: पेशियों से चल रही है और 83 पृष्ठों का बयान दर्ज हो चुके हैं।
l मामले में गवाही के लिए अगली सुनवाई की तारीख 31 मई, 2013 रखी गयी है।
अभी और झटके लगेंगे
मुस्लिमपरस्त राज्य सरकार अभी और भी खेल खेल सकती है, क्योंकि उसे लोकसभा चुनावों के मद्देनजर मुस्लिम वोटों की दरकार है। प्रदेश में कई ऐसे मामलें है जिनमें मुकद्में की वापसी की पहल को फिलहाल विराम लग सकता है, जैसे-
l रामपुर में सीआरपीएफ शिविर पर हुए हमले में शामिल रहे गुलाब कौसर का मुकद्मा। इसमें भी हंगामा हो रहा है। उस हमले में सीआरपीएफ के सात जवान मारे गये थे।
l कानपुर के वकार महमूद और उनकी मददगार सितारा बेगम का मुकद्मा। इन पर आईएसआई का एजेण्ट होने और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप है। 'आफीशियल सीक्रेट एक्ट' के तहत मुकदमा चल रहा है।
l कानपुर के इम्तियाज अहमद पर भी 'आफीशियल सीक्रेट एक्ट' के तहत मुकदमा चल रहा है। इस पर भी आईएसआई का ऐजेण्ट होने तथा पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप है।
आतंकवादियों के गढ़
उत्तर प्रदेश आतंकवादियों के गढ़ के रूप में कुख्यात होता जा रहा है। दिल्ली और दक्षिण के आन्ध्र प्रदेश व महाराष्ट्र के बाद सर्वाधिक असुरक्षित प्रदेश के रूप में इसकी गणना की जाने लगी है। फैजाबाद, गोरखपुर और वाराणसी के न्यायालयों परिसरों के अलावा रामपुर में सीआरपीएफ कैम्प पर हमला और अयोध्या में रामजन्मभूमि परिसर में घुसने के लिए पांच आतंकवादियों द्वारा हमले की घटनायें प्रमुख हैं। इनके अलावा काशी और गोरखपुर में पहले भी किये गये आतंकी हमलों की घटनाएं भी प्रमुखता से याद की जाती हैं। उत्तर प्रदेश की जेलों में इस समय कुल 54 आरोपी आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप में बन्द हैं। ये सभी मुसलमान हैं। इन आतंकियों में से 24 आतंकी पाकिस्तान मूल के हैं। सबसे ज्यादा आतंकी लखनऊ जेल में निरुद्ध हैं। इसके अलावा वाराणसी, उन्नाव, सीतापुर, कानपुर, फिरोजाबाद, कानपुर, आगरा, मेरठ और गाजियाबाद की जेलों में आतंकी निरुद्ध हैं। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद सरबजीत की हत्या के बाद चौकन्नी अखिलेश सरकार ने उ.प्र. की जेलों में बन्द इन आतंकियों की सुरक्षा कड़ी कर दी है।











