दिंनाक: 27 Apr 2013 12:05:13 वर्तमान की तोड़ निराशा दो जग को सम्बल विश्वास। राम-कृष्ण की पुण्य भूमि से दानवता का कर दो नाश।। ओ अजेय विक्रम के गौरव ओ संस्कृति के शौर्य अखण्ड। नव गणना के प्रथम सूर्य से भरो चेतना रश्मि प्रचण्ड।। संकल्पों के शत-शत विकल्प उभरें, जीवन हो महाकार। नववर्ष राष्ट्र के जीवन में पहनाए प्रेमिल कण्ठाहार।। वे शब्द झरें जिनसे भरें कटुता के हिंसक स्रवित घाव। वे वार जगें जिनसे मरें पशुवत प्रवृत्तियों का प्रभाव। नव संवत्सर में हर वाणी बन जाए ऐसा वशीकरण। हो सारी वसुधा निज कुटुम्ब, अलगाव, चूम ले संधि चरण।। नया वर्ष यह संकल्पों की प्रति क्षण याद दिलाए। कर्तव्यों की मानस गंगा कर्म-धरा पर लाए।। हो अतीत के गौरव से फिर, ऊंचा अपना भाल। भारत के पन्नों पर वांचे यह जग अपना हाल।। प्रशांत अवस्थी