नदी नाद की लय में राष्ट्र की लय, वरना प्रलय
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हर नदी कुछ कहती है। उसकी कल–कल में जीवन का संदेश छिपा होता है। उसकी यह कल–कल ध्वनि तभी उत्पन्न होती है जब वह निरन्तर प्रवाहमान रहती है, बहती रहती है। नदी का प्रवाह रुका तो समझो आपके जीवन का संदेश भी अवरुद्ध हो गया। प्रकृति के उत्पन्न होने के समय से ही मानवजाति ने नदियों का महत्व समझा, नदी तटों पर ही विभिन्न संस्कृतियां जन्मीं, ऋषियों–मुनियों ने वेदों, पुराणों, उपनिषदों में नदियों की महिमा गायी। आज यदि हम नदियों का महत्व नहीं समझ रहे हैं। तो उसके दुष्परिणाम भी हम ही भुगत रहे हैं।
प्रकृति लयबद्ध है। यह लय, प्रलय में भी नहीं टूटती। प्रकृति का मूलतत्व अजर-अमर है। प्रकृति का अन्तस् लयबद्धता के कारण ही छन्दस् है। प्रकृति का छन्दस् ही वैदिक वांग्मय में छन्दस् बना। विद्वान वैदिक भाषा को छन्दस् कहते हैं। संस्कृत में मनुष्य कर्म की शास्त्रीयता है, लेकिन छन्दस् ज्यों का त्यों हैं। प्रकृति छन्दस् में ही प्रकट होती है। पहली बार उगी व्यापकों जलों के हृदय में। ऋषियों ने जल को 'आप: मातरम्' कहकर प्रणाम किया। बताया कि ये जलमाताएं विश्व की जननी हैं। वे इन्द्र, अग्नि आदि विराट शक्तियों की भी माताएं हैं। जलमाताएं धरती पर निर्बाध बहीं। उनके प्रवाह में नाद था। अथर्ववेद के ऋषि ने सीधे उनसे ही कहा 'आप नाद करती हुई प्रवाहित हैं, सो आपका नाम नदी पड़ा। आपको नमस्कार है।'
लहरें लयबद्ध होती हैं। लयबद्धता ही छन्दस् में व्यक्त होती है। नदी और नाद दोनों की जिजीविषा लहरों की गति में है। लहरों में ही नाद और नदी का रस होता है। लहर ही अपने अनुशासन में छन्द बनती है। लेकिन सारी दुनिया के ज्ञान को छन्दस् में गाने वाले भारत की नदियों के नाद अब शोकाकुल हैं। अब नदियां घुड़साल से छूटी घोड़ी, बछड़ों को चाटने के लिए व्याकुल गाय या आरोही योद्धा की तरह लहर-लहर नहीं लहकती।
वैदिक सभ्यता और संस्कृति का मूलाधार नदियां हैं। ऋग्वेद के ऋषियों का स्तोता-बोध बहुत गहरा है। कहते हैं, 'देवता रक्षा करें। पूर्वज रक्षा करें और जल से भरी प्रवाहमान नदियां भी हमारी रक्षा करें। (6.52.4) यहां जल भरी नदी से रक्षा की गुहार विशेष ध्यान देने योग्य है। फिर कहते हैं, 'जल से उफनाती सरस्वती हमारी रक्षा करें।' (6.52.6) ऋग्वेद में भारत के अभिजनों का मूल निवास क्षेत्र भी नदीवाचक है। यहां मूल निवास के लिए 'सप्त सिंधव' (8.24.27) सात नदियों वाले क्षेत्र का उल्लेख है। नदियां सात हैं, पर सरस्वती और सिन्धु की स्तुतियां ज्यादा हैं। अन्य पांच नदियां सतलज (शुतुद्री), व्यास (विपास), रावी (परूष्णी), चेनाब (आक्सिनी) और झेलम (वितस्ता) हैं। गंगा, यमुना भी हैं। यहां रसा (सीर दरिया), अनितमा (आमूदरिया) और कुंभा (काबुल नदी) आदि का भी उल्लेख है। ऋग्वैदिक संस्कृति और सभ्यता के अभिजन (वंशज) पश्चिमोत्तर दिशा में अफगानिस्तान तक विस्तृत थे।
ऋग्वेद में लगभग 25 नदियों का उल्लेख है, लेकिन सरस्वती नदी की बात ही दूसरी है। वह नदी है, देवी है, देवता है, माता हैं और वाग्देवी (ज्ञान, वाणी की शक्ति) भी है। सरस्वती भरतवंशियों की प्रिय नदी है। देवश्रवा और देववात भारत ऋग्वेद के ऋषि हैं और सूक्त (3.23) के रचयिता हैं। यहां चौथे मन्त्र में दृषद्वती, आपया व सरस्वती के तटों पर रहने वाले मनुष्यों की समृद्धि की स्तुति है। ऋग्वेद काल के एक राजा सुदास का राज्य सरस्वती नदी के तट पर था। तब सरस्वती हिमालय से निकलकर सबको सींचते हुए दक्षिणी समुद्र में गिरती थी। तटवर्ती निवासी आर्य समृद्ध थे। अधिकांश तत्वज्ञान, काव्य सर्जन, ऋचा दर्शन यहीं उगा। इसीलिए सरस्वती नदी ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी कही गयी।
नदी को ब्रह्माण्डव्यापी जानना और बताना कोई हमारे पूर्वजों से सीखे। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को समूची पृथ्वी को तेज से भरने वाला बताया गया है ऋग्वेद के अनुसार सभी नदियों का जल पवित्र करता है लेकिन सरस्वती बुद्धि को भी पवित्र करती है। (1.3.4) ऋग्वेद के नदी सूक्त (10.75) में वर्णित नदियां-गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्रि (सतलज), परूष्णी (रावी), अक्सिनी (चेनाब), वितस्ता (झेलम), मरूदवृद्धा, आर्जकीया और सुषोमा राष्ट्र के विशाल भू-भाग में बहती हैं। इसी सूक्त में पश्चिम से आकार सिन्धु में मिलने वाली अथवा सिन्धु के परवर्ती क्षेत्र में बहने वाली नदियों-क्रुम, गोमती, कुंभा, तुष्टामा, सुसर्तु, रसा, श्वेती और मेहत्नु की भी चर्चा है। पूरब में गंगा से लेकर धुर उत्तर-पश्चिम (आज के अफगानिस्तान) तक की नदियों का उल्लेख ऋग्वेद और उसके मन्त्र रचने वाले ऋषियों के प्रभाव क्षेत्र की स्वाभिमानी सूचना है।
सरस्वती ऋग्वैदिक काल में ही नदी से माता, देवी, देवता, ज्ञान की अधिष्ठात्री और वाग्देवी बन चुकी थी। गृत्समद के रचे एक मंत्र (2.41.6) में वे सर्वोत्तम मां-अम्बितमे, श्रेष्ठतम नदी-नदीतमे और श्रेष्ठम देवी-देवितमे हैं। ऋग्वेद में 5 जन हैं, सरस्वती 'पंचजाता वर्धयन्ती' है। ऋग्वैदिक भरतजनों ने सरस्वती तट पर दर्शन, चिन्तन और उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों वाली एक विशेष संस्कृति का विकास किया। भरतजनों द्वारा विकसित इस सांस्कृतिक भू-क्षेत्र का नाम 'भारत' पड़ा। लेकिन अधकचरे लोग सरस्वती का अस्तित्व ही नहीं मानते। अब सरस्वती नदी की खोज हो चुकी है तो भी सरस्वती को काव्य-कल्पना बताने वाले लज्जित नहीं हैं। हृदय नारायण दीक्षित
भारतवंशी विश्वामित्र ज्ञान बांटने के लिए सतलज व व्यास नदियों को पार कर रहे थे। उन्होंने दोनों नदियों का प्रवाह देखा और गाया, 'जैसे घुड़साल से छूटी दो घोडियां आगे बढ़ने की इच्छा से तेज दौड़ती हैं, वैसे ही ये दोनों नदियां प्रवाहमान हैं।' फिर दूसरी अनुभूति फूटी, 'जैसे दो सुन्दर गाएं बछड़ों को चाटने के लिए तेज भागती हैं, वैसे ही ये सतलुज व व्यास समुद्र से मिलने की ललक में बह रही हैं। हे इन्द्र द्वारा प्रेरित नदियों! तुम दो रथसवारों के समान सागर की ओर जा रही हो। आपस में मिलती, लहरों के द्वारा एक दूसरे के क्षेत्र को सींचती हुई।' विश्वाामित्र ने हहराती नदियों से जल नीचा करने की प्रार्थना की। विश्वामित्र और नदियों का संवाद ऋग्वेद के तीसरे मण्डल में है।

आश्वासन तोड़े तो हुईं मरणासन्न नदियां
विश्वामित्र जैसे पूर्वजों ने भरतवंशियों की तरफ से नदियों को जो आश्वासन दिए थे, हम सबने वे आश्वासन तोड़े हैं। नदियों ने कहा था, 'यह संवाद याद रखना, हमारा ध्यान रखना और सेवा करना। तुम पार उतरो, हम वैसे ही नीचे झुक रही हैं जैसे बच्चे को स्तनपान कराने के लिए मां झुकती है।' विश्वामित्र ने कहा था, 'हे नदियों, मैं आपकी स्तुति करता रहूंगा।' स्तुति का अर्थ प्रशस्ति गायन ही नहीं होता। स्तोता (स्तुति करने वाला) होना बड़ी कठिन साधना है। मन, क्रम, वचन और अन्तस् से पैदा सेवाभाव ही किसी को स्तोता बनाता है। विश्वामित्र ने भरतवंशियों की ओर से नदियों को यही आश्वासन दिया था, हम भारत के लोग आपके स्तोता रहेंगे, जलमाताओं का पोषण करेंगे, तन से, मन से। तन मन धन जीवन से। लेकिन हम भरतवंशियों ने वे अनुबंध तोड़ दिए, अनुबंध के साथ सम्बन्ध टूटे, इसलिए आज नदियां आकुल व्याकुल, मरणासन्न हैं।











