हमारे समाज की सोच
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विकृति (पश्चिम) से नहीं संस्कृति (भारत) से बदलेगी
नरेन्द्र सहगल
राष्ट्र–आत्मा को झकझोरने वाली घटना ने जलाई
सामाजिक क्रांति की मशाल
हाल ही में दिल्ली में घटित दिल दहला देने वाली घटना ने एक ऐसी सामाजिक क्रांति को जन्म दिया है, जिसकी दिशा अगर संस्कृति आधारित रही तो वर्तमान में व्याप्त सभी विकृतियां समाप्त हो सकती हैं। इस जनक्रांति को अब दलगत स्वार्थों, कुंठित संकीर्ण विचारों और पेशेवर नेताओं के निम्नस्तरीय सुझावों से दूर रखने की समयोचित आवश्यकता है। अन्यथा देश के कोने-कोने में निरंतर प्रस्फुटित हो रहे इस युवा आक्रोश के भयानक परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इस घटना और तत्पश्चात् निर्मित हुए वातावरण ने भारत के राष्ट्रजीवन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। देश के मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने अपनी एक टिप्पणी में बहुत ठोस एवं विचारणीय बात कही है 'दिल्ली में हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना हमारे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरने वाली है…यह दुष्कर्म मात्र शारीरिक क्रूरता नहीं, बल्कि पीड़ित की आत्मा को भी आहत करता है।' ये शब्द वर्तमान परिस्थितियों की अभिव्यक्ति हैं।
एक विशिष्ट प्रकार की इस सामाजिक क्रांति के माध्यम से हमारे समाज ने स्वयं अपनी दुखती नस पर हाथ रखकर अपने कष्टों और इनके निवारण के तौर-तरीकों को प्रकट करना प्रारंभ किया है। 'पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण का नतीजा हैं ऐसे कुकृत्य' 'नैतिकता आधारित भारतीय संस्कृति ही समाज की सोच को बदल सकती है', 'लड़कों और लड़कियों को समान अधिकार मिलने चाहिए।', 'पुरुष प्रधान समाज रचना का मूल्यांकन हो।', 'महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए संवैधानिक स्तर पर कदम उठाए जाएं' 'आत्मरक्षा के गुर सिखाए जाएं', 'दुष्कर्मियों को कठोरतम सजा दी जाए' इत्यादि सामाजिक चर्चा के ज्वलंत विषय बन गए हैं। जनक्रांति की यह दिशा ठोस, सकारात्मक और व्यावहारिक है। अपनी दशा बदलने के गंतव्य की ओर बढ़ रहे हमारे समाज के सामने ज्वलनशील सवाल केवल तीन ही हैं- l ºÉ¨ÉÉVÉ की इस स्वयं स्फूर्त क्रांति में बाधक कौन है? l EòÉèxÉ से तत्व ज्ञान से बदलेगी समाज की सोच? और l <ºÉ संभावित परिवर्तन का बीड़ा कौन उठाएगा?
अर्थ/काम आधारित भोगवादी सभ्यता का दुष्परिणाम
समाज की वर्तमान दुर्दशा
हमारे समाज की वर्तमान सोच अथवा दुर्दशा का मर्मांतक वर्णन सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती के मित्र और इस हादसे के प्रत्यक्षदर्शी अवीन्द्र पाण्डे ने एक समाचार चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में कर दिया है। 'मैंने गुजर रहे लोगों को रोकने की काफी कोशिश की, लेकिन वे बिना मदद किए ही आगे बढ़ गए।' अपने दम पर दरिंदों का मुकाबना करने वाले इस चश्मदीद गवाह के बयान ने हमारी सरकार, पुलिस बंदोबस्त और समाज के नैतिक स्तर की धज्जियां उड़ा दी हैं। अपना चेहरा छुपाने और साख बचाने के लिए पुलिस ने भले ही पीड़ित युवक के बयान को गलत साबित करने की अपनी पेशेवर मानसिकता का परिचय दिया है परंतु सच्चाई तो सार्वजनिक हो ही गई है। सड़क पर जख्मों से कराह रहे युवक और खून से लथपथ बेहोश पड़ी युवती को उठाने की भी दया न किसी राहगीर और न ही किसी पुलिसकर्मी ने की। घुटने की हड्डी टूटे और रॉड की मार से घायल युवक ने अपनी मित्र को उठाकर पुलिस वैन में रखा। यह पुलिस भी डेढ़ घंटे बाद पहुंची और देर तक सोचती रही कि क्या करें। किसी नजदीकी अस्पताल में नहीं पहुंचाया गया। सफदरजंग अस्पताल में भी घंटों तक इनके तन पर कपड़ा नहीं डाला गया।
पीड़ित युवक के इस दर्दनाक बयान से जहां हमारे समाज में समाप्त हो रहे हमारे श्रेष्ठ सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के पुनर्जागरण की आवश्यकता सामने आई है, वहीं सत्ताधारियों और पुलिस प्रबंधन की पोल भी खोली है। यह तथ्य भी सबके ध्यान में आ गया कि सरकार और पुलिस भी उसी समाज में से आते हैं जिसको पश्चिम की भोगवादी सभ्यता और लार्ड मैकाले की अर्थ और काम केन्द्रित शिक्षा प्रणाली ने अपने श्रेष्ठ मानवीय जीवन मूल्यों से दूर हटाकर भौतिकवाद के अंधेरे में फेंक दिया है। वास्तव में इसी भोगवादी और अर्थ आधारित जीवन प्रणाली के झंडाबरदार और रक्षक बुद्धिजीवी, राजनेता और पत्रकार हमारे समाज की धर्म/मोक्ष आधारित पुनर्रचना में बाधक हैं। अगर ऐसा न होता तो रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के पश्चिमी सभ्यता को कटघरे में खड़ा करके भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता पर आधारित समाज रचना निर्माण करने की जरूरत पर बल देने वाले बयानों का गलत अर्थ न निकाला जाता। अत: सारे समाज की सोच बदलने से पहले हमारे बुद्धिजीवियों/राजनेताओं/पत्रकारों/लेखकों और सामाजिक रहनुमाओं को अपनी सोच बदलनी चाहिए।
धर्म आधारित भारतीय संस्कृति में समाए हैं
मर्यादा और संयम के संस्कार
सड़कों पर उतरे युवा आक्रोश के दबाव में आकर ही क्यों न सही, सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ तत्कालिक पग उठाए हैं। यह निश्चित रूप से दुष्कर्मों की तादाद घटाएंगे और दुष्कर्मियों को मौत जैसी कठोरतम सजा देने से असामाजिक तत्वों में खौफ पैदा होगा। परंतु इन सभी कार्रवाइयों के बावजूद समस्या जड़मूल से समाप्त नहीं होगी। इस रोग के स्थाई इलाज के लिए पश्चिम की उस सभ्यता के अंधानुकरण को तिलांजलि देनी होगी जहां मानव को मशीन माना जाता है। जहां जिस सभ्यता में मुक्त यौनाचार को सामाजिक मान्यता प्राप्त हो ऐसी जीवन प्रणाली के पीछे न भागकर अपनी चरित्र निर्माण पर आधारित संस्कृति की ओर लौटने से ही नारी अपमान के जघन्य अपराधों से मुक्ति मिलेगी। पश्चिम के देशों में तो आत्महत्याओं, विवाह के पूर्व मां बनने, विवाह के बाद संबंध विच्छेद (तलाक) व वैवाहिक सौदेबाजी की घटनाओं का ग्राफ बढ़ रहा है।
चिंतनीय बात यह है कि पश्चिम के लोग तो अपनी ही विभेदकारी और नकारात्मक सभ्यता से मुंह मोड़कर भारत की सार्वभौम, सर्वस्पर्शी और सर्वग्राह्य संस्कृति को अपना रहे हैं और भारत में सेकुलरवाद के झंडावरदार जो अपने को आधुनिक कहते हैं, अपनी संस्कृति को पोंगापंथी, फासीवादी और पिछड़ी कहकर पश्चिम की भौतिकवादी तामझाम वाली सभ्यता की पूंछ पकड़कर पागलों की तरह भाग रहे हैं। हमारी संस्कृति में नारी को मां का दर्जा दिया गया है। इसीलिए जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक अपने प्रत्येक उद्बोधन से पूर्व सभी छोटी-बड़ी महिलाओं को माताओ कहकर पुकारते थे तो लोग झूम उठते थे। जब शिकागो, अमरीका की विश्वस्तरीय धर्मसभा में स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण से पूर्व 'मेरे अमरीकावासी बहनो और भाइयो!' कहा तो सारा सभास्थल तीन मिनट तक तालियों से गूंजता रहा। भारतीय संस्कृति के पुरोधा स्वामी विवेकानंद ने तो अमरीका में एक वेश्या को अपनी मां कहने और उसका पुत्र कहलाने में भी संकोच नहीं किया। यही संस्कृति भारतीय युवकों में बढ़ रही उन्मुक्तता को हटाकर मर्यादा और संयम के संस्कारों का समावेश करेगी। मन को संयमित करके सुव्यवस्थित जीवन की रचना के लिए हमारी संस्कृति में सदाचार के नियमों के रूप में कहा गया है कि धैर्य, क्षमा, शमन, आस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, आत्मज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध ही वास्तविक धर्म है।
सामाजिक व्यवस्था को नैतिक बंधन में बांधते हैं
हमारी संस्कृति के चार पुरुषार्थ
आज चारों ओर व्यवस्था में परिवर्तन लाने की मांग उठ रही है। पूर्व में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और वर्तमान में आक्रोशित युवाओं ने इस मांग को बल प्रदान किया है। यह आवाज भी उठ रही है कि व्यक्ति और समाज की सोच बदलने से ही व्यवस्था में परिवर्तन हो सकता हे। व्यक्ति और समाज की सोचने बदलने अर्थात् संस्कारित करने का सामर्थ्य हमारी भारतीय संस्कृति में है। हमारी सनातन एवं अमर संस्कृति का आधार चार पुरुषार्थ 'धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष' मानव की समस्त विकृतियों को समाप्त करके उसे सर्वगुण सम्पन्न बनाने की क्षमता रखते हैं। यह चारों पुरुषार्थ समस्त मानव जाति को मर्यादा में रहकर जीविकोपार्जन के साधन जुटाने और इनका संयमित उपभोग करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के रास्ते पर बढ़ने की शिक्षा देते हैं। अर्थात् धर्म के अंकुश में रहकर जीवन व्यतीत करना। श्री गुरुजी गोलवलकर के शब्दों में 'आज के आशांतिपूर्ण जगत में मनुष्य मनुष्य के बीच बंधुता के भाव का जो अभाव दिखाई देता है उसे समाप्त कर जागतिक शांति की जीवन व्यवस्था निर्माण करने के लिए इन चार पुरुषार्थों को आधार बनाना होगा।'
भ्रष्टाचार और बलात्कार जैसे दुष्कर्म अर्थ, काम आधारित सभ्यता/व्यवस्था की ही उपज हैं। अत: धर्म और मोक्ष आधारित संस्कृति इन्हें नियंत्रित कर सकती है। हमारी संस्कृति के उच्चतम सिद्धांत 'सर्वे भवन्तु सुखिन:', 'वसुधैव कुटुम्बकम्' 'एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति', 'सम्पूर्ण ब्राह्मांड में एक ही प्राणतत्व' इत्यादि सभी राष्ट्रों के सभी समाजों को चरित्रवान बनाकर उन्हें स्नेह के बंधन में बांध सकते हैं। महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि से मानव का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास संभव है। इसी को सर्वांगीण विकास कहा गया है। परंतु इन संस्कारों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाने वालों को साम्प्रदायिक और पिछड़ा कहकर दुत्कार दिया जाता है और दुत्कारने वाले वही लोग हैं जो बच्चों को ग से गणेश पढ़ाना साम्प्रदायिक मानते हैं और ग से गधा पढ़ाना सेकुलरवाद का प्रतीक समझते हैं। जहां गधे को सेकुलर कहा जाएगा वहां तो फिर 'खर मस्ती' अर्थात् दुष्कर्मी और भ्रष्टाचारी ही पैदा होंगे। अत: इस सेकुलर सोच को मुंह तोड़ जवाब देकर राष्ट्रीय संस्कृति का पल्लवन करना होगा. तभी बदलेगी हमारे समाज की सोच।











