किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन अपरिहार्य-प्रोफेसर हरबंश दीक्षितपूर्व मजिस्ट्रेट किशोर न्याय बोर्ड, मुरादाबाद
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किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन अपरिहार्य-प्रोफेसर हरबंश दीक्षितपूर्व मजिस्ट्रेट किशोर न्याय बोर्ड, मुरादाबाद

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Jan 12, 2013, 12:00 am IST
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दिंनाक: 12 Jan 2013 14:38:10

 

मुम्बई में आतंकी हमले के दोषी कसाब ने अदालत के सामने अपील की थी कि उसे 18 र्वष से कम का घोषित कर दिया जाय। यदि वह अपनी इस कोशिश में सफल हो जाता तो पूरे देश को 72 घंटों तक भावनात्मक रूप से बंधक बनाने वाला आतंकी, जो 166 मौतों का भी जिम्मेदार था तथा जिसने दूसरे आतंकियों के साथ मिलकर 308 लोगों को घायल भी किया था, साफ छूट जाता। जो सुविधा कसाब को केवल इसलिए नहीं मिल पायी थी क्योंकि वह 18 साल से कम का था उसी सुविधा की मांग दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म प्रकरण के एक अभियुक्त की ओर से की गयी है। बताया जा रहा है कि अपराध में शामिल उस तथाकथित किशोर ने दूसरे अभियुक्तों से भी ज्यादा दरिंदगी दिखायी थी, किन्तु जहां अन्य अभियुक्तों को अब फांसी की सजा भी हो सकती है वहीं 'किशोर' का बाल भी बांका नहीं होगा। किशोर न्याय अधिनियम-2000 के मुताबिक उस अभियुक्त का नाम भी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। उसे जेल में नहीं रखा जा सकता, उसे तुरन्त जमानत मिल जाएगी, आजीवन कारावास नहीं दिया जाएगा, सजा के तौर पर अधिक से अधिक 3 साल तक सुधार गृह में भेजा जा सकता है, किन्तु व्यावहारिक दिक्कतों के कारण इसका भी इस्तेमाल नहीं होता। अपराधी चेतावनी देकर छोच्च् दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, मामला खत्म होने के बाद उससे जुच्च्े सभी रिकार्ड नष्ट कर दिए जाएंगे और मुजरिम को कानूनन लांछित भी नहीं माना जा सकता। दोष साबित हो जाने के बाद भी वह सरकारी सेवा या अन्य सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता है। वह चुनाव लच्च् सकता है और पुलिस अधिकारी भी बन सकता है।

बढ्ढते गए किशोर अपराधी

किशोर वय बच्चों के सुधरने की आस तथा उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की नीयत से सन 2000 में किशोर अधिनियम का नया रूप लाया गया। अन्तरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से किशोर की उम्र को 16 से बढ्ढाकर 18 र्वष कर दी गयी और उन्हें बेहतर व सुरक्षित भविष्य देने की गरज से तमाम सुविधाएं दी गयीं, किन्तु अब तक इस कानून का नकारात्मक प्रभाव ही ज्यादा पच्च है। सन् 2000 से 2010 के बीच किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या लगातार बढ्ढती गयी। सन् 2000 में प्रति 1000 किशोर जनसंख्या पर 10 अपराधी थे जबकि 2010 आते-आते संख्या तकरीबन दुगुनी होकर 19 पर पहुंच गयी। अपराधों की संख्या में वृद्धि का यह सिलसिला सन 2000 के बाद ही शुरू हो गया था। सन् 2001 में प्रति 1000 किशोरों में से 16 ने अपराध किया जबकि 2002 में यह संख्या 18 तक पहुंच गयी। सन् 2003 में थोच्च सा गिरकर यह संख्या 17 तक पहुंची थी, किन्तु सन् 2004 में यह संख्या एक बार फिर बढ्ढकर 18 तक पहुंच गयी। सन् 2006 में यह बढ्ढकर प्रति हजार 19 तक जा पहुंची। सन् 2007 में 20 तथा 2008 में नया रिकार्ड बनाते हुए प्रति हजार किशोरों पर अपराध करने वालों की संख्या 21 तक जा पहुंची। कुल अपराधों में भागीदारी के लिहाज से भी किशोरों की संख्या में लगातार बढ्ढोतरी हो रही है। सन् 2000 के अपराधों में किशोरों की भागीदारी मात्र 0.5 प्रतिशत थी जो 2002 में दुगुनी होकर 1 प्रतिशत हो गयी। सन् 2008 में आते-आते कुल अपराधों में किशोरों की भागीदारी बढ्ढकर 1.8 प्रतिशत हो गयी। दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड की पृष्ठभूमि में किशोर न्याय कानून में संशोधन हेतु जन दबाव बढ्ढा है। चार जनवरी को आयोजित राज्यों के मुख्य सचिवों तथा पुलिस महानिदेशकों की बैठक में भी यह मुद्दा उठा। कुछ अधिकारियों का सुझाव था कि किशोर की उम्र सीमा 18 र्वष से घटाकर 16 र्वष कर दी जाय। भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देशों में बच्चों के परिपक्व होने की उम्र ठंडे प्रदेशों से कम है। इसके अलावा पढ्ढाई लिखाई के बढ्ढते स्तर तथा टी.वी. और कम्प्यूटर जैसे साधनों ने उन्हें समय से पहले परिपक्व कर दिया है। इसलिए किशोर की उम्र सीमा को कम करने की जरूरत है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इस तरह की शुरुआत हो चुकी है। न्यूयार्क, नार्थ कैरोलिना तथा स्काटलैंड जैसी जगहों पर उसे घटाकर अब 16 र्वष किया जा चुका है। हमें भी अब देर नहीं करनी चाहिए।

कानून की आच्च् में अपराध

किशोर अधिनियम में केवल उम्र घटाकर 16 र्वष कर देने से ही समस्या का पूरी तौर पर समाधान नहीं हो पाएगा। अब काफी छोटी उम्र के किशोर भी गम्भीर अपराध करने लगे हैं। बीते साल 9 फरवरी को चेन्नै में 15 साल के स्कूली छात्र ने अपनी शिक्षिका की चाकू गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। वह अपराध अचानक ही नहीं घटा था, बल्कि उस छात्र ने उसकी पूरी तैयारी की थी। वह अपने घर से चाकू अपनी किताबों के बीच में छिपाकर लाया था। उसकी नीयत केवल आतंक पैदा करने की ही नहीं थी बल्कि वह शिक्षिका की हत्या करना चाहता था, क्योंकि वह तब तक ताबच्च्तोच्च् हमला करता रहा जब तक कि आश्वस्त नहीं हो गया कि शिक्षिका को बचाया नहीं जा सकता। शिक्षिका का कसूर सिर्फ इतना था कि वह उस किशोर को पढ्ढने के लिए टोकती रहती थी। उससे पहले हरियाणा में भी एक स्कूली बच्चे ने अपने पिता की लाइसेन्सी पिस्तौल से अपने सहपाठी की हत्या कर दी थी। मुरादाबाद में किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य के रूप में मेरे सामने एक ऐसा मामला आया जिसमें किशोर पर आतंकवाद विरोधी कानून के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज था। गैंगस्टर कानून के अन्तर्गत तो बहुत से किशोरों के खिलाफ मुकदमे थे और उनमें से अधिकांश साबित भी हो गये लेकिन अपराधियों को कोई सजा नहीं दी जा सकी, क्योंकि वे किशोर थे।

संशोधन भी हो, सुधार भी

किशोर अपराध का एक और खतरनाक रूप विकसित हो रहा है। शातिर अपराधी किशोर बच्चों का गिरोह बनाकर उनको प्रशिक्षित करके अपराध करवा रहे हैं। रेलवे स्टेशनों पर अपराध करने या बैंकों तथा दूसरे सार्वजनिक जगहों से उठाईगिरी के मामले बढ्ढते जा रहे हैं। गिरोह का सरगना उन किशोरों की मदद करता है। किशोर बोर्ड से जमानत कराने तथा उनके दूसरे खर्चों की चिन्ता करता है। धीरे-धीरे किशोरों को नशे का आदी बना देता है और वे किशोर अपने सरगना की इच्छा के मुताबिक काम करते हैं। अभी इस तरह के योजनाबद्ध अपराध छोटे मोटे मामलों तक ही सीमित हैं, किन्तु कानून का अभयारण्य उन्हें बच्च्े अपराधों तक इन तौर तरीकों को फैलाने को उकसायेगा। यदि कसाब द्वारा अपने को किशोर घोषित कराने के आग्रह को बानगी के तौर पर देखा जाय तो इसके खतरे कल्पनातीत हो सकते हैं। आतंक फैलाने वाले समूह इस कानून को अपनी ढाल बनाने के बारे में सोचना शुरू कर चुके हों तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसलिए किशोर अधिनियम में संशोधन करके उम्र सीमा को 18 र्वष से 16 र्वष करने से ही काम नहीं चलेगा, अपितु जरूरत इस बात की भी है कि कानून में संशोधन करके आतंकवाद, हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे अपराधों को किशोर न्याय कानून की सीमा से बाहर किया जाए।

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