फतवों की धमक से कसमसाता मुस्लिम समाज
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फतवों की धमक से कसमसाता मुस्लिम समाज

Written byArchiveArchive
Dec 29, 2012, 12:00 am IST
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फतवों की धमक से कसमसाता मुस्लिम समाज

दिंनाक: 29 Dec 2012 13:43:22

दुनिया के फतवे और फतवों की दुनिया

मुजफ्फर हुसैन

दिल्ली में पिछले दिनों एक मेडीकल छात्रा के साथ जिस पशुता के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया उसके विरुद्ध उठी जन विरोध की लहर थमने का नाम नहीं ले रही हैं। दिल्ली का विद्यार्थी जगत जिस तरह से इसके विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है उसे देखते हुए बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए विद्यार्थी जगत के आंदोलनों की याद ताजा हो गई। ऐसे आंदोलन शासकों के भ्रष्टाचारों को लेकर अनेक देशों में हुए थे। इसका बड़ा परिणाम यह आया था कि जापान की तिनाईका और इंडोनेशिया की सुकर्णो सरकार को त्यागपत्र देने पड़े थे। अमरीका में निक्सन के विरोध में वाटरगेट कांड का भंडाफोड़ हुआ था। अंतत: निक्सन को भी राष्ट्रपति पद से जाना पड़ा था। इस बार विद्यार्थी जगत में जो आक्रोश भड़का है उसके पीछे एक मासूम लड़की के साथ छह अमानुषों के द्वारा किया गया बलात्कार था। जिस देश में द्रोपदी की लाज बचाने के लिए भगवान कृष्ण को आना पड़ा था और अंतत: उसी कारणवश महाभारत का युद्ध हुआ, कहीं वैसी स्थिति हमारे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी तो नहीं घटेगी? इसका नतीजा तो कुछ समय बाद ही दिखलाई पड़ेगा, लेकिन एक बात तय है कि यदि किसी ऐसे मुस्लिम राष्ट्र में यह घटना घटी होती जहां शरीयत के कानून को मानने वाली सरकार होती तो नतीजा यही आता कि उक्त बलात्कारियों को संगसार की सजा दी गई होती। इस प्रकार के दंड में जिसने बलात्कार का पाप किया है उस पर पत्थरों की वर्षा की जाती है। बलात्कारी जनता के बीच होता और जनता पत्थरों से उसे कुचल देती। सऊदी अरब में तो कुछ मामलों को लेकर ऐसा हुआ है, लेकिन अन्य मुस्लिम राष्ट्रों में ऐसा हुआ हो, उसकी जानकारी नहीं मिलती है। बलात्कार के इस दंड से वहां जनता इतनी आतंकित रहती है कि कोई अपराधी ऐसी हरकत नहीं कर सकता। हमारी न्याय प्रणाली में इस प्रकार का दंड तो नहीं दिया जा सकता है, लेकिन उसे फांसी अवश्य दी जा सकती है।

फतवों से उठा विश्वास

इस्लामी जगत में किसी भी प्रकार के अपराध के लिए सजा निश्चित करने संबंधी संपूर्ण अपराध संहिता का अस्तित्व है। लेकिन यदि इस मामले में न्याय देने वाले को अधूरापन लगता है तो वह शरीयत के जानकारों से इस संबंध में विचार-विमर्श कर सकता है। इसी विचार-विमर्श को फतवा कहा जाता है। लेकिन समय समय पर कट्टर बादशाह जब उस देश की हुकूमत के सर्वेसर्वा बन गए तो वे अपने पक्ष के मौलानाओं और इमामों से फतवे प्राप्त कर अपनी जान छुड़ा लेते थे। इस प्रकार की तानाशाही न केवल उस समय तक चलती रही बल्कि आज भी मुस्लिम समाज के शक्तिशाली लोग अपने आसपास के उलेमाओं और मौलानाओं से सम्पर्क साधकर फतवा प्राप्त कर लेते हैं और अपनी जान छुड़ा लेते हैं। इस प्रकार की घटनाएं जब से सामने आई हैं तब से फतवों के प्रति लोगों में विश्वास घट गया है। समाज में ऐसा भी एक वर्ग है जो अपने हर उल्टे सीधे काम के लिए फतवा मांगकर अपनी चमड़ी बचाने का प्रयास करता है। जहां से फतवे दिये जाते हैं उसे 'दारुल फतावा' कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ होता है, फतवे दिये जाने वाला घर। अरबी में दार का अर्थ होता है घर।

वैसे तो लोग अपने आसपास के मदरसों और मस्जिदों के मौलानाओं के पास जाकर अपने कृत्यों के संबंध में शरीयत के प्रति इसका क्या नजरिया है वह जानने के लिए सम्पर्क करते हैं? लेकिन भारत में कुछ मुस्लिम देवबंद मदरसे के फतवा विभाग (दारुल फतावा) से सम्पर्क कर अपनी शंका-कुशंका का निवारण कर लेते हैं। पाठक इस बात को जानते ही होंगे कि देवबंद भारत में उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर में एक तहसील स्तर का नगर है। इस्लामी जगत में जो स्थान काहिरा के इस्लामी विश्वविद्यालय का है वही भारत में देवबंद का है। लेकिन मुस्लिमों में अनेक विचारधाराएं हैं। इसलिए देवबंदी विचारधारा के लोग इसका अधिकतम सम्मान करते हैं। भारत का सुन्नी समाज मोटे तौर पर दो भागों में बंटा हुआ है। देवबंदियों की संख्या अनुपात में कम है जबकि बरेलवी विचारधारा के लोग अधिक हैं। शिया समाज इन फतवों को मान्यता नहीं देता है। फतवों में केवल मजहबी विषय ही नहीं होते हैं। अनेक लोग अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों के बारे में भी मार्गदर्शन लेने का प्रयास करते हैं।

यह कुप्रचार क्यों?

पिछले दिनों मुम्बई के आजाद मैदान में सुन्नी इजतिमाह हुआ जिसमें एक व्यक्ति ने एक सवाल किया कि क्या रक्तदान, नेत्रदान और गुर्दे का दान इस्लाम में जायज है? उपस्थित मौलाना का उत्तर था कि रक्त तो एक बार देने के पश्चात फिर से बन जाता है, लेकिन आंख और गुर्दा देने के बाद नहीं आते इसलिए उनका दान निषेध है। एक शिक्षक महोदय ने इस बात पर फतवा मांगा कि क्या शाला में उपस्थित हुए बिना रजिस्टर पर हस्ताक्षर करके वेतन लेना जायज है? उत्तर था, बिल्कुल नहीं। नौकरी के लिए प्रमाण पत्र न हो तो उसके स्थान पर जाली प्रमाण पत्र देकर क्या नौकरी ली जा सकती है? उनका उत्तर था, हरगिज नहीं। नैतिकता के आधार पर इनका उत्तर हर कोई जानता है और कोई भी दे सकता है।

फतवे मांगने वाला वर्ग देश में बहुत बड़ा है। असंख्य मदरसों और मौलानाओं से फतवे लिये जाना एक साधारण बात है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि देवबंद मदरसे के दारुल फतावा से प्रतिदिन औसतन 36 फतवे लिये जाते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि समाज में फतवों का कितना बड़ा महत्व है। लेकिन असंख्य बातें ऐसी हैं जिन पर न तो फतवे लेने की आवश्यकता है और न किसी को देने की, क्योंकि ये बातें आधुनिक जगत से संबंधित होती हैं। साथ ही उन कार्यों से देश और समाज के बहुत बड़े वर्ग को लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए पोलियो खुराक के संबंध में। बच्चों के लिए पोलियो खुराक पिलाने का अभियान चलता है। छोटे बच्चों को पोलियो हो जाना एक सामान्य बात है। लेकिन कोई पोलियो की दवा को ही शंका की निगाह से देखे और उसके लिए कुप्रचार करे तो यह एक अमानवीय हरकत है। ऐसे समाजद्रोहियों को दंडित किया जाना अनिवार्य है। भारत और पाकिस्तान में मुस्लिम समाज में सामान्य तौर पर यह अफवाह फैला दी गई है कि पोलियो खुराक से बच्चे नपुंसक हो जाते हैं। ज्यों ही खुराक पिलाने वाले समाजसेवी मोहल्लों में पहुंचते हैं कि मुस्लिम परिवार की नानी, दादी या तो घर का कोई भी व्यक्ति बच्चों को छिपा देता है और स्पष्ट तौर पर कह देता है कि हमारे यहां तीन साल से छोटा कोई बच्चा नहीं है। यह क्या समाजद्रोह नहीं है? ऐसे फतवा जारी करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई अत्यंत अनिवार्य है। भूतकाल में गुड़िया और अमीना के लिए दिया फतवा कितना चर्चित हुआ था, उसे पाठक भूले नहीं होंगे।

पिछले दिनों कुछ फतवे इस प्रकार के भी जारी किये गए हैं, जिनसे समाज में वैमनस्य और टकराव की भावना पैदा हो सकती है। फतवों से राष्ट्रीय हित तो खतरे में नहीं पड़ता है, फिर भी फतवा देने वाले और लेने वालों को दस बार विचार करना अनिवार्य है? क्या वंदेमातरम् गाना इस्लाम विरोधी है? किसी मुस्लिम को अल्लाह के अतिरिक्त किसी के सामने नहीं झुकना चाहिए? क्या बिना मतांतरण किये किसी गैर मुस्लिम लड़की से निकाह जायज है? दारुल उलूम, देवबंद ने फतवा जारी कर अंगदान को गैर इस्लामी घोषित किया है। देवबंद का कहना है कि मनुष्य अपने शरीर के अंगों का मालिक नहीं है? जिस ईश्वर ने उसे जैसा भेजा है वैसा ही उसे लौट      जाना है।

धाक जमाने की कोशिश

दिल्ली के स्कूल में बिंदी लगाने संबंधी भी एक फतवे पर कहा गया है कि बिंदी लगाना इस्लामी सिद्धांत के विरुद्ध है। मुस्लिम महिला को उस स्थान पर भी नौकरी के लिए इनकार किया गया है जहां उसे पुरुषों से बातचीत करनी पड़े। इस्लाम ने जिस रिश्तों के महिला पुरुष को बातचीत करने के लिए आदेश दिये हैं उनमें मेहरमदार से ही वार्तालाप जायज है। एक फतवे के अंतर्गत मुस्लिम महिला को सरकारी अथवा गैर सरकारी नौकरी करने के लिए भी मना किया गया है। सऊदी अरब के एक सुपर मार्केट में महिला को खजांची के पद पर काम नहीं करने संबंधी फतवा जारी किया गया है। भारत के मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने मुस्लिम लड़कियों को मोबाइल पर बातचीत करने से मना किया है। यह इनकार आग्रह तो हो सकता है, फतवा कभी नहीं? क्योंकि फतवा तो कोई अधिकृत मौलाना अथवा इमाम ही दे सकते हैं। पर्सनल ला बोर्ड के पास ऐसा कोई पद और रुतबा नहीं है। दारुल उलूम ने जीन्स एवं चुस्त कपड़ों को शरीयत विरोधी बतलाकर अपना फतवा जारी किया है। मुस्लिम लड़की के लिए साइकिल चलाना भी फतवे के अंतर्गत अवैध घोषित किया है, क्योंकि उस समय वह अपने कपड़ों को ठीक नहीं रख सकती है। पटाखे फोड़ना और बेचना भी शरीयत के विरुद्ध है। टीवी और सिनेमा को 'शैतान का यंत्र' बतलाया गया है। लिपस्टिक लगाना भी हराम है। लड़की जिन कपड़ों में लड़के जैसी लगे, वह भी इस्लाम विरोधी है। महिला की कमाई शरीयत में हराम है। महिला का चुनाव लड़ना भी शरीयत की दृष्टि से हराम है। सानिया मिर्जा के ऊंचे कपड़ों पर भी फतवा जारी हो चुका है। सहशिक्षा अनेक रोगों की जड़ है, इसलिए फतवे के अंतर्गत उस पर भी प्रतिबंध घोषित किया गया है। किसी कृत्य के प्रति अपना विरोध जतलाना एक आदर्श हो सकता है, किंतु इस्लाम जैसे मजहब के नाम पर इस प्रकार की बेतुकी बातें करना कभी जायज नहीं हो सकता है। इसलिए फतवे के नाम पर अपनी बात मनवाना और धाक जमाना निश्चित ही इस्लाम जैसे मजहब का अपमान करना ½èþ*n

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