चिंता में पड़ा माकपाई नेतृत्व
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चिंता में पड़ा माकपाई नेतृत्व

Written byArchiveArchive
Oct 6, 2012, 12:00 am IST
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चिंता में पड़ा माकपाई नेतृत्व सड़कों पर नहीं उतर रहे कार्यकर्ता

दिंनाक: 06 Oct 2012 15:22:43

केरल

प्रतिनिधि

सड़कों पर नहीं उतर रहे कार्यकर्ता

त्या की राजनीति' के आरोपों के चलते गंभीर संकट के दौर से गुजर रही केरल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) इससे और अधिक चिंता में पड़ गई है कि उसके विरोध प्रदर्शनों में पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार घट रही है। माकपा के लिए यह भी चिंता का विषय है कि उसकी सहयोगी इकाइयां (छात्र संगठन, शिक्षक संगठन, मजदूर संगठन आदि–आदि) भी जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से नहीं उठा पा रही हैं। हाल ही में तिरुअनंतपुरम में सम्पन्न हुई राज्य इकाई की एक महत्वपूर्ण बैठक में इस बात पर गंभीर चिंतन किया गया कि पार्टी द्वारा आयोजित धरने–प्रदर्शनों में कार्यकर्ताओं  की उपस्थिति बहुत कम रही। बैठक में सभी पदाधिकारियों ने यह भाव व्यक्त किया कि केन्द्र व राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारों की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध माकपा द्वारा 22 अगस्त को राजधानी तिरुअनंतपुरम सहित सभी 13 जिला केन्द्रों पर आयोजित प्रदर्शन बहुत फीका रहा और उससे पार्टी की भद्द पिटी।

बैठक में राज्य इकाई के सचिव पिनरई विजयन द्वारा जारी एक पत्र में पार्टी की विभिन्न इकाइयों की इसलिए खिंचाई या कहें कि निंदा की गई कि वे अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। खासकर युवा संगठन डी.वाई.एफ.आई. का नाम लेकर कहा गया कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर उसने उचित समय पर मजबूत तरीके से अपनी बात जनता तक नहीं पहुंचाई। लेकिन बैठक में ही दूसरे मार्क्सवादी धड़े का मानना था कि पार्टी के कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं द्वारा सहभागिता न करने का कारण विभिन्न इकाइयों की अकर्मण्यता नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी और पार्टी के भीतर विभाजन का संकेत है। खासकर मुस्लिम लीग के नेता अब्दुल शकूर (कन्नूर) और पूर्व मार्क्सवादी कार्यकर्ता टी.पी. चन्द्रशेखरन (ओंचियम, कोझिकोड) की हत्या को लेकर पार्टी नेतृत्व का दोहरा चेहरा कार्यकर्ताओं के सामने आ गया है। इसलिए इस धड़े का कहना  था कि पार्टी नेतृत्व को दूसरे की निंदा करने की बजाय स्वयं की कार्यशैली व व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिए, जिसके चलते कार्यकर्ता धरने– प्रदर्शनों में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

जम्मू–कश्मीर

सीमा पर घुसपैठ का प्रयास

विफल, हथियार बरामद

पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर सीमा पर भारतीय सेना ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए न केवल घुसपैठ की कोशिश विफल कर दी बल्कि बड़ी मात्रा में हथियार व गोला-बारूद बरामद करने में भी सफलता प्राप्त की है। गत 27 सितम्बर को कुपवाड़ा जिले के केरन सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिश की खबर मिली तो सेना ने घुसपैठियों को घेरने की कोशिश की, लेकिन घुसपैठिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की ओर भाग गए। अपने पीछे वे कई घातक हथियार-जिनमें 10 ए.के. 47 रायफल्स, उनके 20 राउंड कारतूस, 98 चीनी पिस्तौल, 30 माउजर, उनके 196 राउंड कारतूस के साथ 2 सब मशीनगन छोड़ गए जिसे सेना ने अपने कब्जे में ले लिया। बताया जाता है कि ये सभी हथियार बिल्कुल नए हैं। आतंकवाद के विरुद्ध अभियान में सेना की यह महत्वपूर्ण कामयाबी मानी जा रही है और यह नियंत्रण रेखा पर सेना की  पैनी नजर का परिणाम है। खबर है कि सर्दियों से पहले पाकिस्तान और उसकी आई.एस.आई. बड़ी संख्या में हथियारबंद आतंकवादियों को सीमा पार भेजने की योजना पर काम कर रही है, ताकि राज्य के माहौल को बिगाड़ा जा सके। लेकिन सीमा पर भारतीय  सेना की सख्ती के कारण पाकिस्तान की यह योजना कामयाब नहीं हो पा रही है। भारतीय सेना कश्मीर घाटी में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी तरह सतर्क है।  अडनी

पंजाब/राकेश सैन

दिखने लगा है

बी.टी. काटन का बुरा असर

आज केन्द्र सरकार जिस तरह से खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश के फायदे गिनवा रही है उसी तरह कुछ समय पहले बी.टी. काटन का भी गुणगान किया गया था। परन्तु पंजाब में इस कपास के 5-7 सालों की बिजाई के बाद ही इसके दुष्परिणाम सामने आने शुरू हो चुके हैं। कृषि मामलों की स्थायी समिति ने अपनी जांच में पाया है कि बीटी काटन की खेती से देश के पशुधन की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। दस साल पहले जब सरकार ने 'जेनेटिक' बदलाव वाली बीटी काटन फसल उगाने को मंजूरी दी थी तब स्वयंसेवी संगठनों व स्वदेशी जागरण मंच ने उसके खिलाफ आवाज उठाई थी। आशंका जताई गई थी कि इससे भारतीय कपास का न सिर्फ खात्मा हो जाएगा बल्कि पारिस्थितिकीय प्रभाव भी पड़ेंगे। लेकिन वैश्वीकरण की आंधी में अपनी पतंग उड़ाने की जल्दबाजी में तत्कालीन सरकार ने इन आशंकाओं को निर्मूल बताते हुए खारिज कर दिया था। अब संसदीय समिति ने अपनी जांच में पाया है कि एक दशक पहले जताई गई आशंकाएं निर्मूल नहीं थीं। बीटी काटन के बीज जिन पशुओं को खिलाये गए हैं उनके गुर्दे, फेफड़े और हृदय पर बुरा असर पड़ रहा है। इन अंगों का वजन कम होता जा रहा है। और तो और उनके खून के लाल रक्त कणों (आर.बी.सी.) और श्वेत रक्त कण (डब्ल्यू. बी.सी.) में भी गिरावट देखी जा रही है। इसका दुष्प्रभाव उनके उत्पादन पर भी पड़          रहा है।

केन्द्रीय भेड़ और ऊन अनुसंधान संस्थान ने अपनी जांच में पाया है कि जिन भेड़ों को बीटी काटन का बीज खिलाया जा रहा है, उनके शरीर पर रोएं बनने और उनके विकास में गिरावट देखी जा रही है। जाहिर है कि इसका असर उनके उत्पादन पर भी पड़ा है। समिति को आशंका है कि बीटी काटन का मानव शरीर पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। देश के 93 प्रतिशत कपास उत्पादक इलाकों में सिर्फ बीटी काटन की ही खेती हो रही है। इससे लाखों टन बीज का भी उत्पादन हो रहा है, जिसका इस्तेमाल खाद्य तेल बनाने में भी होता है। जाहिर है कि दस सालों में इस तेल ने भी मानव जीवन पर जरूर असर डाला होगा। इन संदर्भों में संसदीय समिति की यह मांग उचित ही है कि इसके दुष्प्रभावों की पूरी पड़ताल के लिए न सिर्फ विशेषज्ञ समिति बनाई जाए बल्कि मानव शरीर पर उसके दुष्प्रभाव की अलग से जांच की जाए। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह फौरन कुछ जरूरी कदम उठाए अन्यथा अपनी पारम्परिक कपास को तो हम खोते ही जा रहे हैं, अपने स्वास्थ्य को भी हम खो देंगे, जिसकी भरपाई आसान नहीं हो पाएगी।

इसके साथ-साथ बी.टी. काटन की बिजाई किसानों को महंगी साबित होती जा रही है। पहले किसान परम्परागत बीज से या बाजार से बीज खरीद कर इसकी बिजाई कर लिया करते थे, परन्तु आज किसानों को हर साल हजारों व लाखों रुपए खर्च करके पहले बी.टी. बीज खरीदने पड़ते हैं और बाद में फसल के ऊपर कीटनाशकों का भी छिड़काव करना पड़ता है। जब बी.टी. फसल का प्रचलन आरंभ हुआ था तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ-साथ सरकार ने भी दावा किया था कि इन फसलों में कीट प्रतिरोधी क्षमता काफी विकसित है, जिसके चलते कीटों से बचाने के लिए इन पर कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना पड़ेगा। इससे किसान की खेती लागत घटेगी और उसका मुनाफा बढ़ेगा। परन्तु हो इसके विपरीत रहा है। बीज तो महंगे हैं ही, साथ ही साथ किसानों को कीटनशकों का भी छिड़काव करना पड़ रहा है। अब तो सरकार  के संसदीय दल ने भी स्वीकार कर लिया है कि इससे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में एक ही मार्ग बचा है कि बी.टी. किस्म की फसलों का ख्याल छोड़कर स्थानीय नस्ल की कपास फसलों के उत्पादन को ही प्रोत्साहन दिया जाए और स्वदेशी की दिशा में ही वैज्ञानिक अनुसंधान किया जाएं।

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