आत्ममंथन का पर्व-डा. विशेष गुप्ता
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आत्ममंथन का पर्व-डा. विशेष गुप्ता

Written byArchiveArchive
Aug 16, 2012, 12:00 am IST
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दिंनाक: 16 Aug 2012 19:20:08

भारत राष्ट्र आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी में है। नि:सन्देह 15 अगस्त, 1947 गर्व करने का दिवस है। वह इसलिए क्योंकि इस दिन भारतमाता परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त हुयी थी। देश को खुली हवा में श्वास लेने और अपना शासक खुद तय करने की सत्ता भी राष्ट्र को प्राप्त हुई थी। तत्पश्चात ही भारत राष्ट्र के सपनों और आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य संविधान के निर्माण के रूप में हमारे सामने आया था। स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि राष्ट्र की स्वतंत्रता के बाद ही सैद्धान्तिक रूप से देश की जनता सम्प्रभुतासम्पन्न बनी और राष्ट्र को एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया। वर्तमान आजादी की वर्षगांठ के इस उल्लासपूर्ण अवसर पर हम जब स्वतन्त्रता के अतीत से कदम बढ़ाते हुए वर्तमान के निकट पहुंचते हैं तो स्वदेशी भारत के पश्चिमी मॉडल ‘<Îhb÷ªÉÉ' का अवलोकन करना भी हमारा दायित्व हो जाता है।

आजादी के मायने

प्रश्न यह नहीं है कि 15 अगस्त, 1947 को इस देश ने जो आजादी हासिल की वह केवल एक बड़े आन्दोलन का परिणाम थी। दरअसल यह केवल भारत को स्वतन्त्र कराने का ही संघर्ष नहीं था, बल्कि यह संघर्ष देश व अतीत की सामाजिक, शैक्षिक व राजनीतिक आजादी को पुनर्जीवित करते हुए यहां की सामूहिकता व सांस्कृतिकता के इतिहास को वर्तमान से जोड़ते हुए आजादी के खुले वातावरण में नये मूल्य गढ़ने का भी था। यही कारण है कि देश की स्वतन्त्रता के अतीत की स्मृतियों का पुनरावृत्त प्रयास इसलिए भी आवश्यक है, ताकि हम इस वर्तमान पीढ़ी को बता सकें कि भारत ने गांधी के सत्य और अहिंसा तथा स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानी मार्ग का अनुकरण करते हुए दुनिया को राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का अर्थ समझाया।

राष्ट्र की स्वतन्त्रता की 65वीं वर्षगांठ का अर्थ है कि यह आजादी अपने वानप्रस्थी जीवन से गुजर रही है। जिन राजनेताओं, महापुरुषों व आजादी के दीवानों ने स्वतन्त्रता संघर्ष को जिया उनमें से कुछ का महाप्रयाण हो चुका है, कुछ अपने संन्यासी जीवन में हैं तथा शेष वानप्रस्थ जीवन से संन्यास के मार्ग पर हैं। लिहाजा इस सच को कहने व स्वीकारने में भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि राष्ट्र का राजनीतिक संचालन करने वाले उस पीढ़ी के राजनेताओं का जीवन भी अब अधिकांशत: वानप्रस्थ और संन्यास के बीच झूल रहा है। परिणामत: आजादी की इस वर्षगांठ के एक दिवसीय उल्लास के अवसर पर हमें अपनी उदात्त स्मृतियों को पुन: जागृत करना आवश्यक है, ताकि हम अपनी उपलब्धियों, चुनौतियों और असफलताओं का पूर्ण ईमानदारी और सच्चाई के साथ आत्ममंथन कर सकें। पीछे मुड़कर देख सकें कि देश की आजादी के 65 वर्षों बाद हम कहां खड़े हैं? क्या हम उन लक्ष्यों को प्राप्त कर पाये हैं जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने एक लम्बा संघर्ष किया? छह दशक की इस लम्बी यात्रा के दौरान हमें यह भी चिन्तन करना पड़ेगा कि स्वतन्त्र राष्ट्र की हमारी संकल्पनायें और राज्यों से हमारी क्या अपेक्षायें थीं? क्या उन पर हम खरे उतर पाये? यहां हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि स्वाधीनता संग्राम में अपने धार्मिक, क्षेत्रीय व जातीय विभेदों को भुलाकर राष्ट्रीय नायकों को जो सम्मान दिया उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से जुड़े सिद्धान्त, दर्शन व मूल्यों को राष्ट्र के विराट लक्ष्यों की प्राप्ति में हमने उनका कहां तक प्रयोग किया? हमारी संसदीय राजनीति ने विगत 65 वर्षों में किस प्रकार की जनाकांक्षाओं, जनचेतनाओं व जनाक्रोश का विकास किया? इस अवसर पर संसद जैसी पवित्र संस्था में अनुशासन का अभाव व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर असहाय होने की उसकी वेदना के स्वरों को अनुभव करना भी इस स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर असंगत नहीं होगा।

आत्मलोचन का समय

आजादी की 65वीं वर्षगांठ पर यह समय स्वविवेक से आत्मलोचन करने का है। स्वतन्त्रता दिवस के इस अवसर पर जब हम सम्पूर्ण राष्ट्रीय परिदृश्य पर दृष्टिपात करते हैं तो यह वास्तविक सच्चाई सामने आती है कि अनेक चुनौतियों के पश्चात् भारत निरन्तर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है। सूचना तकनीक की वैश्विक साख, सामरिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी, खेल व चिकित्सा के क्षेत्र में नई खोजों का विस्तार, मंगल व चन्द्रमा जैसे ग्रहों पर बढ़ते कदम जैसी अनेक राष्ट्रीय सुखद अनुभूतियां हैं जो राष्ट्र पर हमारे गर्व करने की प्रत्यक्ष साक्षी हैं। भारत के इस सकल विकास की धमक केवल देश में ही नहीं है, बल्कि अमरीका जैसे विकसित राष्ट्र भी भारत के विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में बढ़ते रुतबे को स्वीकार कर रहे हैं। यहां के साफ्टवेयर उद्योग ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। ‘<EòÉäxÉÉäʨÉEò ¡òÉä®ú¨É’ की वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी रपट बताती है कि प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में भारत के सूचना तकनीक से जुड़े उद्योग दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। यूरोपीय यूनियन की ‘M±ÉÉä¤É±É MÉ´ÉÇxÉäxºÉ-2025’ में भी अमरीका और चीन के बाद भारत को सबसे शक्तिशाली देश के रूप में स्वीकार किया गया।

अंतर्विरोध भी उभरे

स्वतन्त्रता दिवस के इस पावन अवसर पर यहां इस सच्चाई को प्रस्तुत करने में कोई हिचक नहीं कि देश की आजादी के बाद भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरने के जो स्वप्न हमारे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों एवं राष्ट्र के निर्माताओं ने देखे थे उनके पूर्ण होने में काफी हद तक सफलता भी मिली। परन्तु साथ ही साथ वैश्विक विकास के नाम पर कुछ अन्तर्विरोध भी उभरकर सामने आए हैं। निष्पक्ष तौर पर जब हम राष्ट्रीय विकास की यात्रा में उभर रही चुनौतियों की चर्चा करते हैं तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है। परन्तु यहां के अन्नदाता आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। केवल इतना ही नहीं, देश के अनेक क्षेत्रों में किसान और जमीन के अनेक प्रश्न लगातार इस देश के सामने खड़े हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर वैश्विक पूंजी की पैरोकारी किसी से छिपी नहीं है। वह चाहे नंदीग्राम का मसला हो अथवा उड़ीसा में पास्को परियोजना के खिलाफ वनवासियों का विरोध अथवा वह चाहे हरियाणा-रिलायंस परियोजना से जुड़ा विरोध हो अथवा नोएडा में भट्टा- पारसौल से जुड़े मामले। ये सभी मसले स्वत: ही इस सच्चाई के साक्षी हैं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जो कहीं न कहीं देश के नागरिकों को स्वतन्त्र राष्ट्र का नागरिक होने के साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। देश की आजादी के बाद पूंजीपति घरानों की पूंजी में हजारों गुणा की वृद्धि होना तथा देश के एक-तिहाई लोगों को दो समय की रोटी भी न मिलना जैसे विरोधाभास देश की आजादी पर करारी चोट कर रहे हैं। आजादी के बाद जब योजनाबद्ध तरीके से आर्थिक विकास का ढांचा बना था तो योजना आयोग का उद्देश्य गरीबी उन्मूलन न होकर देश को उद्योग व उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था। देश की आजादी के बाद वर्षों तक गरीबी पर कोई व्यापक चर्चा नहीं हो पायी। गरीबी के प्रश्न को 1963-67 के दौरान डा. राममनोहर लोहिया द्वारा लोकसभा में उठाया गया। तत्पश्चात् 1971 के चुनाव में इन्दिरा गांधी द्वारा ‘MÉ®úÒ¤ÉÒ हटाओ' का नारा दिया गया। परन्तु गरीबी उन्मूलन आज भी बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है। योजना आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर गरीबी रेखा के बारे में हलफनामे को लेकर पूरा देश उद्वेलित हो उठा था। इसमें साफ कहा गया कि शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 32.5 रुपए और ग्रामीण क्षेत्र में 26.3 रुपए खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इस सन्दर्भ में पिछले दिनों देश के शीर्ष न्यायालय द्वारा की गयी यह टिप्पणी किसी से छिपी नहीं रही जिसमें उसने खाद्य निगम के गोदामों की कमी के कारण सड़ते खाद्यान्न को गरीबों में मुफ्त बांटने के निर्देश दिए थे। देश में इस बुनियादी जरूरत से जुड़ी एक तीसरी चुनौती कुपोषण से जुड़ी है। पिछले दिनांे कई दलों के सांसदों और समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों की संस्था ‘½ÆþMÉ®ú व मॉल xªÉÚÊ]Åõ¶ÉxÉ’ (हंगामा) की कुपोषण से जुड़ी रपट जब स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत की गयी तो उस रपट से जुड़े कुपोषण को उन्होंने राष्ट्रीय शर्म करार दिया। निश्चित ही यह बड़े शर्म की बात है कि एक ओर भारत की छवि विश्व में तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था की बनी है, परन्तु दूसरी ओर इसकी गिनती सर्वाधिक कुपोषणग्रस्त देशों में होती है। कुपोषण के क्षेत्र में कड़वा सत्य यह है कि दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारतीय है। केवल इतना ही नहीं, पांच वर्ष से कम उम्र के 40 फीसदी से अधिक बच्चे न केवल कमजोर हैं, बल्कि 59 फीसदी बच्चों का कद भी उनकी उम्र के हिसाब से बेहद कम है।

सुविधाओं का अभाव

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि संविधान की सफलता तभी है जब हर व्यक्ति के पास खाने के लिए अन्न और आवास हो तथा हर व्यक्ति को पीने लायक स्वच्छ पानी मिले। परन्तु आज भी देश में एक लाख गांव ऐसे हैं जहां स्वच्छ पेयजल नहीं है। तथ्य साक्षी हैं कि सरकार एक टायलेट के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर डालती है, वहीं दूसरी ओर गांव में शौचालय न होने के कारण कई लड़कियों को विवाह से वंचित होना पड़ता है। देश में हरित क्रान्ति का बिगुल बजा है, परन्तु लोगों के सामने अन्न का संकट गहरा रहा है। आज राजनीति में राष्ट्रीय मूल्यों की संवदेनशीलता संदिग्ध बनी है। ये सभी देश के एक बड़े हिस्से के धीरे-धीरे आर्थिक गुलामी के शिकंजे में जकड़े जाने तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विदेशी पूंजी के आर्थिक उपनिवेश में परिवर्तित होने के ही दुष्परिणाम हैं। विदेशी के नाम पर आज स्वदेशी उत्पाद से जुड़े हम अपने स्वाभिमान, नैतिकता तथा अपनी स्वाधीन चेतना तक को विदेशियों के हाथों गिरवी रखने में नहीं हिचक रहे। इस स्वतन्त्रता दिवस पर यहां यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रगति करने का यह पश्चिमी मॉडल क्या अपने वास्तविक अर्थों में स्वतन्त्र होने का प्रतीक माना जा सकता है?

अपने वास्तविक अर्थों में प्राप्त आजादी के दिवसों का स्मरण उन मूल्यों, दर्शन व सिद्धान्तों का स्मरण भी है जिन पर चलकर राष्ट्र को गुलामी से मुक्ति मिली। अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले सपूतों के हृदय में राष्ट्र के विकास का एक स्वप्न था। परन्तु उन्हें फांसी मिली और उसके बदले हमें आजादी। आजादी के बाद जो पीढ़ी आज अपनी उम्र के पड़ाव पर वानप्रस्थी व संन्यासी संस्कृति से गुजर रही है, उनसे राष्ट्र को चहुंमुखी विकास की ओर ले जाने की अपेक्षाएं थीं। परन्तु उस पीढ़ी ने भारत राष्ट्र के स्वदेश की भावना को विस्मृत करने तथा विदेशी तर्ज पर राष्ट्रीय विकास का जो सूत्र अपनाया उससे विदेशी भाषा, शिक्षा, मूल्यों व जीवन शैली पर निर्भरता बढ़ती चली गयी। आजादी का अर्थ केवल यही नहीं है कि हम अपनी उपलब्धियों को देखकर मन्त्रमुग्ध होते रहें, बल्कि हमें उन चुनौतियों से भी सीख लेनी चाहिए जो आजादी के इस बाद के कालखण्ड में मुंह बाये खड़ी हैं। इतिहास गवाह है कि देश का भविष्य तय करने वाले लोगों के मन-मस्तिष्क में आज भी नेहरू के समाजवाद का भूत सवार है। लेकिन हम सब जानते हैं कि जो संविधान देश के समस्त नागरिकों को सामाजिक बराबरी, न्याय और अधिकार देता है क्या उसमें हम कामयाब हुए हैं? यदि हां, तो फिर देश में आर्थिक, क्षेत्रीय व सामुदायिक असमानता क्यों विद्यमान है? क्यों नक्सलवाद और आतंकवाद पर हम नियन्त्रण नहीं कर पा रहे? अफजल और कसाब जैसे घोर आतंकवादी को सजा देने मंे हमारी न्याय प्रणाली कमजोर क्यों पड़ रही है? महिला सुरक्षा के बहुत बड़े-बड़े दावों के बावजूद गुवाहाटी में एक महिला खुलेआम घसीटकर यौन उत्पीड़न को मजबूर की जाती है, परन्तु वहां भी न्याय की आवाज धीमी पड़ती नजर आती है। आज ‘]ÅõÉxºÉ{Éè®äúxºÉÒ <h]õ®úxÉä¶É±É’ की वर्तमान रपट भारत को भ्रष्ट सूची में रखती है। ‘M±ÉÉä¤É±É <x]õÒÊOÉ]õÒ’ की रपट भी कालेधन के मामले में भारत को अव्वल बताकर भारत की चमकती साख पर बट्टा लगा रही है। कड़वा सच यह है कि भ्रष्टाचार को लेकर सुशासन से जुड़ी पारदर्शिता एवं जवाबदेही से जुड़ी सरकार की मुहिम लगातार कमजोर पड़ रही है। स्वतन्त्रता दिवस के इस अवसर पर यह कहना भी तकलीफदेह है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता और भ्रष्टाचार कम करने व उस पर अंकुश लगाने के मामले में हम लगातार पिछड़ रहे हैं। विदेशी बैंकों में अकूत धन रखने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय से थोड़ी आशाएं बंधी थीं, मगर इस मुद्दे पर संसद की चुप्पी अपेक्षाकृत रूप से उतनी ही आश्चर्यनक रही है।

असमानता बढ़ी

आज जब हम विगत 65 वर्षों से अनवरत एक दिवसीय आजादी के जश्न और लोगों को मिली आजादी की जांच पड़ताल करते हैं तो यह सच्चाई भी सामने आती है कि गांधी ने स्वतन्त्रता के बाद आजादी के जो स्वप्न देखे थे उनका आधार समाज के आखिरी छोर तक रहने वाले लोगों की आजादी से था। परन्तु देश में गैर-बराबरी और असमानता को पाटने के जो माध्यम चुने गये उन्होंने इसे और बढ़ाया। निश्चित ही 1947 के बाद यह देश तमाम उम्मीदों से भरा हुआ था। राष्ट्र के असीमित संसाधन थे तो मुश्किलें भी अपार थीं। इन सबके बावजूद देश कल्याणकारी उत्तरदायित्वों के निर्वहन में असफल रहा। देश की बड़ी आबादी के लिए जो वितरण प्रणाली अपनानी चाहिए थी, वह नहीं अपनायी गई। देश की वितरण प्रणाली पर आज भी अभिजात्य वर्ग का कब्जा आम लोगों के बीच अनेक वंचनाओं को पैदा कर रहा है। संविधान में निहित पंथ-निरपेक्षता मजहब विशेष का संरक्षण मात्र बनकर रह गई है और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा की आड़ में बहुसंख्यकों का उत्पीड़न किया जा रहा है। परिणामत: देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन कराने वाली जिस साम्प्रदायिकता को कमजोर पड़ना चाहिए था, वह राजनीतिक संरक्षण में और ताकतवर होने का अहसास कराती रही। आज देश के वनवासी जिनका प्रकृति के साथ बेहद नजदीकी रिश्ता था उन्हें भी जंगलों से विस्थापित किया जा रहा है। चर्च के षड्यंत्रों के चलते उन वनवासियों का मूल स्वरूप व उनकी संस्कृति के गुम होने का खतरा निरंतर बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री की भाषा में आज वे वनवासी राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं। यह प्रश्न विचारणीय एवं गम्भीर है।

शिक्षा तंत्र में खामी

देश की आजादी के बाद के कालखण्ड में राष्ट्र संचालन, नीति निर्माण, मानव संसाधन का विकास, समता, समानता व  न्याय इत्यादि सामाजिक क्षेत्रों में यदि अनेक प्रकार की चुनौतियां उभरकर सामने आयी हैं तो इसका बहुत बड़ा कारण स्वतन्त्र भारत की शिक्षा के ढांचे को राष्ट्र के स्वभाव के अनुसार विकसित न करना है। शैक्षिक शोध बताते हैं कि यदि किसी राष्ट्र की शिक्षा उस देश के लोगों के मन, मस्तिष्क व संसाधनों के अनुरूप विकसित नहीं की जाती तो वह शिक्षा, तनाव, असामंजस्य और विरोध का बहुत बड़ा स्त्रोत बन जाती है। शिक्षा तभी सार्थक और सोद्देश्य बनती है जब वह राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के व्यापक लक्षणों की ओर उन्मुख हो। देश की आजादी के बाद हमारा स्वप्न था कि यहां बुनियादी शिक्षा अपने राष्ट्र की जड़ों से जुड़ते हुए अपने स्वदेशी मूल्यों, संस्कारों व परम्पराओं का पोषण करेगी। परन्तु यहां राष्ट्रीय विकास हेतु जिस विदेशी मॉडल का अनुकरण किया गया उससे हमारी मातृृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा पृष्ठभूमि में चली गयी और मैकाले पद्धति से जुड़ी अंग्रेजी शिक्षा आत्मसम्मान का साधन बन गयी। देश में बुनियादी शिक्षा के ढांचे के लगातार कमजोर होने का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि उससे हमारी माध्यमिक व उच्च शिक्षा भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही। अभी हाल ही में प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी पांच से भी अधिक रपटें प्रस्तुत हुईं। उन रपटों से साफ पता लगता है कि गांव-गांव में कुकुरमुत्तों की तरह फैलती इन अंग्रेजी शिक्षण संस्थाओं के सामने सरकारी प्राथमिक स्कूलों की दुर्दशा बेहद चिंताजनक है। आज प्राथमिक शिक्षा का मूल उद्देश्य मध्याह्न भोजन, वेशभूषा, साइकिल और पाठ्यपुस्तकों के लालच से सरकारी स्कूलों में प्रवेश बढ़ाने तक सीमित होकर रह गया है। यह वैश्विक दौर का ज्ञानाश्रित समाज है, जहां वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कालखण्ड में गुणवत्तापूर्ण व कौशलयुक्त शिक्षा बेहद जरूरी है। बच्चे के सर्वांगीण विकास को नकार कर वर्तमान शिक्षा पाठ्यक्रम को रटने-रटाने तथा अच्छे अंक प्राप्त करने तक सीमित होकर रह गयी है। आज देश में मानव संसाधन विकास का बहुत बड़ा ढांचा विकसित है। मानव संसाधन को विकसित करने के लिए आज केन्द्र और राज्य सरकारों की अनेक संस्थाओं में प्रतिस्पर्धा का माहौल है। बहुत बड़ा साहित्य बाजार में विक्रय हो रहा है। परन्तु हम यह विस्मृत कर बैठे हैं कि मानव संसाधन का विकास हमारे परिवारों के मूल्यों और संस्कारों तथा स्कूली शिक्षा के माध्यम से पाठ्यक्रम की विषयवस्तु और वहां के माहौल से होता है। वस्तुस्थिति यह है कि हमने अपने देश की गौरवगाथाओं को विस्मृत करके देश के इतिहास को भौगोलिक सीमाओं में बांध लिया है। देश की पीढ़ी को विद्यालयों व महाविद्यालयों में जो इतिहास पढ़ाया गया इससे राष्ट्र का गौरव बोध घायल हुआ और देश के महापुरुष पाठ्यक्रम के माध्यम से मात्र परीक्षा की विषयवस्तु बन गए। वास्तविकता यह है कि देश की आजादी के बाद राष्ट्र, राष्ट्रीयता और श्रेष्ठ राष्ट्रीय मूल्यों के निर्माण करने की योजना कहीं न कहीं पृष्ठभूमि में चली गयी। यही कारण है कि राष्ट्र, भारतमाता, स्वदेशी मूल्य, संस्कार, धर्म, दया-करुणा, वात्सल्य व अहिंसा जैसे भारतीय मूल के शब्द आज कमजोरी का परिचय दे रहे हैं तथा स्वदेशी ज्ञान परम्परा का स्रोत निरन्तर सूख रहा है।

आजादी बनाए रखने के प्रयत्न

आजादी केवल शारीरिक रूप से स्वतन्त्र होने का नाम नहीं है, वह तो एक अवस्था है जो उस देश के माहौल के सापेक्ष होती है। आजादी एक बार हासिल होने के बाद शांत नहीं रहती। उसको बनाए रखने के लिए लगातार प्रयत्न करने होते हैं। 15 अगस्त, 1947 को हमें राजनीतिक आजादी मिली, परन्तु देश की आजादी के बाद सामाजिक रूप से मिलने वाली हमारी आजादी अनेक चुनौतियों से घिरती चली गयी। अपनी आजादी को बनाए रखने के लिए जो भी प्रयास हुए उन प्रयासों से राजनीतिक स्वतन्त्रता तो मिली, परन्तु यह स्वतन्त्रता भ्रष्टाचार में लिप्त होकर पूरी भारतीयता को लांछित करती रही। यह इसी का परिणाम रहा कि 1975 में जयप्रकाश नारायण ने देश के नौजवानों को साथ लेकर दूसरी आजादी तथा 2011 में भ्रष्टाचार के नाम पर अण्णा हजारे ने आजादी की जिस तीसरी लड़ाई का शंखनाद किया वह आज भी जारी है। देश की आजादी के 65वें वर्ष पर देश के सामने जो सामाजिक चुनौतियां हैं, उनके समाधान यदि हमें इसी व्यवस्था में रहते हुए ढूंढने हैं तो यह दिव्यस्वप्न जैसा है क्योंकि इस व्यवस्था ने ही तो ये चुनौतियां खड़ी की हैं।

पुरुषार्थी नागरिक बनें युवा

राष्ट्र एकांगी समाज है। इस राष्ट्र के सभी अंग स्वस्थ रूप से कार्य करते रहें। इसके लिए यह बहुत आवश्यक है कि इस देश में ऐसे युवाओं को पुरुषार्थी नागरिकों के रूप में विकसित किया जाए जो राष्ट्र के प्रहरी बनकर इस भारतमाता के समक्ष लम्बित चुनौतियों का सामना करते हुए उसके सम्मान की रक्षा कर सकें। आज भारत देश की सम्पूर्ण जनसंख्या का आधे से भी अधिक भाग युवाओं का है। सच्चाई यह है कि युवाओं की सक्रिय भागीदारी समकालीन समाज में सामाजिक हलचल और राजनीतिक दिशा बोध का आवेगमय सूचकांक होती है। आंकड़े साक्षी हैं कि 1980 में दशक के बाद युवा राजनीति का सूचकांक राजनीतिक पटल से गायब हो गया। युवा राजनीति स्वतन्त्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सरदार भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्लाह, चन्द्रशेखर आजाद आदि कुछ ऐसे नाम रहे हैं जिन्होंने देशप्रेम के जज्बे के साथ देश पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए। परन्तु देश की आजादी के बाद के कालखण्ड में राजनीति में बढ़ते परिवारवाद, जाति व मजहब  से जुड़ी राजनीति में अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का प्रवेश तथा भाई-भतीजावाद इत्यादि ये कुछ ऐसी घटनाएं रहीं जिन्होंने भारतीय राजनीति का चेहरा बदरंग कर दिया। सम्पूर्ण युवा जगत इस समय तनाव के दौर से गुजर रहा है और उनकी असहमतियों के स्वरों को दबाए जाने के प्रयास भी जारी हैं। शोचनीय विषय यह है कि यहां का मतदाता युवा है, परन्तु देश का नेतृत्व अभी भी उन राजनेताओं के हाथों में दिए जाने की कवायद है जो 60 व 70 वर्ष की उम्र पहले ही पार कर चुके हैं। स्मरण रहे कि वर्तमान में देश के समक्ष मुंहबाये खड़ी इन सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए कोई देवदूत नहीं आने वाला है। यह राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक समाज और संस्थाओं का दायित्व है कि वह इस पीढ़ी के समक्ष इस देश के उज्ज्वल, वीरतापूर्ण इतिहास तथा देश के सनातन मूल्यों से ओतप्रोत जीवन से जुड़े परिदृश्य को उनके समक्ष प्रस्तुत करें। बाजारू व्यावसायिक शिक्षा नौकरी के लिए तो बेहतर हो सकती है, परंतु जहां तक पीढ़ी के निर्माण का प्रश्न है तो उसके लिए हमें वर्तमान पाठयक्रम को देश की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा के ढांचे में ढालना होगा। तभी हम राष्ट्र के समक्ष उभरती इन नूतन चुनौतियांे का सामना करने के लिए इस पीढ़ी को समर्थ बना पाएंगे। कुल मिलाकर कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि हम आजादी की इस वर्षगांठ के अवसर पर नए स्वप्नों का भारत बनाना चाहते हैं तो हमें ज्ञान की ऐसी परम्परा विकसित करनी होगी जिसकी जड़ें भारत की धरती में हों तथा जो हमारे विचार, व्यवहार और समस्त जीवन में लोकतान्त्रिक चेतना को विकसित करें। ऐसे माहौल से निश्चित ही ऐसी उर्वरा भूमि तैयार होगी जिसमें से सच्ची मानवीय स्वतन्त्रता से जुड़ी आकांक्षाओं का प्रस्फुटन होगा।

(लेखक महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय,मुरादाबाद में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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