गवाक्ष
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हिन्दी भवन का कवि सम्मेलन
राजधानी दिल्ली में सुरुचिपूर्ण साहित्यिक आयोजनों के संयोजन के सन्दर्भ में एक दीप्तिमन्त संज्ञा है- हिन्दी भवन। श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति के द्वारा संचालित इस भवन में वर्ष भर हिन्दी के साहित्यिक समारोह राजधानी को स्वस्तिकर साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेशनाएं प्रदान करते रहते हैं। भवन में स्थापित वाग्देवी की मंगलमयी प्रतिमा तथा दीवारों पर सुसज्जित हिन्दी साहित्य के दिग्पालों के नयनाभिराम चित्र चित्त को अद्भुत शान्ति प्रदान करते हैं। न्यास समिति के मंत्री सुप्रसिद्ध साहित्यकार गोविन्द व्यास निरन्तर सचेष्ट रहते हैं कि देश के विविध अंचलों में साधनारत साहित्यिक प्रतिभाओं को हिन्दी भवन में आमंत्रित किया जाए और आमन्त्रित संभ्रान्त श्रोता वर्ग के समक्ष उन्हें सादर प्रस्तुत किया जाए। इन दिनों कर्नाटक के राज्यपाल रहे और वर्तमान में 'साहित्य अमृत' का सम्पादन संभाल रहे वयोवृद्ध साहित्यानुरागी श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी के समिति के अध्यक्ष बन जाने से जैसे हिन्दी भवन को एक सुधी संरक्षक की उपलब्धि हो गई है। पिछले दिनों हिन्दी भवन में आयोजित एक काव्य-समारोह में मुझे एक साहित्यिक परिदृश्य का हिस्सा बनकर आनन्दित होने का अवसर मिला। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अनीस अहमद की अध्यक्षता में सर्वश्री डा. कुंअर बेचैन, रामेन्द्र त्रिपाठी, महावीर द्विवेदी, सर्वेश चन्दौसवी, मक्खन मुरादाबादी, कुंअर जावेद, बलराम श्रीवास्तव, डा. कमल मुसद्दी तथा श्रीमती अलका सिन्हा ने काव्य-पाठ करते हुए हिन्दी की वाचिक परम्परा के मंच पर विविध काव्य-विधाओं, रसों और प्रस्तुति भंगिमाओं के गहरे रंगों से जैसे अनूभूति के नीलाकाश पर अभिव्यंजना के इन्द्रधनुष की अवतारणा कर दी। मुझे भावमय श्रोताओं और प्रभावमय रचनाकारों से आपूरित इस कार्यक्रम में मंच संचालन का उत्तर दायित्व निभाकर सुख मिला।
डा. कुंअर बेचैन की वाणी-वन्दना से प्रारम्भ इस आयोजन में जब मैनपुरी से पधारे युवा कवि बलराम श्रीवास्तव ने समकालीन मंच के क्षरण की तरफ तर्जनी उठाते हुए पढ़ा-
भावनाओं का अवसान हो जाएगा,
काव्य का रूप अनजान हो जाएगा,
चुटकलों को अगर हमने कविता कहा,
गीत का गांव वीरान हो जाएगा।
तो समस्त सभागार स्वीकृति की करतल ध्वनियों में बदल गया। डा. कुंअर बेचैन के गीतों की संवेदना और रामेन्द्र त्रिपाठी की रचनाओं की रागात्मकता ने जहां हिन्दी नवगीत और परम्परागत गीत की पुष्टता को रूपायित किया, वहीं कुंवर जावेद का एक मुक्तक अपने सम्यक सन्दर्भों में पाकिस्तानी प्रवासियों को प्रबोध देता प्रतीत हुआ-
किसी के जाने से
किस्से नहीं बदल जाते
कि सूर्य ढलने से
साये नहीं बदल जाते,
सुनो तो मिट्टी की खुशबू
ये कह रही है कुछ
जगह बदलने से
पुरखे नहीं बदल जाते।
मक्खन मुरादाबादी के व्यंग्यों की धार और सर्वेश चन्दौसवी के प्रभावी अशआर के परिपार्श्व में जब नई कविता की श्रेष्ठ प्रस्तुतियां डा. कमल मुसद्दी तथा श्रीमती अलका सिन्हा के माध्यम से सामने आईं तो स्त्री-विमर्श को तेजस्विता के अभिनव संस्पर्श प्राप्त हो गए। शारीरिक पीड़ाओं के कारण मंचों से लगभग अनुपस्थित चल रहे गीतकार महावीर द्विवेदी की उपस्थिति तथा पूरी क्षमता के साथ अपनी सुप्रसिद्ध रचनाओं का पाठ इस काव्य-मंच की एक उल्लेख्य विशेषता थी। अध्यक्षीय वक्तव्य के अतिरिक्त अनीस अहमद साहब की कविता-पंक्तियां भी मन में जगह बना गई-
सर कटा दो तबाह हो जाओ
तुमसे मजहब का ये सवाल नहीं,
जी के दिखलाओ धर्म की खातिर
जान देना कोई कमाल नहीं।
समाज के सभी वर्गों के सुधी साहित्यानुरागियों की सन्निधि में व्यतीत हुई राजधानी की यह संध्या स्मृति में उषा बनकर विराजित है।
गुमनाम विक्रमादित्य की काव्यात्मक गाथा
मुगल काल में दिल्ली के शासक बने हेमू बक्काल की शौर्य-गाथा प्रस्तुत करने वाला खण्ड काव्य 'गुमनाम विक्रमादित्य' (प्रकाशक-असीम प्रकाशन, 167, मालीवाड़ा, गाजियाबाद, उ.प्र., मूल्य-175.00 रु.) हाल ही में प्रकाशित होकर आई है। कवि की दृष्टि में यह एक अल्पज्ञात राष्ट्रीय सेनानी को श्रद्धान्वित प्रणति निवेदित करते हुए उसकी प्रेरक स्मृति को अर्पित आस्था का अर्घ्य है। 'अर्चन अपना-अपना', 'लापता है छांव' तथा 'शब्दों के संकल्प' जैसी-गीत-गजल और दोहा कृतियों के सर्जक सुकवि प्रेम निर्मल के इस खण्ड काव्य को डा. कुंअर बेचैन ने 'राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े प्रेरणाप्रद कथानक का इतिवृत्तात्मक आलेख' कहकर पुकारा है तो प्रख्यात पत्रकार-साहित्यकार-आध्यात्मिक चिन्तक शिवकुमार गोयल का विश्वास है कि यह रचना नई पीढ़ी के हृदय में देशभक्ति-भाव को जाग्रत करने में पूर्णरूपेण सक्षम सिद्ध होगी। स्वयं कवि का आत्मकथ्य है-
'इस खण्ड-काव्य के नायक हेमू बक्काल की शौर्य-गाथा लिखने का मेरा उद्देश्य यह रहा है कि मैं नवयुवकों का आह्वान करके उनको राष्ट्रीय भावना की नवीन शक्ति प्रदान कर सकूं।… मुझे विश्वास है कि मेरे इस प्रयास से हेमू बक्काल नाम के इस शहीद की शौर्य-गाथा हम सभी को देशभक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित ही नहीं करेगी, बल्कि हमारा दिशा-निर्देशन भी करेगी।' इस काव्य की एक बानगी देखिए-
वह जिधर चला निर्भीक चला
वह अपनी लक्षित लीक चला,
आंधी ही क्या तूफान प्रबल
हर कोई उससे सीख चला
बाइस युद्धों के महावीर
उस देशभक्त बलिदानी को
शत–शत प्रणाम, शत–शत प्रणाम।
वह अपने युग का नेता था
उस युग का पंथ–प्रणेता था,
हिन्दुत्व राज्य की नींव धरी
वह ऐसा भाग्य विजेता था
उसकी यादों के साथ–साथ
उसकी हर एक निशानी को
शत–शत प्रणाम, शत–शत प्रणाम।
सात वर्गों में निबद्ध इस खण्ड काव्य का प्रारम्भ मंगलाचरण, देश-वन्दना और हेमू-वन्दना से होता है। प्रथम सर्ग में प्रस्तावना है, कथारम्भ है। हुमायूं के शासन, उसके संकट, अकबर के जन्म तथा हुमायूं के ईरान प्रस्थान तक की कहानी है। द्वितीय सर्ग में शेरशाह के वंशजों के आपसी झगड़े, हेमू की अपनी पत्नी से अन्तरंग बातचीत तथा हेमू के रण-कौशल का वर्णन है। तृतीय सर्ग में हुमायूं के दिल्ली पर पुन: अधिकार तथा उसकी मृत्यु की कहानी है तो चतुर्थ सर्ग में अकबर के राज्याभिषेक तथा युद्धों एवं प्राकृतिक प्रकोपों से पीड़ित देश की दशा का अभिव्यंजन है। पंचम सर्ग में मां की प्रेरणा, हेमू की सफलताओं और उसके राज्याभिषेक का काव्यमय इतिहास है। छठे सर्ग में हेमू की सेना, मुगलों की सेना और पानीपत के युद्ध का चित्रण है तथा सातवां सर्ग अकबर के दरबार तथा अकबर-हेमू संवाद को प्रस्तुत करता है। परिशिष्ट के अन्तर्गत विदेशी इतिहासकारों के पक्षपातपूर्ण वर्णन पर टिप्पणी के अतिरिक्त विजेता के रूप में हेमू के दिल्ली प्रवेश पर गाया गया अभिनन्दन-गीत है।
इस काव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता सहज सम्प्रेषण की सामर्थ्य वाली कवि की प्रवाहमयी भाषा है। कवि ने काव्य के प्रारम्भ में माता वाणी से प्रार्थना की है-
मातु शारदे आपको अर्पित काव्य–प्रबंध,
वर दो फैले देश में हेमू–शौर्य–सुगन्ध।
कवि की यह प्रार्थना परिपूर्ण हो-यही मंगलकामना है।
अभिव्यक्ति मुद्राएं
मेरे आंगन में अक्सर एक चिड़िया गुनगुनाती है,
अधूरे हैं मेरे सपने बताकर लौट जाती है।
मैं ऊंचे पर्वतों की कन्दराओं में छिपा बैठा,
मेरे आंगन की मिट्टी आज भी मुझको बुलाती है।
– डा. किशन तिवारी
वही जो हो नहीं पाया उसे इस बार करना है,
थकानों का ये दरिया हौसलों से पार करना है।
हमारा काम है बाजार में भी आदमी गढ़ना,
तुम्हारा काम घर– आंगन को भी बाजार करना है।
–विनय मिश्र
दुखती आंखों में ख्वाब कौन रखे,
जिन्दगी का हिसाब कौन रखे।
–शिवनारायण बन्धु











