यूं खड़ा हो गया जंगल
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यूं खड़ा हो गया जंगल
द्र अनिल सौमित्र
मध्य प्रदेश में पर्यावरण की रक्षा के लिए किस तरह के कार्य हो रहे हैं, और इसमें कैसे-कैसे लोग लगे हैं, इन सबकी बड़ी रोचक व प्रेरक जानकारी इस रपट में है। आगे के पृष्ठों में अन्य प्रांतों की ऐसी ही पर्यावरण कथाएं प्रस्तुत हैं- सं.
वाह रंगा!
नरसिंह रंगा भले अल्प शिक्षित हों, लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी सोच और काम देखकर बड़े-बड़े पर्यावरणविद् अचंभित हो जाते हैं। आठवीं कक्षा पास करने के बाद रंगा मामा के साथ लकड़ी के व्यवसाय से जुड़ गए। लकड़ी की कटाई के लिए मध्य प्रदेश के जंगलों में घूमते रंगा के मन में एक दिन यह विचार आया कि हर आदमी जंगल काटने पर आमादा है। आखिर जंगल लगाने वाले भी तो होने चाहिए। जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर नर्मदा किनारे बसे ग्राम बासनियाकलां के पास उनकी थोड़ी जमीन थी। उन्होंने देखा कि हर साल नर्मदा की बाढ़ में उनकी जमीन कटती जा रही है। वह परेशान हो उठे। उन्होंने इस जमीन को बचाने की ठान ली। सन् 1992 से उन्होंने नर्मदा के किनारे की जमीन पर बांस के पौधे रोपे। पौधे रोपने का नशा ऐसा चढ़ा कि वह नर्मदा किनारे जमीन खरीदते गए और पौधे रोपते गए। करीब दस साल में उन्होंने एक हजार एकड़ जमीन खरीदकर उस पर जंगल खड़ा कर दिया। इस समय इस जमीन पर लाखों की तादाद में बांस, खमेर, नीलगिरी के पेड़ खड़े हैं। यह सब उन्होंने बिना किसी शासकीय या गैर शासकीय मदद के किया है। जंगल से जमीन पर कटाव तो रुका ही, अब यह जंगल उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी बन गया है। वह इससे हर साल लाखों रुपए कमाते हैं। उनके जंगल को देखने प्रदेश और देश के कई पर्यावरणविद् और जंगल महकमे के अधिकारी आ चुके हैं। कई विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी “रंगा प्लांटेशन” का भ्रमण कर उसकी प्रशंसा कर चुके हैं। रंगा कहते हैं कि नर्मदा को बचाना है तो उनके दोनों किनारों पर सघन हरित पट्टी विकसित करनी होगी। इससे नर्मदा भी बचेगी और कटाव भी रुकेगा। खेती को यदि लाभ का धंधा बनाना है तो इससे बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है। रंगा ने जंगल की देखरेख के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। नजदीकी ग्रामीणों को सब्जी और फसल उगाने के लिए वह जमीन नि:शुक्ल उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण जंगल की देखरेख करते हैं और चोरी जैसी घटनाएं नहीं होतीं।
अनूठी परम्परा
जबलपुर में सामाजिक संस्था “कदम” ने एक अनूठी परम्परा की शुरुआत की है। यह परम्परा है जन्मदिन पर पेड़ लगाना। यह अभियान 17 जुलाई, 2004 से जबलपुर में शुरू किया गया। इस अभियान में कई जानी-मानी हस्तियां भी पौधारोपण कर जन्मदिन मना चुकी हैं। इनमें गायत्री परिवार के मुखिया डा. प्रणव पंड्या, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी, पूर्व महापौर विश्वनाथ दुबे शामिल हैं। अभी तक सैकड़ों लोग पौधा रोपकर अपनी सालगिरह मना चुके हैं। इस अभियान को समय प्रबंधन की भी मिसाल माना जाता है। कदम संस्था के योगेश गनोरे ने इस क्रम को उस वक्त भी रुकने नहीं दिया, जब उनका एकमात्र बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। कारवां चलता गया और लोग जुड़ते गए। अब यह अभियान जबलपुर से बाहर निकलकर गाडरवारा, दमोह, टीकमगढ़, कटनी, भोपाल और बड़वानी तक पहुंच गया है। कदम संस्था के सदस्य कनाडा, अमरीका और रूस में भी पौधे लगाकर अपना जन्मदिन मना रहे हैं। उनकी हसरत इस अभियान को पूरी दुनिया में पहुंचाने की है।
योगेश गनोरे के मन में जन्मदिन पर पौधा लगाने की कल्पना 25 वर्ष पहले आई। इस कल्पना को मूत्र्तरूप देने के लिए उन्होंने अपने परिचितों और मित्रों को जन्मदिन पर पौधा लगाने के लिए पोस्टकार्ड लिखना शुरू किया। उनका जन्मदिन 17 मई को आता है। गर्मी में पौधा लगाना और उसे बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती थी। उन्हें जब इस काम में सफलता मिलने लगी तो उनके मन में खयाल आया कि यह रोज क्यों नहीं हो सकता। जबलपुर के तत्कालीन महापौर विश्वनाथ दुबे को यह खयाल इतना पसंद आया कि वह पौधों की सुरक्षा के लिए “ट्री गार्ड” देने के लिए राजी हो गए। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा। कदम संस्था के अभियान का 1000वां पौधा 12 अप्रैल, 2006 को जबलपुर के भंवरताल गार्डन में रोपा गया, जिसकी सुरक्षा के लिए गार्ड लगाया गया। योगेश गनोरे का सपना दुनिया को युद्ध से मुक्त करने का है। इस सपने को पूरा करने के लिए वह इजरायल और फिलीस्तीन के बीच गाजापट्टी पर “प्लांट फॉर पीस” लगाना चाहते हैं। इस अभियान में उनकी दुनियाभर के राजनयिकों को बुलाने की योजना है। उनका कहना है कि जिस दिन वह इसमें कामयाब होंगे, उनकी जिंदगी का वह सबसे खुशनुमा लम्हा होगा।
वृक्ष मन्दिर
यह एक ऐसा मंदिर हैं जहां पत्थर के देवता नहीं, वृक्ष देवता निवास करते हैं। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले से लगभग 10 किलोमीटर दूर अमरावती सड़क पर स्थित है दरियापुर। इसी के पास है बड़गांव में वृक्ष मंदिर। स्वाध्याय परिवार ने स्थापित किया है वृक्ष मंदिर। वृक्ष मंदिर विविधता वाले वृक्षों के बीच स्वाध्याय स्थली है। यह मंदिर गांव को सिर्फ हरियाली ही नहीं देता, बल्कि ग्रामीणों को उच्च संस्कार और नैतिकता भी देता है। सिर्फ भौतिक पर्यावरण नहीं, सामाजिक और आध्यात्मिक पर्यावरण का शुद्धिकरण भी हो रहा है। गांव में अब सामाजिक पर्यावरण का संतुलन बन गया है। लोग बेमतलब की बातें नहीं करते, गांव को लड़ाई-झगड़े से निजात मिलने लगी है। गांव के स्वाध्यायी अब सिर्फ परिचित नहीं रहे, वे आपस में मित्र बन गए हैं। प्रत्येक स्वाध्यायी ऊंच-नीच और जातिवाद की संकीर्णताओं से दूर होने लगा है। वे अपराध और व्यसन से मुक्त होने लगे हैं। स्वाध्याय परिवार की संयोजिका जयश्री तलवरकर ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी।
सांदीपनी आश्रम और वृक्ष मंदिर के नाम से विख्यात स्वाध्याय परिवार का यह प्रकल्प लगभग 20-22 एकड़ में फैला हुआ है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह पूरा क्षेत्र पहले बंजर भूमि थी। लेकिन स्वाध्याय परिवार की पहल और गांव के लोगों की तपस्या ने इस बंजर भूमि को भी हरा-भरा कर दिया। आज भी गांव के अनेक परिवार यहां प्रतिदिन सेवाकार्य के लिए आते हैं।
रद्दी कागज का उपयोग
पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के लिए मिथेन गैस को भी जिम्मेदार माना जाता है। इसके दुष्प्रभाव को कम करने के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक अनूठा प्रयोग किया जा रहा है। यहां दफ्तरों से रोज निकलने वाले कागजी कचरे को फिर से स्टेशनरी में बदलने का काम शुरू हुआ है। तैयार स्टेशनरी पर्यावरण परिसर के सभी दफ्तरों को उपलब्ध कराई जा रही है। इस प्रकार की स्टेशनरी का अधिक उत्पादन होने पर अन्य सरकारी कार्यालयों को भी उपलब्ध कराई जाएगी। कागजी रद्दी को नई शक्ल में तब्दील करने के पीछे स्टेशनरी को किफायती बनाने के साथ ही पर्यावरण सुधारे जाने का मकसद भी है। यह जानना यकीनन आश्चर्यजनक है कि कागजी कचरा पर्यावरण में घुलकर मिथेन जैसी जहरीली गैस पैदा करता है। इसे कार्बन डाई-ऑक्साइड से 21 गुना ज्यादा घातक माना गया है। भोपाल में “एप्को” की इस पहल का दूसरा लाभ यह है कि सरकारी कार्यालयों को वहीं की रद्दी से अपने उपयोग के लिए साफ और स्वच्छ कागज के रूप में स्टेशनरी प्राप्त हो रही है। कागजी रद्दी को पुन: उपयोग लायक बनाने के लिए किसी प्रकार के रसायन का उपयोग नहीं किया जाता है।
प्लास्टिक-मुक्त प्रदेश
पर्यटन एवं तीर्थस्थलों के साथ शैक्षणिक और सार्वजनिक स्थलों को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए मध्य प्रदेश में वर्ष 2012-13 में “प्लास्टिक-मुक्त मध्य प्रदेश अभियान” चलाया जायेगा। यह अभियान अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस 5 जून से शुरू होगा। मध्य प्रदेश ईको टूरिज्म बोर्ड की बैठक में यह घोषणा मध्य प्रदेश के वन मंत्री सरताज सिंह ने की। इस अभियान में विद्यार्थियों की मदद से आम लोगों को जागरूक करने का भी प्रयास किया जायेगा।
बायोमास से बिजली
मध्य प्रदेश के 29 जिलों में कचरे से 308.10 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। इसके लिए राज्य सरकार के ऊर्जा विभाग ने कुल 34 कंपनियों का पंजीयन किया है और ये निर्माणाधीन हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में बायोमास से बिजली उत्पादन की नीति जारी की गई थी और अब पांच साल बाद इसके क्रियान्वयन की नई नीति जारी की गई है। बायोमास में नगरीय अपशिष्ट यानी कचरे के अलावा भूसी, डंठल, गांठ, पुआल, खोल, छाल, टहनियां, फली, आदि का भी उपयोग होता है। बायोमास दरअसल कार्बन, हाइड्रोजन एवं आक्सीजन का मिश्रण है। एक जानकारी के अनुसार देश में 32 प्रतिशत ऊर्जा बायोमास से ही मिलती है तथा इस पर देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या निर्भर है। नई क्रियान्वयन नीति में प्रावधान किया गया है कि वन क्षेत्र से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर बायोमास बिजली उत्पादन संयंत्र स्थापित किया जा सकेगा तथा यह संयंत्र अधिकतम पंद्रह मेगावाट बिजली का उत्पादन कर सकेगा। यदि बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी स्वयं की कृषि से बायोमास प्राप्त करती है तो यह जिले में उपलब्ध कुल बायोमास के अतिरिक्त माना जाएगा। नई क्रियान्वयन नीति के तहत बायोमास संयंत्र को उद्योग का दर्जा मिलेगा तथा इसे उद्योग संवद्र्धन नीति के सभी लाभ प्राप्त हो सकेंगे। संयंत्र चालू होने के बाद दस वर्ष तक विद्युत कर एवं उपकर की छूट दी जाएगी। परियोजना की अनुमति मिलने के बाद दो साल में बिजली उत्पादन करना जरूरी है।
चमत्कारी कागज
मीरा सिंह गृहिणी हैं और एक बड़े पुलिस अधिकारी की पत्नी। लेकिन पर्यावरण और महिलाओं के प्रति कुछ करने की तमन्ना ने उन्हें समाज के बीच ला खड़ा किया। समीरा संस्था और पत्रिका के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को सशक्त व जागरूक करने तथा पर्यावरण के प्रति लोगों में संवेदना व चेतना विकसित करने का बीड़ा उठाया है। “समीरा” से जुड़े कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी को उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक के झंडों का विरोध किया और संकल्प किया कि प्लास्टिक के राष्ट्रीय ध्वज का प्रचलन कम करेंगे। मीरा सिंह बताती हैं कि प्लास्टिक के झंडे पूर्ण रूप से नष्ट नहीं हो पाते और बाद में ये यहां-वहां बिखर जाते हैं और कई बार लापरवाही, भूल और अनजाने में ये झंडे लोगों के पैरों तले कुचले जाते हैं और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान होता है। समीरा संस्था के द्वारा मीरा सिंह ने प्लास्टिक की बजाए कागज के झंडों को प्रचलन में लाने के लिए कई उपाए किए।
मीरा सिंह के अनुसार समीरा पत्रिका का प्रकाशन पिछले पांच वर्षों से लगातार हस्तनिर्मित (ईकोफ्रेडली) कागज से ही किया जा रहा है। छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण के काम में लगीं मीरा सिंह के अनुसार साधारण कागज का निर्माण पेड़ों की लुगदी से होता है। विश्व के काटे गए 35 प्रतिशत पेड़ कागज व्यवसाय की बलि चढ़ जाते हैं। एक शोध के अनुसार एक टन कागज के लिए 17 पूर्ण विकसित वृक्ष तथा ढाई हजार गैलन जल की आवश्यकता होती है, जबकि हस्तनिर्मित कागज रद्दी, चिंदियों से निर्मित होता है और निर्माण की प्रक्रिया भी प्रदूषण-रहित होती है। मीरा सिंह के नेतृत्व में समीरा संस्था ने पॉलीथीन के खिलाफ अभियान भी चला रखा है।
समीरा पत्रिका की शुरुआत अगस्त 2005 में हुई थी। खास तरह के कागज पर छापने की शर्त की वजह से कोई भी प्रेस इसे छापने को तैयार न था। चूंकि हाथ से तैयार कागज की सतह खुरदरी होती है, यह बहुत अधिक स्याही सोखता है। इसके अलावा यह “शीट” की जगह “रोल” में उप्लब्ध होता है। ऐसी कई बातें हैं, जो प्रकाशन की प्रक्रिया को मुश्किल बनाती हैं। लेकिन पर्यावरण की खातिर हर मुश्किल स्वीकार की मीरा सिंह और उनके सहयोगियों ने।
पहाड़ी और हरियाली
झाबुआ जिले के पेटलावद क्षेत्र के ग्राम रूपापाड़ा के वासियों ने 13 वर्ष पूर्व बंजर पहाड़ी पर हरियाली फैलाने का बीड़ा उठाया। करीब 20 हेक्टेयर पथरीली जमीन पर उन्होंने सबसे पहले गड्ढे खोदने की शुरुआत की।
पानी, मिट्टी एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में जुटी स्वयंसेवी संस्था “संपर्क” ने ग्रामीणों को हरियाली कार्य के लिए प्रेरित किया। 14 हजार पौधे वितरित किए। इनमें खैर, नीम, अकेशिया, सिरस, अंजन आदि प्रजातियों के पौधे शामिल थे। ग्रामीणों ने रोपित पौधों की सुरक्षा के लिए निर्णय लिया कि श्रमदान करने वाले परिवारों का एक-एक सदस्य हर सप्ताह पौधों की देखभाल करेगा। ग्रामीणों ने उक्त भूखंड पर नाला, बांध आदि के माध्यम से भू-कटाव रोकने व जल संरक्षण के प्रयास भी किए। सामूहिक रूप से उठाए गए इस कदम से रूपापाड़ा और कालीघाटी क्षेत्र के भूजल स्तर में वृद्धि हुई है। इससे हैंडपंप व कुएं पुनर्जीवित हुए। वहीं उक्त चारागाह में स्टालोहेमेटा, दीनानाथ और देशी घास लगाई गई। गांव के लोग घास का उत्पादन भी सहकारिता के आधार पर करते हैं। गांव में प्रतिवर्ष करीबन 50 हजार रु. का घास उत्पादन होता है। वर्ष 2003 में अल्पवर्षा के कारण जलस्रोत सूख गए थे। ऐसे में वृक्षों को बचाना मुश्किल हो गया था। ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने गोठानिया तालाब से पानी मुहैया कराने की मांग रखी। तत्कालीन एसडीएम बीएल कौल ने चारागाह निरीक्षण करने के बाद तालाब का पानी उपयोग करने की अनुमति दे दी। फिर ग्रामीणों ने टैंकर से पानी पिलाकर वृक्षों को जिंदा रखा। आज यही जंगल उनकी धरोहर बन गए हैं। कालीघाटी के सरपंच बद्दा भाई कहते हैं कि उक्त कार्यों से क्षेत्र के भूजल स्तर में वृद्धि हुई है। ग्रामीण तेजूबाई गामड़ कहती हैं कि ग्रामीणों ने मिलकर बिगड़ते पर्यावरण को सुधारने की पहल की है। इसका नतीजा सामने है। एक अन्य ग्रामीण बीजल नाथा ने बताया कि चारागाह विकास के कारण पशुओं को पौष्टिक चारा मिलता है, वहीं ग्राम में पशुओं की संख्या भी बढ़ गई है।
एक लाख पौधे
मध्य प्रदेश के नीमच जिले के मनासा नगर में आनंद मानावत 15 साल से हरियाली के लिए काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों से इस दौरान मनासा में करीब एक लाख पौधे लगाए जा चुके हैं, जिनमें से कई आज बड़े वृक्ष बन गए। आनंद मानावत ने 1996 में अपने मित्रों के साथ मिलकर “पर्यावरण मित्र” संस्था का गठन किया। आनंद बताते हैं कि बंजर भूमि और हरे-भरे पेड़ों को कटते देखकर उनके मन में क्षेत्र को फिर से हरा-भरा करने की ललक जागी थी। पहले वे अकेले ही पौधे लगाते थे लेकिन संस्था के गठन के बाद उन्होंने पौधे लगाने के काम को अभियान की तरह शुरू किया। आनंद बताते हैं कि शुरू में आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ा। पौधे खरीदने और उसकी देखभाल में पैसा खर्च करना पड़ता था। कई बार खुद की जेब से तो कई बार समाज ने आगे आकर मदद की। संस्था के गठन के बाद यह समस्या थोड़ी कम हो गई। मनासा और आसपास के क्षेत्र में पर्यावरण मित्र का काम देखकर कई लोग मदद के लिए आगे आए। संस्था ने मनासा के आसपास के गांव भाटखेड़ी, ढढेड़ी, शेषपुर, कचौली, बड़ीयां सहित अन्य गांवों में पौधे लगाए। पौधारोपण मंदिर, स्कूल, पार्क, श्मशान और सड़क किनारे किया गया। शेषपुर में तो बाकायदा पर्यावरण पार्क का विकास किया गया।
पर्यावरण-प्रेमी अरुण
जीवाजी विश्वविद्यालय में सहायक रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत अरुण सिंह ने पर्यावरण की चिंता के लिए एक मित्र-मण्डल का गठन किया है। वे सरकारी सेवा के बीच पर्यावरण सेवा के लिए भी खूब समय निकालते हैं। ग्वालियर क्षेत्र की तमाम पहाड़ियों और वनभूमि पर उन्होंने और उनके मित्र मण्डल ने पेड़ लगाए हैं। अरुण सिंह कहते हैं कि उनके लगाए 99 पौधे पेड़ बनते हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण की अभी चिंता नहीं की गई तो बहुत देर हो जाएगी तब फिर हमारे हाथ कुछ नहीं होगा। मानव सभ्यता की रक्षा करनी है तो पर्यावरण की रक्षा के लिए आगे आना ही होगा। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए बहुत हाथ हैं, लेकिन उसके संवर्धन के लिए कुछ ही हैं। इसलिए जो भी पर्यावरण की चिंता कर रहे हैं उन्हें और अधिक जोश-उत्साह से जुटना होगा।थ्











