मध्य पृष्ठ
|
खान-पान
विधि: टमाटर को उबालकर उसका छिलका उतार दें और उसे पीस लें। कार्न प्लोर (मकई का आटा, जौ मैदा जैसा पतला हो) को पानी में घोलकर उसमें पिसे टमाटर, नमक तथा काली मिर्च मिलाकर उसे दुबारा उबालें। 10 मिनट तक उबालने के बाद उसे बिना छाने ही परोसें और ऊपर से हरे धनिये के पत्तों से सजा दें तथा पनीर को छोटे-छोटे चौरस टुकड़ों में काटकर डाल लें। यह सूप 5 लोगों के लिए काफी है।
नोट- पनीर के स्थान पर ब्रेड को चौरस टुकड़ों में तलकर भी उसमें डाला जा सकता है।
द प्रोमिला पोपली
सामग्री
पनीर 20 ग्रा.
टमाटर 250 ग्राम
सफेद काली मिर्च आधा चम्मच
नमक डेढ़ चम्मच
कार्न प्लोर डेढ़ चम्मच
हरा धनिया 2 चम्मच
पानी 4 कप
कब से दें शिशु को “पूरक आहार”
द सुरेन्द्रा अजय जैन
हंसता-खेलता शिशु सभी के मन को लुभा लेता है। हां, जन्म से लेकर पहले छह माह तक केवल मां का दूध शिशु की जरूरतें पूरी कर देता है। छह माह की आयु होते ही शिशु की बढ़ती हुई जरूरतों की पूर्ति करने के लिए “पूरक आहार” देना शुरू करना बहुत ही जरूरी है। याद रहे मां के दूध को भी पूरक आहार के साथ-साथ जारी रखना है, क्योंकि शिशु बहुत तेज गति से बढ़ रहा होता है। इस आयु में शिशु की विकास दर की तुलना, जीवन के अन्य किसी दौर की विकास दर से नहीं की जा सकती। शिशु का शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास बहुत ही तेजी से होता है।
जन्म के समय तीन किलोग्राम वजन का शिशु छह माह की आयु में छह किलो का होना चाहिए। यानी छह माह में वजन जन्म से दोगुना होना चाहिए, जिसे सामान्य कहा जाता है। यही शिशु की अच्छी सेहत का पैमाना है और एक वर्ष की आयु तक उसका वजन तीन गुना यानी 9 किलोग्राम होना चाहिए।
इसी प्रकार शरीर की लम्बाई जन्म के समय से लेकर एक वर्ष तक डेढ़ गुना हो जाती है। जीवन के पहले दो वर्ष में शिशु के मस्तिष्क का विकास पूर्ण सा हो जाता है। इसलिए शिशु के जीवन में पहले दो वर्ष की देखभाल बहुत ही महत्वपूर्ण है।
पहले छह माह तक शिशु की सभी पौष्टिक आवश्यकताएं मां के दूध से पूरी हो जाती हैं। परन्तु कुछ माह की आयु के बाद शिशु की वृद्धि के लिए मां के दूध के साथ-साथ “पूरक आहार” की आवश्यकता होती है जिससे शिशु को पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन व लवण मिल जाते हैं। यह ध्यान रहे कि दो वर्ष की आयु या उससे अधिक आयु तक स्तनपान (मां का दूध) जारी रखा जाए तो शिशु का स्वास्थ्य बहुत ही अच्छा रहता है। महिलाओं को समझना चाहिए कि शिशु के पहले दो वर्ष की परवरिश जीवन भर सफल होने में एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
सूजी, गेहूं का आटा, चावल का आटा, रागी, बाजरा आदि को पानी या दूध में पकाकर, चीनी मिलाकर व घी डालकर “पूरक आहार” बनाएं और शिशु को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में पांच-छह बार खिलाना चाहिए। केला, आम, चीकू, पपीता जैसे फलों को मसल कर खिलाना चाहिए। घर में पौष्टिक लड्डू बनाकर रखें।
पौष्टिक लड्डू
सामग्री – सूजी- 10 ग्राम, बेसन- 50 ग्राम, तिल- 25 ग्राम, आटा- 50 ग्राम, घी- 150 ग्राम, पिसी चीनी- 200 ग्राम।
विधि – तिल सुनहरे होने तक भूनें और मोटा सा पीस लें। घी गरम करके बेसन, सूजी, आटा डालकर भून लें। पिसी चीनी व तिल मिलाकर, छोटे-छोटे लड्डू बनाकर साफ सूखे डिब्बों में रखें और बच्चों को खिलाएं। यह स्वादिष्ट व पौष्टिकता से भरपूर है।द
स्त्री-रत्न
पतिव्रता सुलोचना
वण बड़ा ज्ञानी, विद्वान, वेदों का ज्ञाता, महान पराक्रमी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उसका ज्येष्ठ पुत्र इन्द्रजीत, जो मेघनाद नाम से प्रसिद्ध था, महापराक्रमी, मायावी और एक पत्नीव्रत पालक था। सुलोचना उसी वीर की पतिव्रता पत्नी थी। वह सती साध्वी महिला थी।
कहते हैं युद्ध भूमि में जाने से पूर्व श्रीराम ने लक्ष्मण को चेतावनी देते हुए कहा था, “भैया, युद्ध में तुम मेघनाद का वध करोगे इसमें तनिक भी संशय नहीं है। पर यह ध्यान रखना कि मेघनाद की पत्नी सुलोचना महापतिव्रता और सती है। मेघनाद स्वयं भी अद्वितीय वीर है। यदि कहीं भूल से भी तीर चलाते समय उसका मस्तक भूमि पर गिर पड़ा तो हमारी समस्त सेना का सर्वनाश हो जायेगा और हमारा लंका विजय का स्वप्न संभव नहीं हो पायेगा।”
युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद का वध कर दिया। वीर हनुमान मेघनाद का सिर काट कर शिविर में ले आए। मेघनाद की दायीं भुजा कट कर आकाश मार्ग से उड़ती हुई सुलोचना के सामने जाकर गिर पड़ी। दु:ख से व्याकुल हो सुलोचना करुण स्वर में विलाप करने लगी। व्याकुल सुलोचना ने उस भुजा का स्पर्श नहीं किया। वह कहने लगी, “हो सकता है कि यह भुजा किसी अन्य पुरुष की हो, ऐसी दशा में पर पुरुष के स्पर्श का मुझे पाप लगेगा। अत: तू मेरे समक्ष युद्ध का वृत्तान्त लिख कर बता।”
सुलोचना के पास खड़ी दासी ने हाथ को लेखनी पकड़ा दी। कटी हुई उस भुजा ने युद्ध का पूरा हाल लिख दिया। उसने लक्ष्मण की शक्ति, मेघनाद का शौर्य आदि सारी बातें लिखीं। मेघनाद के शौर्य की गाथा सुन कर सुलोचना आश्वस्त हुई। भुजा ने लिखा- “वीरवर लक्ष्मण ने चौदह वर्ष से पत्नी, भोजन और नींद छोड़ रखी है। वे दैवी गुणों से युक्त हैं। अत: मैं उनका कुछ भी बिगाड़ न सका। मेरा सिर श्रीराम जी के पास उनके शिविर में है।”
सुलोचना पति की मृत्यु पर फूट-फूट कर रोने लगी। उसका विलाप सुन रावण वहां आया। रावण ने सुलोचना को समझाते हुए कहा, “बेटी, तू शोक न कर। सूर्योदय होते ही मैं शत्रु सेना को काट-काट कर रक्त की नदी बहा दूंगा। शत्रु दल के सहस्रों सिर भूमि पर लुढ़कते दिखाई देंगे। कल मैं मेघनाद की मृत्यु का बदला श्रीराम-लक्ष्मण को मार कर लूंगा।”
सुलोचना ने विनीत भाव से उत्तर दिया, “पिताजी, इससे मेरा क्या भला होगा? सहस्रों, क्या करोड़ों शीश भी मेरे पति के शीश की कमी पूरी नहीं कर सकते।” इतना कहकर सुलोचना वहां से दु:खी हृदय उठ कर चली गई। उसने महारानी मन्दोदरी से जाकर कहा, “मां मुझे श्रीराम के शिविर में जाने की आज्ञा दीजिए। मेरे पति का कटा हुआ सिर वहीं उनके शिविर में है।”
सुलोचना से सारी बात सुन कर मन्दोदरी ने उसे श्रीराम के पास उनके शिविर में जाने की आज्ञा दे दी। सुलोचना रथ में बैठ कर श्रीराम के शिविर की ओर चल पड़ी। उसकी सरलता और सुन्दरता को देखकर वानरों एवं रीछों को भ्रम हुआ कि पुत्र की मृत्यु से डर कर रावण ने कहीं सीता को तो नहीं लौटा दिया।
इस पर विभीषण ने सब को बताया कि मेघनाद की पत्नी सुलोचना अपने पति का कटा हुआ शीश लेने श्रीराम जी के शिविर की ओर जा रही है। जब सुलोचना श्रीराम के पास आई, उसके नेत्रों में पानी था और कण्ठ रुंधा हुआ था। श्रीराम उसकी दशा देख दया से पिघल गए। उन्होंने सती को आदर सहित बैठाया और आने का कारण जानना चाहा।
सुलोचना ने रुंधे कण्ठ से दु:खी स्वर में कहा, “मैं अपने पति का मस्तक लेने आपके पास आई हूं।” श्रीराम के आदेश से तुरन्त मस्तक मंगवाया गया और सुलोचना को दे दिया गया। सुलोचना के दोनों नेत्रों से अविरल जल की धारा बह रही थी। पास खड़े लक्ष्मण को देख कर सुलोचना कहने लगी, “लक्ष्मण, तुम अभिमान मत करना कि मैंने मेघनाद को मारा है। संसार में मेरे पति को मारने की शक्ति किसी भी पुरुष में नहीं है। यह युद्ध तो दो पतिव्रता नारियों के बीच था। मेरे पति सती माता सीता का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे, उधर सती माता सीता और उर्मिला की शक्ति मिल कर दुगुनी हो गई। इसी कारण मेरे पति की मृत्यु हुई।”
इधर वानरों आदि को आश्चर्य हो रहा था कि इसे मेघनाद के मस्तक के बारे में कैसे पता चला। कटी भुजा भी लिख सकती है- उन्हें भरोसा न था। वे बोले यदि यह सिर हंसने लगे तो हम विश्वास कर सकते हैं। सुलोचना ने पति की ओर देखा और कहा, “स्वामी, मेरी लाज रखना। अगर मैं मन, वचन और कर्म से आपकी ही दासी हूं तो आप हंस उठें।” मस्तक अट्टहास कर उठा। सब के दिल दहल उठे। तब श्रीराम ने उन्हें पतिव्रता धर्म का मर्म बताया और पतिव्रता की महिमा समझाई।
उधर सुलोचना श्रीराम से विदा लेकर, अपने पति का शीश गोद में रख पालकी में बैठ लंका अपने महल में लौट आई। लंका वासियों ने चन्दन की चिता तैयार की। अपने पति का सिर अपनी गोद में रख सुलोचना आंखें बन्द कर चिता में बैठ गई। उसने मन ही मन श्रीराम का ध्यान किया। उसके शरीर से अग्नि की लपटें फूट पड़ीं। थोड़ी ही देर में सती सुलोचना का शरीर पंचतत्वों में लीन हो गया। उसकी कीर्ति अमर है। सती सुलोचना का नाम आज भी बड़े आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। द
फैशन का मकड़जाल
द राजी सिंह
क्या निजी स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री को कुछ भी पहनने या करने की आजादी दे दी जानी चाहिए? क्या स्त्री के पहनावे की स्त्री के प्रति बढ़ते अपराधों में कोई भूमिका है? इन जैसे अनेक प्रश्नों की चर्चा होती रहती है।
“हम क्या पहनें” के चुनाव की इस आजादी में मेरा पूर्ण विश्वास है। स्त्री को समाज में मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए। उसके मानवाधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। इसी में शामिल है कि वे क्या पहनें और क्या न पहनें? यह तय करने का अधिकार भी उन्हें ही होना चाहिए। इसे उन पर थोपना सरासर अनुचित है। समाज के कुछ वर्गों में जिस तरह “ड्रेस कोड” लागू करने की कोशिश की जाती है, वह मर्यादा-बोध नहीं, स्त्रियों की आजादी पर पहरा लगाने की कोशिश है।
लेकिन आजादी के इस तर्क की एक सीमा भी है। सवाल है आधुनिकता और आजादी का इस्तेमाल किस सीमा तक और किस तरह से हो? आज चारों तरफ स्त्री की आजादी के नाम पर सिर्फ उच्श्रृंखलता ही देखने को मिल रही है। यह कैसी आजादी है जिसकी स्त्री को न जाने क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ रही है? आधुनिक कहलाने की ललक में वह अपनी लज्जाशीलता और मर्यादा तक को दांव पर लगा रही है। स्त्री का व्यक्तित्व “सत्यम् शिवम् सुन्दरम्” की अवधारणा पर आधारित है। यदि स्त्री से ये तत्व पृथक हो जाएं तो उसका वास्तविक स्वरूप ही खो जाता है।
व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में पहनावे के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। भारत में वेशभूषा सदैव ही शोभनीय एवं मर्यादित रही है। पहनावे में ही नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शालीनता वांछनीय है। काल, समाज एवं परिवेश के अनुसार शालीनता के मूल्य बदल सकते हैं, परन्तु स्वयं शालीनता कभी अवांछनीय नहीं हो सकती। शरीर का अपना एक रहस्य है। स्त्री शरीर का रहस्य और भी गहरा है। इस रहस्य को उघाड़ने से लाभ कुछ भी नहीं, बल्कि हानि होने की संभावना ज्यादा है।
भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति गरिमापूर्ण रही है। हमारी ताकत, हमारी शक्ति लज्जा और अस्मिता रही है। ऐसी पोशाक अथवा जीवनशैली को सभ्य या आधुनिक नहीं कहा जा सकता जिसके केन्द्र में शालीनता न हो। बाजार स्त्री को उघड़ा हुआ देखना चाहता है। उसकी धुन पर नाचना न तो आधुनिकता है और न ही स्त्री की जीत। दरअसल, बाजार स्त्री को आधुनिकता का झूठा पाठ पढ़ा रहा है। बाजार का साम्राज्यवाद “फैशन” तय करता है, भाषा और संस्कृति तय करता है, सिद्धांत तय करता है और स्त्री उसकी आजादी है, उसकी नियति है? आधुनिक या खुले विचारों का अर्थ मर्यादा की सीमाएं लांघते जाना नहीं है।
जब निजी जीवन में हस्तक्षेप या निजी स्वतंत्रता के हनन की बात की जाती है तो एक प्रश्न भी सिर उठाता है, क्या निजी जीवन में कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? क्योंकि यदि समाज में मर्यादा भंग होगी तो हमारी स्वतंत्रता भी नष्ट हो जाएगी। 20वीं सदी में स्त्री अपने व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में बढ़ रही है। ऐसे वक्त में यदि स्त्री अपने व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि अपने स्त्रीत्व से आकर्षक बनने की कोशिश करती है तो यह स्त्रीत्व का अवमूल्यन है। सुन्दर दिखना नारी का स्वाभाविक गुण है लेकिन सुन्दरता का एक ही अर्थ नहीं है। सुन्दर दिखने के सभ्य और सुसंस्कृत तरीके भी हैं। हम स्त्रियों की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, उसके किसी भी आयाम का विरोध नहीं करते। वे अपनी मर्जी से जीवन जीने के लिए आजाद हैं। लेकिन यदि वे कामुकता की ज्वाला में स्वयं भी ईंधन डालती जा रही हैं तो उन्हें भी तनिक ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है कि वे किस तरह का समाज बना रही हैं।
विज्ञापन हो या सिनेमा या मीडिया, स्त्री अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता के साथ खड़ी नजर नहीं आतीं। उनका उपयोग पुरुषों को ललचाने तथा आक्रामक कामुक माहौल बनाने में किया जा रहा है। कामुकता की यह संस्कृति उसके जीवन को एकायामी बना रही है। पैसे और शोहरत के लिए स्त्री आधुनिकता की आड़ में अपना यह दैहिक शोषण स्वीकार कर रही है। कामुकता भड़काने का व्यावसायिक उपक्रम ऐसा समाज बना रहा है जिसमें स्त्री को भोग्या मानकर चलने की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है। यही प्रवृत्ति स्त्री के प्रति हो रहे अनाचारों और अत्याचारों की जननी है।
कोई कैसी पोशाक पहने यह निर्धारित करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। लेकिन इससे कुछ बुनियादी नियम स्थगित नहीं हो जाते। शालीनता की भी एक जगह होती है। अत: स्त्रियों को आधुनिकता बनाम कामुकता की आंधी में उड़ जाने के बजाए अपनी भूमिका, अपने पहनावे की सही पहचान स्वयं ही करनी होगी।
स्त्री आधुनिक परिवेश में प्रयोगी और गतिशील अवश्य बने, पर अपनी गरिमा, सरसता, माधुर्य और संवेदनशीलता को भी बनाये रखे। स्वाभिमान और आत्मसम्मान से लबरेज नारी ही आजाद कहलाने की सच्ची हकदार है।द











