सम्पादकीय
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सम्पादकीय
कष्ट ही तो वह चालक शक्ति है जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और आगे बढ़ाती है।
-विनायक दामोदर सावरकर (क्रांतिकारी चिट्ठियां, पृ. 59)
सर्वोच्च न्यायालय ने 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर मनमोहन सिंह सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अदालत का स्पष्टत: यह कहना कि 2 जी लाइसेंस आवंटन में सरकार ने कानून के अनुकूल और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई, सरकार की नीयत और कामकाज में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति की ही तरफ इशारा है। लेकिन सरकार में बैठे लोग अपने देश व जनता के प्रति दायित्वों और साफ-सुथरे प्रशासन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नकारते हुए अब भी पाक दामन होने का हास्यास्पद दावा कर रहे हैं। इस क्रम में संप्रग सरकार के बड़बोले संचार मंत्री कपिल सिब्बल का बयान तो “चोरी और सीनाजोरी”की ही श्रेणी में आता है कि नीति एनडीए की, गड़बड़ी राजा से हुई, हमारा क्या कसूर? यह वही सिब्बल हैं जो पहले भी 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुए महाघोटाले में नियंत्रक व महालेखा परीक्षक द्वारा पौने दो लाख करोड़ की धांधली का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने पर बिफर पड़े थे और “कैग” को गलत साबित करने की कोशिश की थी। सरकार चाहती तो “कैग” की रपट के आलोक में मामले की जड़ तक पहुंचकर दूध का दूध, पानी का पानी कर सकती थी, परन्तु उसने ऐसा करने की बजाय अपनी गलतियों को ढंकने की ही कोशिश की। लेकिन सांच को आंच कहां, सच्चाई तो सिर चढ़कर बोलती है। यदि सरकार का रिकार्ड इतना ही साफ-सुथरा था तो सर्वोच्च न्यायालय को 122 लाइसेंस रद्द करने का आदेश क्यों देना पड़ा? वास्तव में यह “ईमानदार” प्रधानमंत्री की सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा है कि वह किस तरह इस देश के खजाने को लूटने के लिए अपने सहयोगियों को खुली छूट देते रहे। लोक लेखा समिति की रपट के संदर्भ में कहें तो मूकदर्शक बने रहे।
अदालत ने स्पष्ट कहा है कि 2 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन पूरी तरह मनमाने तरीके से और समानता पर आधारित लोकहित के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए कुछ कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी खजाने की कीमत पर किया गया। 122 लाइसेंस रद्द किए जाने का सीधा अर्थ यह है कि इन्हें जारी करते समय ठीक तरह से नीतियों का पालन नहीं हुआ और मोटी रिश्वत लेकर लाइसेंस बांटे गए। अदालत ने “पहले आओ, पहले पाओ नीति” को साफ तौर पर गलत बताया है। इस सारे मामले से न तो प्रधानमंत्री अपने को अलग कर सकते हैं और न उस समय वित्तमंत्री रहे चिदम्बरम। ये दोनों भी उतने ही गुनाहगार हैं जितने तत्कालीन संचार मंत्री ए.राजा। इस फैसले के दो दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने एक और फैसला देकर प्रधानमंत्री कार्यालय को कटघरे में खड़ा कर दिया था और कहा था कि भ्रष्ट लोकसेवकों के विरुद्ध मामला दर्ज कराने के लिए सरकार की अनुमति की समय सीमा तय की जानी चाहिए जो चार माह से ज्यादा न हो। यह टिप्पणी इस सरकार के द्वारा भ्रष्टाचारियों को बचाने की लगातार कोशिशों पर गहरी चोट है जो सरकार की अनुमति न मिलने की आड़ में बेखौफ ऐश करते रहे हैं। यह प्रधानमंत्री के कामकाज के तरीकों पर भी तीखी टिप्पणी है जो ए.राजा व चिदम्बरम जैसों को बचाने के उपक्रम में लगे रहे और लगातार इस मांग से मुंह छिपाते रहे कि जब राजा जेल में हैं तो चिदम्बरम बाहर क्यों? अब भी समय है जब प्रधानमंत्री अपनी प्रामाणिकता दिखाते हुए चिदम्बरम को बर्खास्त करें और उन्हें जेल का रास्ता दिखाएं। यह निर्णय संप्रग सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस की भ्रष्ट राजनीतिक शैली पर भी तमाचा है जो अपने सत्ता स्वार्थों के लिए सरकारी खजाने की लूट की छूट दिए जाने के लिए प्रधानमंत्री पर दबाव बनाती रही। अपने फैसले में अदालत का यह कहना कि भ्रष्टाचार से पूरे लोकतंत्र की बुनियाद ही खतरे में पड़ जाती है, देश की जनता के लिए गंभीर चेतावनी है कि देश पर पचास साल से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस ने किस तरह भ्रष्टाचार को “राजनीतिक संस्कृति” बना दिया और वह जनहित व देशहित को भी दांव पर लगाने से नहीं चूकी। यदि देश के लोकतंत्र, सुशासन व राजनीतिक शुचिता के लिए गंभीर खतरा बन गए भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता अब भी नहीं चेती, तो कांग्रेस देश का बेड़ा गर्क कर देगी। जनता के इन्हीं तेवरों की आशंका से उ.प्र. के आगामी चुनावों को लेकर कांग्रेस की सांसें अटक रही हैं।











