I आवरण कथा
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अवैध हथियारों के तस्करों-आतंकवादियों-माओवादियों का खतरनाक गठजोड़
परेश बरुआ को पकड़े बिना समाधान नहीं
* जगदम्बा मल्ल
असम पुलिस एवं खुफिया एजेंसियों की रपट के अनुसार उल्फा से जुड़े युवक माओवादियों के चंगुल में तेजी से फंसते जा रहे हैं। 1980 के प्रारंभ में शुरू हुआ आसू व उल्फा के आन्दोलन से 21 वर्षों बाद आज जनवरी, 2012 तक कोई संतोषजनक समाधान न मिलने के कारण युवकों के मन में निराशा पैदा हुई है। इस कारण वे माओवादियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पूर्वोत्तर के पुलिस प्रमुखों तथा केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बलों के प्रमुखों के 21वें सम्मेलन को गत 18 दिसम्बर को संबोधित करते हुए असम पुलिस के प्रमुख शंकर बरुआ ने कहा कि असम पुलिस की कई टुकड़ियों को झारखण्ड भेजा गया है। वे पूर्वोत्तर भारत में माओवादियों के संपर्क-सूत्रों का पता लगा रही हैं। पूर्वोत्तर भारत में माओवादियों की विस्तार-योजना की जानकारी असम पुलिस को भी है। असम पुलिस के खुफिया प्रमुख खगेन शर्मा ने दावा किया कि इस क्षेत्र में माओवादियों की संख्या 100 के लगभग हैं जो अपने विस्तार का ताना-बाना बुन रहे हैं। इनमें से अधिकांश उल्फा के ही लोग हैं। इनमें से कुछ माओवादी मणिपुर के आतंकवादी संगठनों के शिविरों में तो कुछ ने नागालैण्ड के आतंकवादी संगठनों के शिविरों में शरण ली है और अधिकांश ने झारखण्ड में माओवादियों के शिविरों में प्रशिक्षण प्राप्त किया है और अब ये असम-अरुणाचल की सीमा पर सक्रिय हैं।
इन्टेलिजेन्स ब्यूरो (आई.बी.) के विशेष निदेशक आर.एन.रवि ने भी माना है कि माओवादी अब असम तथा पूर्वोत्तर के अन्य प्रान्तों में अपने पांव पसार रहे हैं। उन्होंने कहा कि नागा तथा मणिपुरी आतंकवादियों के साथ माओवादियों के निकट संबंध हैं और वे सैन्य तथा सूचना-तकनीकी का प्रशिक्षण एन.एस.सी.एन (आईएम) तथा मणिपुरी आतंकवादियों के शिविरों में प्राप्त कर रहे हैं। पीएलए के गिरफ्तार किये गये आतंकवादियों ने इस तथ्यों का खुलासा किया है। आर.एन. रवि ने मेघालय की गारो पहाड़ियों में गारो नेशनल लिबरेशन आर्मी (चर्च द्वारा प्रायोजित आतंकवादी संगठन) की बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों, असम के उल्फा तथा अन्य आतंकवादी संगठनों द्वारा अपनी विस्तार की योजना, मणिपुर के इम्फाल घाटी (जहां से विशेष सैन्य अधिकार कानून-आफ्सा हटा लिया गया है) में सभी प्रमुख आतंकवादी संगठनों के समन्वित प्रयास तथा एनएससीएन के दोनों गुटों (आईएम और के) द्वारा अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग व तिरप जिले में मचाए गए कुहराम पर विशेष निगरानी रखने की आवश्यकता पर बल दिया है। प. बंगाल के सिलिगुड़ी गलियारे में कमतापुर लिबरेशन आर्गेनाइजेशन (के.एल.ओ.) सक्रिय है। इस पर भी कड़ी निगरानी रखने की आवश्यकता पर श्री रवि ने बल दिया। उन्होंने कहा कि म्यांमार ऊपर से सहानुभूति प्रकट करता है किन्तु वास्तव में आतंकवादियों के खत्मे की दिशा में वह कोई कार्रवाई नहीं करता है।
यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यू.डब्ल्यू.एस.ए)
यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी चीनी भाषा-भाषी म्यांमारी आतंकवादियों का एक संगठन है जिसके आतंकवादियों की संख्या 30,000 बतायी जाती है। बर्मीज कम्युनिस्ट पार्टी के 1989 में समाप्त हो जाने के बाद उसके आतंकवादी समूह यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी में आ गये थे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1989 में बर्मीज सैनिकों को शस्त्रधारी जनजातियों ने उन्हें उनके जंगल के शिविरों से भगा दिया था। चीन के साथ यू.डब्ल्यू.एस.ए. का घनिष्ठ संबंध है, क्योंकि इसके सभी प्रमुख पदाधिकारी कम्युनिस्ट गोरिल्ला थे और सबने चीन में 1960 व 1970 के दशक में प्रशिक्षण लिया था। यू.डब्ल्यू.एस.ए. और म्यांमार की सरकार के मध्य संघर्ष विराम इन दिनों खतरे में पड़ गया है। म्यांमार की सरकार ने एक विशेष योजना बनाकर स्थानीय आतंकवादियों को सीमा सुरक्षा बल में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। इस कारण यू.डब्ल्यू.एस.ए. म्यांमार की सरकार से नाराज है। किन्तु इतना सब होने के बावजूद भी इनके चीनी आकाओं का विवेक नहीं जाग रहा है। चीन मेंं अवैध शस्त्र निर्माण कारखानों के मालिक लाभ कमाने पर आमदा है और इसलिए वे जरा भी विचार नहीं करते हैं कि उनके द्वारा बेचे गये शस्त्र किसे प्राप्त हो रहे हैं। अवैध व छोटे शस्त्रों के अवैध व्यापार के खिलाफ जन जागरण करने वाली बीनालक्ष्मी नेफ्राम के अनुसार अब तो अवैध हथियारों के व्यापारी अपने तकनीकी ज्ञान की भी बिक्री कर रहे हैं।
पकड़े गए तस्करों से मिली जानकारी के अनुसार गत तीन वर्षों से यू.डब्ल्यू.एस.ए. खुद अपनी फैक्ट्री में घातक हथियार बनाता है और चीनी मार्का (मेड इन चाइना) लगाकर बेच रहा है। अप्रैल, 2004 में यू.डब्ल्यू.एस.ए. द्वारा भेजी गई चीन निर्मित अवैध हथयारों की एक बड़ी खेप, जो जहाज से आ रही थी, बंगलादेश के चटगांव बन्दरगाह पर बंगलादेश पुलिस द्वारा पकड़ी गयी थी। बंगलादेश के अवैध शस्त्रों के तस्कर हफीजुर्रहमान ने चटगांव पुलिस को बताया कि ये हथियार हांगकांग से असम के उल्फा आतंकवादियों के लिए लाये जा रहे थे। रहमान ने यह भी बताया कि इस कार्य के लिए उल्फा के सैन्य प्रमुख परेश बरुआ ने उसे काफी बड़ी रकम का अग्रिम भुगतान किया था। इस मामले में बंगलादेश की अदालत में परेश बरुआ के खिलाफ मुकदमा भी चल रहा है। भारत तथा बंगलादेश की गुप्तचर एजेंसियों के अनुसार परेश बरुआ इन हथियारों को केवल उल्फा के आतंकवादियों के लिए ही नहीं आयात कर रहा था, बल्कि वह इसे अन्य आतंकवादी संगठनों को भी बेचकर व्यवसाय करने वाला था। गत 10-12 वर्षों में पूरे दक्षिण एशिया में उल्फा, विशेषकर परेश बरुआ अवैध हथियारों की तस्करी के क्षेत्र में सबसे बड़ा व्यापारी बन गया है। चीन के बाजारों से सस्ते में हथियार खरीद कर परेश बरुआ भारत व नेपाल के माओवादियों आतंकवादियों को बेचता है और मोटा लाभ कमाता है।
परेश बरुआ को पकड़ना जरूरी
गृह मंत्रालय तथा गुप्तचर एजेंसियों का मानना है कि जनवरी, 2011 में परेश बरुआ की जो शक्ति थी, वह जनवरी, 2012 में दोगुनी हो गई है। चीन जिन शस्त्रों को म्यांमार के कचिन प्रांत में पुराना मानकर थोक में नीलाम कर रहा है, परेश बरुआ उन्हें बहुत सस्ते दाम पर खरीद रहा है और ऊंची कीमत लेकर पूर्वोत्तर भारत के आतंकवादी संगठनों को बेच रहा है। परेश बरुआ अब असम का आंदोलनकारी न रहकर विशुद्ध रूप से अवैध हथियारों का तस्कर बन गया है। ऊपरी म्यांमार के दो शिविरों में परेश बरुआ के कम से कम 330 आतंकवादी हैं और उसके कम से कम 150 से 200 आतंकवादी असम तथा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में बिखरे हुए हैं और अवैध हथियारों के व्यापार में जुटे हैं। वास्तव में ऊपरी असम (तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, नौगांव, शिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट जिले) में पिछले 6 महीने में मोरान व मटक समुदाय के युवकों को भर्ती कर परेश बरुआ ने अपनी शक्ति दोगुनी कर ली है। ऊपरी असम के तीन जिलों (शिवसागर, डिब्रूगढ़ व तिनसुकिया) में आहोम, मोरान व मटक समुदाय के लोग रहते हैं। ये समुदाय केन्द्र व राज्य सरकार से जनजाति का दर्जा प्राप्त करने की मांग कर रहे हैं, किन्तु अभी तक इनको निराशा ही हाथ लगी है, जबकि इनकी मांग उचित है। इससे निराश होकर मोरान व मटक समुदाय के युवक परेश बरुआ के गुट में भर्ती हो रहे हैं। ऐसी भी खबर है कि इन दोनों समुदायों के कुछ युवक माओवादियों के चंगुल में भी फंस रहे हैं। परेश बरुआ नए जुड़ने वाले युवकों को हथियार चलाने, गोरिल्ला युद्ध की तकनीक और विस्फोटक हथियारों के संचालन हेतु 3 महीने का सघन प्रशिक्षण देता है। संयुक्त गृह सचिव व उत्तर पूर्व क्षेत्र के प्रभारी शंभू सिंह ने भी इस तथ्य का खुलासा किया है। इन्होंने बताया कि कचिन इंडिपेन्डेन्स आर्गेनाइजेशन (के.आई.ओ) म्यांमार में फैक्ट्री स्थापित कर चीनी मार्का (मेड इन चाइना) वाले हथियारों का बड़ी मात्रा में निर्माण कर रहा है। यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यू.डब्ल्यू.एस.ए.) भी म्यांमार में ही अपनी अलग फैक्ट्री लगाकर स्वतंत्र रूप से यही काम कर रहा है। परेश बरुआ ही इन अवैध शस्त्रों का सबसे बड़ा व्यापारी है।
पिछले कुछ वर्षों में असम में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रण्ट आफ बोडोलैण्ड, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रण्ट आफ असम तथा दीमा हालोंग दाओगा के सैकड़ों आतंकवादियों ने हथियारों के साथ सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण किया है। आत्मसमर्पण की शर्तों के अनुसार उन्हें तत्काल राहत राशि मिलनी चाहिए थी, किन्तु कई वर्षों बाद भी यह राहत राशि और सामग्री तरुण गोगोई की सरकार नहीं दे रही है। इसलिए नाराज व विवश होकर वे माओवादियों के खेमों में जा रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले कुछ आतंकवादी विवश होकर अपहरण, डकैती व लूट जैसे अपराधोंं में लिप्त हो रहे हैं। आखिर इनको राहत व पुनर्वास राशि क्यों नहीं दी जा रही है? यदि असम सहित समूचे पूर्वोत्तर भारत से आतंकवाद और अलगाववाद को समाप्त करना है तो सबसे पहले अवैध हथियारों की तस्करी को रोकना होगा, परेश बरुआ पर शिकंजा करना होगा, कैसे भी हो उसे गिरफ्तार कर भारत लाना होगा और वार्ता समर्थक जिन आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, उनके पुनर्वास को प्राथमिकता देनी होगी। अगर इस कार्य में लापरवाही बरती गई तो भले कुछ लोग आत्मसमर्पण कर दें, आतंकवाद समूल नष्ट नहीं होगा। नित नए आतंकवादी पैदा होंगे और पुराने भी निराश होकर फिर हथियार थाम लेंगे। द











