स्वावलंबन की अनूठी पहल
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'मिनी भारत कॉन्सेप्ट'
संगीता सचदेव
इसी तरह प्रतिभा लोगों से ली अधिक किश्त का हिसाब रखती हैं
मन्दिर में तुलसी की पूजा करती हुई छोटी बाई

प्रतिभा आचार्य द्वारा विकसित किया गया 'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' ग्राम का दृश्य
वीर सिंह की आटा चक्की
किसी भी कार्य को यदि दृढ़ संकल्प, कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से किया जाए तो रास्ता स्वयं ही खुलता चला जाता है। आज के पुरुष प्रधान समाज में ऐसा ही कार्य कर दिखाया है विदिशा (म.प्र.) की श्रीमती प्रतिभा आचार्य ने। उन्होंने अपने 'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' के अन्तर्गत पांच बीघा जमीन पर 250 परिवारों का एक ग्राम बसाया है। इस गांव में उन्होंने नि:सहाय एवं गरीब लोगों को 100 से 500 रुपए तक की मामूली मासिक किश्त पर प्लाट उपलब्ध कराया है। साथ ही अनेक बेरोजगार लोगों को प्रेरित कर उन्हें आर्थिक सहायता एवं प्रशिक्षण दिलाकर स्वावलम्बी भी बनाया है।
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अपने कार्यालय में श्रीमती प्रतिभा आचार्य
1991 में विवाहोपरांत अपने परिवार के लिए मकान जुटाने में अक्षम श्रीमती प्रतिभा ने उन लोगों के बारे में सोचा, जो न तो अपना मकान बनाने के बारे में सोच सकते थे और न ही कोई उनकी इस कार्य के लिए मदद करता था। ऐसे ही लोगों की मदद करने के लिए उन्होंने स्थानीय ग्रामीण बैंक से 80 हजार रुपए का ऋण लेकर करैयाखेड़ा क्षेत्र में आधा बीघा जमीन खरीदी। इस जमीन को प्रारंभ में उन्होंने मात्र 35 रुपए वर्ग फुट के हिसाब से गरीब और जरूरतमंद लोगों को 100 से 500 रुपए तक की मासिक किश्त में बेचा। इस क्षेत्र में 'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' का सपना संजोकर श्रीमती प्रतिभा ने धीरे-धीरे इस जमीन का 5 बीघा तक का विस्तार किया।
ग्राम के लोग श्रीमती प्रतिभा का बहुत आदर-सम्मान करते हैं। यहां रहने वाले कल्याण मिस्त्री के अनुसार 'मां-पिताजी ने तो हमें पैदा किया है। हमारा वास्तव में पालन पोषण तो प्रतिभा दीदी ने ही किया है। हमारी तो मां भी यही हैं और भगवान भी'। कल्याण मिस्त्री आज से 6 साल पहले दिहाड़ी मजदूर थे, परन्तु आज वह ठेकेदार बन गए हैं तथा उनके पास इस गांव में अपना एक घर भी है।
70 वर्षीय मुन्नी तो प्रतिभा को मां से भी बढ़कर मानती हैं। मुन्नी कहती हैं 'गरीब आदमी को आज के समय में इतना उधार कौन देता है? इन्होंने हमें घर के साथ-साथ काम भी दिया है।' प्रतिभा ने आज से चार साल पहले मुन्नी को मात्र 11 रुपए में एक गाय दी थी। इस गाय का एक समय का दूध मुन्नी गांव में बेचती तथा दूसरे समय का दूध वह प्रतिभा को कर्ज चुकाने के लिए देती। मुन्नी के बच्चों को भी प्रतिभा ने किसी कारखाने में काम दिलाया है। आज मुन्नी ने अपने काम के विस्तार के लिए एक भैंस भी खरीद ली है।
'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' में समानता और समरसता लाने के लिए प्रतिभा ने यहां एक मंदिर भी बनाया है। जहां ऊंच-नीच का भेद भाव किए बिना सभी मत-पंथ एवं जातियों के लोग मिल-जुलकर पूजा-अर्चना करते हैं। मन्दिर की साफ-सफाई का काम 70 वर्षीय छोटी बाई को दिया गया है। छोटी बाई के 18 साल के बेटे की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। दुख से त्रस्त छोटी बाई को प्रतिभा ने अपने परिवार का अंग बना लिया, उसके प्लाट की मासिक किश्त लेनी भी बन्द कर दी। प्रतिभा जब कभी भी गांव में आती हैं तो छोटी बाई के आंगन में बैठकर उससे ढेर सारी बातें करती हैं। छोटी बाई का मन तो अब मंदिर की सेवा में और अपने आंगन में लगे फलों के पौधों को संवारने में ही लगा रहता है। श्रीमती प्रतिभा ने न केवल यह गांव बसाया है, अपितु इस गांव के प्रत्येक व्यक्ति के दुख-सुख में भी बराबर की हिस्सेदार बनती हैं। 75 वर्षीय ओमवती के पति हलवाई थे, जो अब नहीं रहे। प्रतिभा ने ओमवती को 10,000 रुपए की आर्थिक सहायता देकर उसके घर पर ही एक किराने की दुकान खुलवा दी। इस दुकान में गांव के लोगों की जरूरत के अनुसार सामग्री उपलब्ध है।
यह ग्राम स्वयं में ही सक्षम ग्राम है, जहां प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की जरूरत को समझते हुए हमेशा मदद के लिए तैयार रहता है। गांव में नवनिर्मित होने वाले घरों में अब शौचालय के लिए टैंक भी खुदवाए जा रहे हैं। जल आपूर्ति के लिए प्रत्येक घर में मीठे पानी का हैंडपम्प भी लगा है। हैंडपम्प के लिए गड्डा खोदने का काम गांव का ही निवासी प्रमोद कुमार आसान किश्तों पर करता है। वीर सिंह ने तो अपने घर पर ही एक आटा चक्की लगा ली है, जिससे वह उचित दाम पर गांव वालों के लिए गेहूं पीसता है। ग्राम की सड़कें भी अब पक्की बनने लगी हैं।
'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' के प्रत्येक घर में एक कहानी है जो 'कुछ भी नहीं था' से प्रारंभ होकर आज उनकी गुजर-बसर के लिए 'पर्याप्त' पर पहुंचती है। प्रतिभा को इस गांव के ही नहीं आस-पास के गांवों के लोग भी पूरा सम्मान देते हैं। गांव वालों ने बताया 'एक बार पड़ोस के गांव वालों के साथ झगड़ा हो गया था तथा दूसरे गांव के लोग लाठियां लेकर हमारे गांव में आ गए थे। हमने भी अपनी लाठियां उठा लीं। प्रतिभा जी को इस झगड़े की जानकारी मिली और वे तुरंत यहां पहुंच गईं। उनके यहां पहुंचते ही उनकी एक ललकार से लगभग 100 हाथों में आई हुई लाठियां जमीन पर आ गईं।'
प्रतिभा के इस श्रेष्ठ कार्य में उनके पति श्री कृष्णकान्त आचार्य एवं उनके दो बच्चों का निरन्तर सहयोग रहता है। प्रतिभा कहती हैं 'मैं अकेली मात्र 250 परिवारों का जीवन परिवर्तन करने का प्रयत्न कर पाई हूं, यदि समाज के अन्य लोग भी ऐसा कुछ प्रयास करें तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी'।
निश्चित रूप से भविष्य में यदि इस प्रकार के कई 'मिनी भारत कॉन्सेप्ट' मिलकर एक हो जाएं तो एक सम्पूर्ण व आदर्श भारत का निर्माण हो जाएगा। और वह दिन दूर नहीं, जब एक बार फिर से भारत 'सोने की चिड़िया' बन जाएगा।













