चीन-पाकिस्तान की दुरभिसंधियों के खतरे को समझे भारत
|
चीन-पाकिस्तान की दुरभिसंधियों के
नरेन्द्र सहगल
आंतरिक मोर्चे पर पूर्णतया विफल हो चुकी डा.मनमोहन सिंह की सरकार देश की बाह्य सुरक्षा पर भी लाचार साबित हो रही है। भारत की सीमाओं पर चारों ओर से बढ़ रहे खतरों से जूझने के लिए जिस तरह की समयोचित सामरिक रणनीतियों की जरूरत सुरक्षाधिकारी महसूस करते हैं, उनके अभाव का सीधा असर देश की सुरक्षा पर पड़ता हुआ नजर आ रहा है। इन बाह्य खतरों से आंखें मूंद कर सत्ता से चिपकी हुई सरकार पर से जनता का भरोसा उठता जा रहा है। खतरों के बादल जितने गहरे होते जा रहे हैं, यह सरकार उतनी ही गहरी नींद में सोती जा रही है।
चीन–पाक सैनिक गठजोड़
वायु सेनाध्यक्ष एन. ए. के. ब्राऊन एवं थल सेनाध्यक्ष वी.के. सिंह ने कई बार यह खुलासा किया है कि चीन और पाकिस्तान का संयुक्त खतरा भारत की सीमाओं पर अपना आकार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान सारी दुनिया की आंखों में धूल झोंककर अपनी भारत विरोधी सैन्य रणनीति का विस्तार करके अपनी मंशा प्रकट कर रहा है और उधर चीन अपनी अघोषित साम्राज्यवादी लिप्सा के साथ भारत को घेरने की रणनीति पर चल रहा है। अमरीका के साथ पाकिस्तान की क्षीण हो रही दोस्ती की वजह से अब चीन-पाक का सैन्य गठजोड़ पहले से भी कहीं ज्यादा खतरनाक स्वरूप अख्तियार करेगा।
प्राप्त समाचारों के अनुसार पाकिस्तान के प्रथम संचार उपग्रह 'पाक सेट-1 आर' के प्रक्षेपण की पूरी जिम्मेदारी चीन ने ली है। यद्यपि चीन ने सफाई दी है कि पाकिस्तान को मौसम पर निगरानी रखने की क्षमता में वृद्धि करने के लिए यह सहायता दी जा रही है परंतु सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की आकाशीय व्यवस्था के साथ पाकिस्तान के पास भारत की रक्षा रणनीति पर निगरानी करने की क्षमता प्राप्त होगी। इससे पाकिस्तान की भारत विरोधी सामरिक क्षमता में भारी इजाफा होने के आसार हैं।
पूरे कश्मीर पर गिद्ध दृष्टि
जम्मू-कश्मीर की सीमा के उस पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जहां एक ओर जिहादी आतंकवादी तैयार करने के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसी क्षेत्र में चीन का सैनिक हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। भारत-पाकिस्तान को जबरदस्ती बांटने वाली नियंत्रण रेखा के निकटवर्ती पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्रों में जहां पाकिस्तान की सैनिक टुकड़ियों का भारी जमावड़ा है, वहीं इसी क्षेत्र में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के दस हजार से ज्यादा सैनिकों की हलचल के समाचार हमारे देश की रक्षा नीति पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। पाकिस्तान की सहमति और पूरे सहयोग से जम्मू- कश्मीर के अभिन्न भाग गिलगित और बाल्टिस्तान में चीनी सेना की मौजूदगी को अनदेखा करना भारत की कमजोर मानसिकता का ही प्रतीक होगा।
हाल ही में भारत की सीमा के निकट चीन और पाकिस्तान की सेनाओं का संयुक्त युद्धाभ्यास भी यही संकेत देता है कि चीन की नजरें अब भारत के पंजाब, राजस्थान और गुजरात के साथ लगतीं पाकिस्तानी सीमाओं पर भी गड़ी हैं। जम्मू-कश्मीर के साथ साथ पूरी भारत-पाक सीमा पर चीन के सैनिकों की हलचल की यह शुरुआत आने वाले दिनों में अत्यंत घातक साबित हो सकती है। इसी संदर्भ में देखा जाए तो स्पष्ट होगा कि जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा से लेकर गुजरात के कच्छ तक की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान और चीन दोनों का संयुक्त खतरा आकार लेता हुआ दिखाई दे रहा है।
इस्लामाबाद तक चीन की पहुंच
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की सीमा के साथ लगने वाले भारतीय राजस्थान के क्षेत्र जैसलमेर से लेकर गुजरात के रण कच्छ के लंबे-चौड़े रेगिस्तानी क्षेत्र में गैस और तेल के भूमिगत भण्डार मौजूद हैं। भारत की अनेक कंपनियां इनकी खोज के लिए कार्यरत हैं। पाकिस्तान के साथ चीन की भी गिद्ध दृष्टि इस प्राकृतिक सम्पदा पर टिकी हुई है। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय पाकिस्तान की थल सेना ने जैसलमेर के इसी इलाके पर कब्जा करने की जीतोड़ कोशिश की थी। भारत की वायुसेना ने अपनी अद्भुत क्षमता के बल पर जैसलमेर के लोंगोवाल क्षेत्र से पाक सेना को भगाया था। इस इलाके पर पुन: खतरा हो सकता है।
चीन ने तो अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को पाकिस्तान का भाग बताने जैसे बयान भी देने प्रारंभ कर दिए हैं। भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा (जम्मू कश्मीर) पर स्थित कराकोरम के रास्ते से सीधे इस्लामाबाद पहुंचने के लिए चीन ने सड़क मार्ग भी बना लिया है। चीन का यह दुस्साहस जगजाहिर होने के बावजदू भारत की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया का न होना चिंतनीय है। 'पीओके' का यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है, परंतु पाकिस्तान के जबरन कब्जे की वजह से विवादाग्रस्त कहलाता है। चीन द्वारा प्रसारित किए जाने वाले सैनिक नक्शों में यह क्षेत्र उत्तरी पाकिस्तान दिखाया जाता है। यह चीन-पाक की संयुक्त रणनीति है।
भारत की घुटना टेक नीति
भारतीय क्षेत्रों में पाकिस्तान और चीन के सैनिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए हमारी सरकार ने कभी भी प्रभावशाली पग नहीं उठाए। उलटा भारत के ही सैनिकों को घुटने टेकने के लिए बार-बार मजबूर किया। सन् 2009 में भारत द्वारा लद्दाख के दमचोक क्षेत्र में बनाई जा रही एक सड़क पर जब चीन ने आपत्ति जताई तो हमारे रक्षा मंत्रालय ने यह निर्माण रुकवा दिया। इसी तरह चीन-भारत को बांटने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित दो भारतीय गांवों को जोड़ने के लिए बनाई जा रही सड़क का काम चीन के कहने से रोक दिया गया। दक्षिण-पूर्व लद्दाख में भी यही ढिलाई सामने आई। यह घुटना टेक नीति अभी भी जारी है।
यही नहीं, जब 31 जुलाई 2009 को चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में लगभग दो किलोमीटर अंदर घुसकर पहाड़ी चट्टानों पर चाईना-9 अंकित कर दिया था तो भारत की कमजोर सरकार ने चुप रहना ही ठीक समझा। इसी तरह चीनी सैनिकों ने कई बार भारत के गमा पहाड़ी क्षेत्र में लाल निशान बनाकर अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन किया है। 'पीओके' के रास्ते से अरब सागर तक अपनी पहुंच बनाने के लिए चीन ने इस इलाके में 80 अरब डालर का निवेश भारत को घेरने के लिए ही किया है।
चीन के विस्तारवादी मंसूबे
विस्तारवादी चीन की यह एक विशेष षड्यंत्रकारी चाल है कि पहले किसी छोटे देश की आर्थिक मदद करो, फिर सैनिक घुसपैठ को अंजाम दो और बाद में उस पर कब्जा कर लो। चीन की इस खतरनाक नीति को समझे बिना उसकी साजिशों का शिकार होने से बचा नहीं जा सकता। भारत ने तिब्बत पर चीन के कब्जे का विरोध न करके जो भयंकर भूल की है उसने चीन के विस्तारवादी मंसूबे को मजबूत किया है। इसी नीति ने लद्दाख सहित पूरे जम्मू-कश्मीर को चीन के जबड़े में धकेलने का काम किया है।
चीन ने अपनी इसी साम्यावादी विचारधारा के अंतर्गत तैयार की गई रणनीति के अनुसार अपनी नजरें भारत, म्यांमार, बंगलादेश और पाकिस्तान की समुद्री सीमाओं पर जमाई हैं। भारत को छोड़कर शेष तीनों देशों के बंदरगाहों पर चीन के युद्धपोत प्रभावशाली स्थिति में मौजूद हैं। इन सभी देशों को भारत का भय दिखाना चीन की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण भाग है। चीन का प्रयास है कि वह इन देशों के रक्षक के रूप में उभर कर इन पर कब्जा कर ले। ताईवान पर अपना आधिपत्य चीन ने ऐसे ही जमाया है। इस तरह भारत के पड़ोसी छोटे देशों को भारत से काटने की फिराक में है चीन। ऐसी चेतावनी सुरक्षा विशेषज्ञ भी दे रहे हैं।
चीन के कब्जे में नेपाल
भारत को अलग-थलग करने के उद्देश्य से चीन ने नेपाल में भी अपना प्रत्येक तरह का हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया है। नेपाल को भारत से जोड़कर रखने वाली हिन्दूवादी शक्तियों का आधार समाप्त करने के लिए चीन ने माओवादी शक्तियों की पीठ थपथपाने की नीति अपनाई है। इस नीति के अनुसार नेपाल में माओवाद का प्रभाव बढ़ेगा और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत का अनुज यह राष्ट्र चीन के प्रभाव में आ जाएगा। सर्वविदित है कि विश्व का एकमात्र घोषित हिन्दू राष्ट्र अब एक ऐसी विघटनकारी विचारधारा में जकड़ा चला जा रहा है जिसका मानवतावादी हिन्दुत्व से कोई वास्ता नहीं है।
भारत सहित सभी हिमालयी क्षेत्रों/देशों की सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल के हिन्दू राष्ट्र अस्तित्व को बचाकर रखना आवश्यक है। नेपाल की यही पहचान उसे चीन की साम्यावादी भूख का शिकार नहीं होने देगी। भारत को चीन के संदर्भ में अपनी विदेश नीति को इसी एक बिन्दु पर केन्द्रित करना चाहिए था। भारत ने यह भारी चूक कर दी। भारत की वर्तमान सरकार ने यदि अपनी इस अदूरदर्शी विदेश नीति में यथोचित एवं तर्कसंगत बदलाव नहीं किया तो निकट भविष्य में तिब्बत की तरह नेपाल भी चीन के कब्जे में चला जाएगा और हम कारवां निकल जाने के बाद उसकी उड़ती राख देखते रह जाएंगे।
अरुणाचल में चीन का हस्तक्षेप
भारत के अभिन्न भाग अरुणाचल प्रदेश को तो चीन दक्षिण तिब्बत का ही एक हिस्सा मानता है। अरुणाचल प्रदेश में चीन के हस्तक्षेप को हमारी सरकार न तो रोक पा रही है और न ही इस मुद्दे को अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावशाली ढंग से उठाने का साहस कर रही है। दरअसल 1962 में भारत पर किए गए हमले के समय से ही चीन की कुदृष्टि नेपाल, सिक्किम, भूटान, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश पर टिकी हुई है। उस समय चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने अपने असली इरादे प्रकट करते हुए कहा था कि तिब्बत तो चीन के दाएं हाथ की हथेली है और नेपाल, सिक्किम, भूटान, लद्दाख एवं अरुणाचल प्रदेश इस हथेली की पांच उंगलियां हैं।
चीन की सरकार संसार के सामने अरुणाचल प्रदेश को चीन अधिकृत तिब्बत के भाग के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से कई प्रकार के हथकंडे अपना रही है। अरुणाचल प्रदेश में आर्थिक निवेश के साथ चीन भारतीय सेना की तैनाती का भी विरोध करता है। भारत में शरण लिए हुए तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक गुरु दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश में प्रवास एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर भी चीन आपत्ति करता है। अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को चीन द्वारा दिया जाने वाला नत्थी वीजा का मामला अभी पूरी तरह हल नहीं हो सका है। पिछले दिनों चीन ने अपने भारत विरोधी षड्यंत्र के तहत एक आन लाइन मानचित्र सेवा प्रारंभ करके अरुणाचल प्रदेश को चीन का भाग बताने जैसी जघन्य हरकत भी कर डाली है।
ठोस रक्षा नीति की जरूरत
भारत की सुरक्षा का तकाजा है कि भारत सरकार चीन के विस्तारवादी उद्देश्य, षड्यंत्रकारी इरादों और संसार की आंखों में धूल झोंकने की नीति को समझकर चीन के संबंध में अपनी विदेश नीति को व्यावहारिक बनाए एवं रक्षा नीति को ठोस धरातल पर लाने का प्रयास करे। चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय सद्भावना, विश्वस्तरीय सहयोग और मानवीय भाईचारे का कोई महत्व नहीं है। वार्ताएं/समझौते चीन की नजर में शुतरमुर्गी चालें हैं, जिन्हें अपने स्वार्थों के लिए कभी भी ठुकरा देना साम्यवादी विचारधारा का सिद्धांत है। धर्म और संस्कृति चीन की नजर में जहर है।
चीन की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष युद्ध नीतियों का देशहित में फिर से मूल्यांकन करना चाहिए। यह भी समझ लेना चाहिए कि चीन का सबसे बड़ा पिट्ठू देश पाकिस्तान शुरू से ही भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है। इन दोनों देशों की वैचारिक पृष्ठभूमि और जीने के सिद्धांत भारत के तत्वज्ञान से मेल नहीं खाते। भारत को अपने मानवतावादी तत्वज्ञान पर अडिग रहकर अपनी सामरिक क्षमता को इस हद तक बढ़ाना होगा कि चीन-पाकिस्तान की संयुक्त सामरिक क्षमता को पराजित किया जा सके। अपने सामर्थ्य के बल पर ही भारत विश्व की एक सुदृढ़ अजेय शक्ति बनेगा।











