ऐसा है पाकिस्तान, जहां है किताबों में नफरत दिमागों में जिहाद
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ऐसा है पाकिस्तान, जहां है किताबों में नफरत दिमागों में जिहाद

Written byArchiveArchive
Nov 19, 2011, 12:00 am IST
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दिंनाक: 19 Nov 2011 21:49:57

जितेन्द्र तिवारी

इधर दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए.ऑनर्स (इतिहास, द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम से ए.के.रामानुजम का विवादास्पद लेख हटाने पर कुछ मुट्ठीभर वामपंथी हंगामा मचा रहे हैं और मीडिया उसे प्रमुखता से छाप रहा है। उधर संयुक्त राष्ट्र के एक आयोग ने पर्याप्त शोध और सर्वेक्षण के बाद गत 9 नवम्बर को जारी अपनी रपट में बताया कि पाकिस्तान के स्कूलों और कालेजों की पाठ्य पुस्तकें गैरमुस्लिमों, विशेषकर हिन्दुओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियों से भरी पड़ी हैं। पाकिस्तान के मदरसों में ही नहीं बल्कि सरकारी स्कूलों में भी हिन्दुओं से नफरत और जिहाद का पाठ पढ़ाया जाता है। पर इस गंभीर खुलासे पर भारतीय मीडिया बस इस रपट का उल्लेख कर भूल गया और फिर से रामानुजम के पाठ और दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात और गिलानी को “शांति पुरुष” बताने की बहस में उलझ गया। न भारत सरकार ने पाकिस्तान की पाठ्य पुस्तकों में भारत और हिन्दुओं के विरुद्ध नफरत पैदा करने वाले पाठों के विरुद्ध अन्तरराष्ट्रीय मंच पर विरोध दर्ज कराया और न ही भारत के प्रधानमंत्री ने अपने समक्ष पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से इस संबंध में चर्चा ही की।

संयुक्त राष्ट्र के आयोग ने अपनी रपट में स्पष्ट रूप से कहा है कि पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकें अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दुओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं व उनके प्रति असहिष्णुता को बढ़ाती हैं। इस आयोग ने इस वर्ष फरवरी में पाकिस्तान के 37 सरकारी व निजी स्कूलों के 277 छात्रों व अध्यापकों तथा 19 मदरसों के 266 छात्रों व मौलवियों से बातचीत की और वहां पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों के उद्धरण भी एकत्र किए। रपट में कहा गया है कि अधिकांश अध्यापक व मौलवी गैरमुस्लिमों को शत्रु के रूप में देखते हैं। रपट में कहा गया है कि मजहबी आधार पर गैरमुस्लिमों के प्रति भेदभाव के उन पाठों से लगातार कट्टरवादी उन्माद को बढ़ावा मिल रहा है, धार्मिक स्वतंत्रता कमजोर हो रही है, यह पाकिस्तान व क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र के अन्तरराष्ट्रीय धार्मिक स्वातंत्र्य आयोग के प्रमुख लियोनार्डो लियो ने अपनी रपट में कहा है कि अधिकांश पाठ्य पुस्तकें हिन्दुओं को अतिवादी, आतंकवादी तथा इस्लाम के शत्रु के रूप में प्रस्तुत करती हैं। हिन्दू समाज और उनकी संस्कृति को भेदभाव करने वाली व क्रूर बताया जाता है जबकि इस्लाम को शांति और भाईचारे के मजहब के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रपट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध व दबाव के बाद पाकिस्तानी राजनेता नफरत से भरी पाठ्य पुस्तकों में परिवर्तन की बात तो करते हैं लेकिन कट्टरपंथियों ने सदैव इसका विरोध किया और सरकार उनकी चुनौती का सामना नहीं कर पायी।

यह सच है कि पाकिस्तान एक घोषित इस्लामी देश है। इसलिए वह अपने मजहब के प्रति गौरव का पाठ पढ़ाए, इसमें भी किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? पाकिस्तान के राष्ट्रीय बाल शिक्षा पाठ्यक्रम ने पाठ्यक्रम संबंधी जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं उसमें कहा भी गया है कि ऐसे पाठ पढ़ाए जाएं जिससे बच्चों के मन में इस्लामी पहचान बनाए रखने और पाकिस्तान के गौरव की भावना मजबूत हो। बच्चों के मन में यह भावना भरें कि वे एक इस्लामी राष्ट्र के सदस्य हैं इसलिए इस्लामी परम्परा के अनुसार उन्हें एक सच्चा, ईमानदार व देशभक्त जांबाज (मुजाहिद) बनना है (राष्ट्रीय बाल शिक्षा पाठ्यक्रम, शिक्षा मंत्रालय, पाकिस्तान सरकार, मार्च 2002)। इसी दिशा निर्देश के कारण दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाया जाता है “मैं कौन हूं? मैं एक मुसलमान हूं। मैं एक पाकिस्तानी हूं। मैं अपने देश और उसकी जनता से प्यार करता हूं। (मेरी किताब, पृष्ठ 36)।

हालांकि पाकिस्तान का संविधान कहता है कि बच्चों को उनके मजहब की शिक्षा दी जाए, अन्य मजहबों का ज्ञान कराया जाए, पर दबाव से उनको दूसरे मजहब की शिक्षा न दी जाए। पर भारत के प्रति हद दर्जे तक नफरत करने वाले पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल जिया उल हक के कार्यकाल में पाठ्य पुस्तकों में भारत और हिन्दुओं के प्रति नफरत पैदा करने वाले पाठ डाले गए, जो आज तक पढ़ाए जा रहे हैं। इन पाठों में इतिहास को इतना तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है कि पाकिस्तान के एक अग्रणी इतिहासकार के.के.अजीज ने पाकिस्तान के कथित इतिहासकारों की 60 पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन कर एक शोध प्रबंध लिखा-“मर्डर आफ हिस्ट्री इन पाकिस्तान” (पाकिस्तान में इतिहास की हत्या)। अजीज ने पाया कि इस्लाम के उद्भव, उसके विकास, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, पाकिस्तान के निर्माण के बारे में इतिहासकारों ने झूठ पर झूठ और मनगढ़ंत ही लिखा है। इनके पाठों का निष्कर्ष यह है कि भारत एक असभ्य देश था। एक ऐसा देश जो निर्दयता, अंधविश्वास और तरह-तरह की बुराइयों के दलदल में फंसा हुआ था। बाद में इस्लाम का उदय हुआ और उसी से भारत में सभ्यता आई। इस्लाम से ही भारत में स्वच्छ और सुंदर सभ्यता-संस्कृति का विकास हुआ। यहां तक कि लेखों में हिन्दुओं को चालाक, धूत्र्त व एहसान फरामोश तक बताया गया है और यह भी सिद्ध करने की कोशिश की गई है कि पाकिस्तान की दुर्दशा और उसके पतन के लिए हिन्दुओं की चालबाजी ही जिम्मेदार हैं।

पाकिस्तान पाठ्य पुस्तकों में क्या पढ़ाया जा रहा है, इसके कुछ उदाहरण देखिए-

थ् हिन्दू शुरू से इस्लाम के दुश्मन रहे हैं (उर्दू, कक्षा 5, पृष्ठ 108, पंजाब पाठ्य पुस्तक परिषद्, लाहौर, मई-2002) थ् शुरू से अवसरवादी रहने वाले हिन्दुओं ने अंग्रेजों का साथ दिया। (सामाजिक अध्ययन, कक्षा 6, पृष्ठ 149) थ् बंटवारे के संबंध में पढ़ाया जाता है “वे (मुसलमान) यह जानते थे कि हिन्दू हमेशा से उनके दुश्मन रहे हैं। वे यह भी जानते थे कि यदि उनका (हिन्दुओं का) वहां शासन स्थापित हो जाता तो हम (मुसलमान) इस्लाम के उसूलों के अनुसार अपनी जिंदगी गुजारने के लिए आजाद नहीं रह सकते थे। (सा.अध्ययन, कक्षा 7, पृष्ठ 50) थ् कायदे आजम ने हिन्दुओं की चाल को पहचान लिया था। (वही, पृ.51) थ् हिन्दुओं ने बहुत ही चालाकी से अंग्रजों को यह विश्वास दिला दिया था कि सन् 1857 के विद्रोह के लिए पूरी तरह से मुसलमान ही जिम्मेदार थे। (सा.अध्ययन, कक्षा 8, पृष्ठ 90) थ् अंग्रेजों ने मुसलमानों की सारी जमीन जब्त कर हिन्दुओं को दे दी (वही, पृष्ठ 91) थ् कांग्रेस के शासन को हिन्दुओं ने हिन्दू शासन घोषित किया और मुसलमानों को आतंकित करना शुरू कर दिया (वही, पृष्ठ 104) थ् हिन्दू गुंडों ने सरकार की ओर से मुसलमानों को मारना और उनकी सम्पत्ति को जलाना शुरू कर दिया (वही, पृष्ठ 105)

विभाजन के घटनाक्रम के बारे में पढ़ाया जा रहा है- थ् जहां मुसलमानों ने पाकिस्तान छोड़कर जाने की इच्छा रखने वाले हिन्दुओं को हर तरह की सहायता उपलब्ध करवाई वहीं भारत के हिन्दुओं ने मुस्लिम शरणार्थियों के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया। उन्होंने मुसलमानों को ले जाने वाली बसों, रेलगाड़ियों, ट्रकों पर हमला कर लूटमार की (दिशा निर्देश, राष्ट्रीय बाल शिक्षा पाठ्यक्रम, शिक्षा मंत्रालय, पाकिस्तान, सन् 2005, पृष्ठ 85) थ् पाकिस्तान में बसे रह गए हिन्दुओं के साथ मुसलमानों ने अच्छा व्यवहार किया जबकि भारत में रह गए मुस्लिम प्रवासियों के साथ हिन्दुओं ने अमानवीय व्यवहार किया। (सा. अध्ययन, कक्षा 5, पृष्ठ 85) थ् सन् 65 के युद्ध के बाद भारत ने बंगाल के हिन्दुओं के साथ मिलकर एक चाल चली और बंगालियों में पश्चिमी पाकिस्तान के प्रति नफरत फैलाने में कामयाब हो गया और अंत में दिसम्बर, 1971 में पूर्वी पाकिस्तान पर स्वयं हमला कर दिया। इस प्रकार पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान एक-दूसरे से अलग हो गए। (सा. अध्ययन (उर्दू), कक्षा 5, पृष्ठ 112)

यह कुछ उदाहरण भर हैं कि पाकिस्तान में कक्षा 2 से लेकर 8 तक के स्कूली बच्चों को सामाजिक अध्ययन व इतिहास के नाम पर क्या पढ़ाया जा रहा है। इतना ही नहीं तो पाठ्यक्रम में शामिल दंत कथाओं (कहानी) का एक रूप यह भी देख लीजिए-युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए एक हिन्दू पायलट ने पूछताछ में बताया कि मुझे यह सिखाया गया है कि मुसलमानों पर दया मत दिखाओ, पड़ोसी मुसलमानों को लगातार तंग करो। हम हिन्दू अपनी देवी काली को प्रसन्न रखने के लिए अन्य मत-पंथों के निर्दोष लोगों की बलि चढ़ाते हैं। (उर्दू, कक्षा 6, पृष्ठ 221, प्रकाशक पंजाब पाठ्य पुस्तक परिषद)। जब पाकिस्तान के राष्ट्रीय बाल शिक्षा पाठ्यक्रम में यह पढ़ाया जा रहा है तो कट्टरपंथी मुल्ला-मौलवियों द्वारा स्वतंत्र रूप से संचालित मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा होगा, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है।

यही सब कुछ पढ़-लिखकर बड़े हुए लोग क्या लिखते और क्या सोचते हैं, यह पाकिस्तान के गजवा, इस्लाम, मजल्लाह अल दावा, जसारत, फ्रायडे स्पेशल, नवा ए वक्त, गाजी, जर्ब ए तायब आदि अखबारों में पढ़ा जा सकता है। इस्लाम (6 दिसंबर, 2004) के एक लेख में कहा गया “हिन्दू भद्दे और गंदे हैं। वे गंगा के पवित्र जल में स्नान करते हैं इसलिए गंगा प्रदूषित हो गई। हिन्दू उसी नदी में पेशाब करते हैं और फिर उसी में नहा लेते हैं।…हिन्दू साधु तो इतने गंदे हैं कि आप विश्वास नहीं कर सकते। वे मनुष्य के कंकाल की खोपड़ी में पानी पीते हैं, मल खाते हैं, मनुष्य का मांस खाते हैं, पेशाब पीते हैं, नग्नतावादी हैं।” आज आतंकवाद के रूप में दिखायी दे रहे जिहाद को जायज ठहराते हुए लिखा जा रहा है कि- “विश्व के अनेक स्थानों पर बहुत से मुजाहिदीन अपने मजहब की स्वतंत्रता और अपने पीड़ित भाइयों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।” मजहब के लिए हथियार उठाने, मुजाहिद बनने, जिहाद करने के लिए उकसाते हुए पढ़ाया जा रहा है- “जब खुदा के बन्दों को इंसान के बनाए कानूनों का गुलाम बनाया जाए, उन्हें अपनी खुदा की इबादत करने से रोका जाए वंचित किया जाए, जब इस संबंध में कानूनी रास्ते बंद हो जाएं तो राक्षस को हराने के लिए ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए।”

यह सब कुछ पाकिस्तान में लिखा, पढ़ा और सुनाया जा रहा है और दूसरी तरफ भारत को व्यापार के नाम पर सर्वाधिक पसंदीदा देश (मोस्ट फेवरेट नेशन- एमएफएन) का दर्जा देने की बात की जा रही है। अन्तरराष्ट्रीय दबाव के आगे पाकिस्तान भारत के साथ बातचीत करने और मित्रवत व्यवहार की भी घोषणा करने का ढोंग भी करता है। पर जब बाल मन में ही हिन्दुओं और उनके देश भारत के प्रति नफरत के बीज बो दिए गए हों तो फिर मीठे फल कैसे लग सकते हैं। बचपन में ही पढ़ा गया नफरत का पाठ पाकिस्तानी जनता के मन पर इतना गहरा है कि कभी समझौता एक्सप्रेस में उधर से लिखकर भेजा जाता है कि “कश्मीर हमारा है, यह पाकिस्तान का नारा है”, तो कभी मालगाड़ी के डिब्बों पर हिन्दुओं के लिए अपशब्द लिखे जाते हैं, तो कभी समुद्री लुटेरों द्वारा अगवा मिस्र के मालवाहक जहाज को छुड़ाने गए भारत के युद्धपोत “गोदावरी” पर सवार भारतीय नौसैनिकों को पाकिस्तानी युद्धपोत “बाबर” पर सवार पाकिस्तानी नौसैनिक गालियां देते हैं। एक और घटना से हम पाकिस्तानी मानस को अच्छे से समझ सकते हैं- गत 28 जुलाई को मरगल हिल्स में एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस विमान को अन्य यात्रियों के साथ पाकिस्तान के एक युवा सामाजिक कार्यकत्र्ता 25वर्षीय प्रेमचंद भी सवार थे। विमान में सवार सभी यात्रियों की मौत हो गई। पुलिस कार्रवाई व जांच के बाद सभी मृतकों के शव एक ताबूत में रखकर उनके परिजनों को सौंपे गए। सभी मृतक मुस्लिमों के नाम उनके ताबूत पर लिखे गए थे। और एकमात्र हिन्दू प्रेमचन्द के ताबूत पर उनका नाम न लिखकर, लिखा गया था-काफिर।द

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