सम्पादकीय
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ऐसी कोई बात किसी आदमी के बारे में मत कहो,
जो उस मनुष्य के मुंह पर नहीं कह सकते।
-अरुंडेल (सेवा के मन्त्र)
देश में भ्रष्टाचार व कालेधन को संरक्षण देने के आरोपों से जूझ रही कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने तो पहले ही पार्टी की छवि धूमिल कर रखी है, अब भंवरी देवी मामले में फंसी राजस्थान की गहलोत सरकार व “उ.प्र.मिशन-2012” का फूलपुर रैली के साथ आगाज करने वाले राहुल गांधी के बोलों व उनके सिपहसालारों की नृशंसतापूर्ण हरकतों ने भी कांग्रेसी कुसंस्कृति का चेहरा उजागर कर दिया है। लोगों के सामने भ्रष्टाचार, सत्तामद और चरित्रहीनता का ऐसा कुरूप चेहरा सामने आया है कि उ.प्र.में सत्ता का सपना देख रही कांग्रेस को साख बचाना मुश्किल पड़ रहा है। एक साधारण सी नर्स भंवरी देवी के साथ कांग्रेसी दिग्गजों के रिश्तों और उसकी गुमशुदगी ने राजस्थान में ऐसा तूफान खड़ा किया है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हाथ-पांव फूल गए और गद्दी छोड़ने तक की नौबत आ गई, लेकिन राज्य में पहले ही दिग्गजों के बीच अंतद्र्वंद्व से जूझ रही कांग्रेस को मुख्यमंत्री का कोई विकल्प नजर न आने की स्थिति में छवि सुधारने के लिए अचानक मंत्रिमंडल में फेरबदल कराना पड़ा।
कांग्रेसी मंत्रियों की छीछालेदर केवल भंवरी देवी प्रकरण में ही नहीं हुई, इसके लिए तो दिग्गज जाट नेता और दबदबे वाले मंत्री महिपाल मदेरणा को बाहर का रास्ता दिखाया ही गया, एक और मामले-पारस देवी प्रकरण-में विवादित हुए वन राज्यमंत्री रामलाल जाट व महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करने वाले शिक्षामंत्री भंवर लाल मेघवाल की भी छुट्टी कर दी गई। साथ ही शांति लाल धारीवाल से गृह मंत्रालय छीनकर प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने की कवायद भी दिखाई गई है। लेकिन सवाल यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत आखिर तक भंवरी देवी मामले की लीपापोती करने में क्यों जुटे रहे और आरोपियों को बचाने की भरसक कोशिश क्यों करते रहे? जबकि इस मामले की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि उच्च न्यायालय तक ने मामले में ढिलाई के लिए सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई है और इस मामले की तुलना नोएडा के आरुषि कांड से करते हुए सीबीआई की साख पर प्रश्न खड़ा किया है। कांग्रेसी कुसंस्कृति वाली सत्ता राजनीति का सबसे बदनुमा दाग बनकर उभरा है भंवरी देवी मामला।
उधर, उ.प्र.फतह करने निकले कांग्रेसी “युवराज” राहुल गांधी ने फूलपुर रैली में अति उत्साह दिखाते हुए राज्य की मेहनतकश जनता को भिखारियों की संज्ञा देकर उनके स्वाभिमान पर जो चोट की है, उससे साफ है कि वोट का गणित साधने के फेर में कांग्रेसी नेता उचित-अनुचित सब भूल जाते हैं और उन्हें केवल सत्ता की राजनीति याद रह जाती है। इस अवसर पर छात्र संघ चुनावों की मांग लेकर गए छात्रों पर इतनी नृशंसता के साथ केन्द्रीय मंत्री व राज्य के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तक टूट पड़े कि उनके विरुद्ध पीड़ित छात्रों को मामला तक दर्ज कराना पड़ा। सत्ता की चाह में बौखलाए कांग्रेसी नेताओं का यह रवैया, कांग्रेस की राजनीतिक कुसंस्कृति को ही उजागर करने वाला है। केन्द्र की सत्ता का दुरुपयोग और ये घटनाएं कांग्रेस की जिस मानसिकता का परिचय दे रही हैं, उससे साफ है कि सत्ता का नशा कांग्रेस के सिर चढ़कर बोल रहा है, जिसमें वह राष्ट्रहित, जनहित, लोकतंत्र, नैतिकता व राजनीतिक मूल्य सब भूल गई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश में राजनीतिक कुसंस्कृति की जड़ कांग्रेस ही है, इसे उखाड़ फेंकने से ही देश में सकारात्मक बदलाव आएगा।











