हृदय रोग एवं शाकाहार
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हृदय रोग एवं शाकाहार

Written byArchiveArchive
Oct 29, 2011, 12:00 am IST
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दिंनाक: 29 Oct 2011 17:03:46

विश्व में पहले यह आम धारणा थी कि मांसाहार शाकाहार से अच्छा भोजन है तथा कुछ लोगों का यह मानना था कि मांसाहार शरीर को मजबूत बनाता है और अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करता है। इस सोच ने विश्व के अधिसंख्य लोगों को मांसाहारी बनाने के लिए प्रेरित किया। इसी सोच ने समूचे विश्व में बड़े-बड़े और आधुनिक बूचड़खानों को स्थापित किया। मुर्गी पालन, बकरी पालन और सूअर पालन आदि इसी सोच का परिणाम हैं, परन्तु जैसे-जैसे स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ी है, लोगों में मांसाहार के प्रति आकर्षण कम हो रहा है। आज विश्व के अनेक देशों में शाकाहार अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत तो पहेले ही शाकाहार पर जोर देता रहा है।
हमारा देश आहार के मामले में प्राचीन काल से ही जागरूक रहा है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारी संस्कृति में आहार और इसकी शुद्धि पर विशेष ध्यान दिया गया है। एक स्वस्थ जीवन के लिए शाकाहार को प्राथमिकता दी गयी है।  छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है- “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि:। अर्थात  भोजन की शुद्धि होने पर मानव की अन्तरात्मा शुद्ध होती है। “अन्नमयं हि सौम्य मन:” अर्थात जैसा अन्न खाया जाता है, वैसा ही मन, बुद्धि, विचार इत्यादि हो जाते हैं। मनु स्मृति में कहा गया है कि “अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत” अन्न ब्रह्म है- यह समझकर उसकी उपासना करनी चाहिए। भागवत पुराण में कहा गया है कि वह व्यक्ति जो स्वाद इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकता वह अन्य इंद्रियों पर भी नियंत्रण नहीं रख सकता। वह व्यक्ति जो स्वाद इंद्रियों को नियंत्रित कर लेता है उसकी समस्त इंद्रियां पहले ही नियंत्रित हो जाती हैं। अल्प भोजन करना स्वास्थ्यवद्र्धक होता है। यदि भूख से अधिक भोजन किया जाए तो वह शरीर में विष का काम करता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा है कि “उदर ही समस्त रोगों का जड़ है।” अंग्रेजी कहावत है “अत्यधिक खाने वाले अपनी कब्र को अपने ही दांतों से खोदते हैं” बहुत से लोग अधिक भोजन करने के कारण उत्पन्न हुए रोगों से मरते हैं।
दुनिया के भोजन से जुड़े सभी विशेषज्ञों ने और विशेषकर अमेरिका के शोध वैज्ञानिकों ने प्रमाण के साथ यह सिद्ध कर दिया है कि शाकाहारी भोजन मनुष्य की आयु बढ़ाता है एवं उसको अनेक प्रकार के शरीर के कष्टदायक रोगों से बचाता है। अमेरिका वासियों की पहले मांसाहार प्राथमिकता हुआ करती थी परन्तु जब से शाकाहार की महत्ता को वे समझे हैं, शाकाहार उनकी प्राथमिकता बन गयी है। हमारे यहां तो ऋषियों, मुनियों ने उपनिषदों में पहले ही लिखा है-“अल्प भुक्तम् बहु भुक्तम्” अर्थात जो लोग कम भोजन करते हैं वे लम्बे समय तक भोजन   करते हैं।
व्यक्ति को चाहिए कि वह शाकाहारी एवं सात्विक भोजन (फलाहार, दुग्धाहार, सब्जियां, शहद, मूंग, गेहूं आदि) का सेवन करे। सात्विक भोजन से शरीर में शांत रस उत्पन्न होता है जिससे बुद्धि निर्मल रहती है और व्यक्ति का अपनी वासना पर पूर्ण अधिकार रहता है। राजसी भोजन ( कचौड़ी, पूड़ी, खट्टा, मिर्च युक्त, मांस, गांजा, भांग एवं मादक द्रव्य) से व्यक्ति वासना प्रिय, पापी एवं रोगी बन जाता है। तामसी भोजन (बासी रसहीन चीजें, तेल की तली हुई चीजें, मिठाइयां, गरिष्ठ पदार्थ) से हृदय रोग सहित अनेक गंभीर रोगों की उत्पत्ति होती है।
अनेक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि मांसाहार मानव शरीर के लिए अनुकूल नहीं है। मांसाहार अनेक व्याधियों का जन्मदाता है। मांसाहारी लोगों की रक्त नलिकाओं में “कोलेस्ट्रोल” जम जाता है, जिसके कारण दिल को पहुंचने वाले रक्त की आपूर्ति में बाधा होने लगती है। अत: उच्च रक्तचाप की संभावना बनने लगती है और इसके साथ ही दिल का दौरा और लकवा जैसे रोगों को निमंत्रण मिल जाता है। मांसाहारी पुरुषों को हृदय रोग के अलावा “प्रोस्टेट कैंसर” तथा मांसाहारी महिलाओं को गर्भाशय, डिम्बाशय  (ओवरी) और स्तन कैंसर होने की ज्यादा संभावना होती है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह भी स्वीकार किया है कि मांसाहारी लोग शाकाहारी लोगों की अपेक्षा ज्यादा बीमार पड़ते हैं।  एक तथ्य के अनुसार एक किलोग्राम मांस में लगभग 12-13 ग्रेन “यूरिक एसिड” पाया जाता है। “यूरिक एसिड” एक प्रकार का रसायन है जो शरीर में जहर का काम करता है। खून में इसकी मात्रा अधिक हो जाने पर दिल की बीमारी, लीवर का रोग, टी.बी., रक्ताल्पता, मांस संबंधी रोग, हिस्टीरिया, गठिया आदि अनेक खतरनाक रोग पैदा हो जाते हैं। यही “यूरिक एसिड” के कण जब जोड़ों में इकट्ठा होने लगते हैं तब गठिया तथा संधिवात (आस्टियो आर्थराइटिस) के रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। मुख्यत: “सेचुरेटेड फैट्स” और “कोलेस्ट्रोल” मांस और डेयरी उत्पाद में ज्यादा मिलता है, जिसके अत्यधिक सेवन से हृदय के बीमार होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। फाइबर जो “ब्लड कोलेस्ट्रोल” को घटाने में सहायक होता है वह केवल “प्लांट फ्रूड्स” में पाया जाता है।
एक शोध के अनुसार शाकाहारियों में मांसाहारियों की तुलना में 36 प्रतिशत कम “मेटोबौलिक सिन्ड्रोम” (पांच प्रमुख खतरे-उच्च रक्तचाप, लो एच डी एल कोलेस्ट्रोल, हाइ ग्लूकोज लेवल, उच्च ट्राइग्लिसराइड्स, अस्वास्थ्यक कमर की परिधि, में से तीन की प्रमुखता) पाया जाता है। “मेटोबौलिक सिन्ड्रोम” हृदय रोग, मधुमेह एवं “स्ट्रोक” का प्रमुख कारक है। मांसाहारी भोजन में केवल 60 प्रतिशत हिस्सा ही शरीर के लिए उपयोगी होता है शेष 40 प्रतिशत हिस्से में हानिकारक और टॉक्सिक पदार्थ होते हैं। मांसाहार पेट के लिए भारी होता है तथा एसिडीटी पैदा करता है, जिससे उदर संबंधी कई बीमारियां उत्पन्न होती हैं। इसमें “फाइबर” नहीं होता है। फाइबर शरीर के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। जो लोग रेसा युक्त आहार करते हैं उनमें हृदय रोग, उदर कैंसर, पाइल्स, मोटापा, डायबिटीज, कब्ज, हार्निया, डायवर्टीकुलाइटिस, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम, डेन्टल कैरीज और गॉलस्टोन्स का खतरा कम होता है। फाइबर-अनाज, फली, बीज वाले फल, खट्टे फल, गाजर, गोभी, हरी पत्तेदार सब्जियां, सेब, तरबूज-खरबूज, आडू, आदि में पाया जाता है।
अनेक बीमारियां जीवाणु के कारण होती है जो मांसाहार के माध्यम से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करती हैं जबकि शाकाहार इससे मुक्त होता है। उदाहरण के तौर पर “साल्मोनेला टाइफीमूरियम” नामक जीवाणु शरीर में अंडे के खाने से पहुंचता है, जिसके कारण न्यूमोनिया और ब्रोंकाइटिस होने की संभावना बढ़ जाती है। एक अध्ययन से यह भी प्रकाश में आया है कि मांसाहारी जानवरों में शाकाहारी जानवरों की तुलना में 10 गुना “हाइड्रोक्लोराइड एसिड” पाया जाता है, जबकि मनुष्य के शरीर में इस मात्रा में यह रसायन नहीं मिलता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मानव शरीर शाकाहार के लिए सर्वोत्तम है।
यहां कहने का तात्पर्य यह है कि शाकाहार शरीर के क्रियाकलापों के बेहतर संचालन में जहां सहयोगी बनता है, वहीं मांसाहार शरीर के व्यवहार के विपरीत होता है जो हमारी इन्द्रियों को उनके कार्य में बाधा डालता है और अंतत: एक दिन हृदय सहित समस्त शरीर रोगों की गिरफ्त में आ जाता है। अत: शाकाहारी बनें-स्वस्थ रहें। द

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