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महाराष्ट्र
अण्णा की प्रतिष्ठा बढ़ी
बेदम हो रहे हैं महाराष्ट्र के कांग्रेसी
द.बा.आंबुलकर
अण्णा हजारे जब महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में स्थित अपने गांव रालेगण सिद्धी से भ्रष्टाचार विरोध की मशाल लेकर आंदोलन छेड़ने हेतु राजधानी दिल्ली रवाना हुए थे तब राज्य के सत्ताधारियों ने यह कहते-सोचते हुए राहत की सांस ली थी कि चलो, आंदोलन का केन्द्र दिल्ली होने के कारण अब अण्णा एवं उनके आंदोलन से दिल्ली वाले ही निबटेंगे, हमारी जान छूटी। पर अब जब अण्णा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस प्रकार से व्यापक सफलता के साथ लौटे हैं, महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन के नेताओं के पांव तले से जमीन खिसक गयी है। इस परिप्रेक्ष्य में पहली बात तो यह है कि अण्णा के अनशन-आंदोलन को समाप्त कराने के अंतिम दौर में राज्य के नेतृत्व की बजाय कांग्रेस आलाकमान ने जिस तरह केन्द्रीय मंत्री तथा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को पहल करने को कहा, उससे यह संकेत मिला कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का राजनीतिक कद दिल्ली के दरबार में कम हुआ है। राज्य के कांग्रेसी नेताओं-कार्यकर्ताओं में यह भी संदेश गया है कि विलासराव देशमुख केन्द्र में अपनी राजनीतिक साख बनाए हुए हैं।
महाराष्ट्र की कांग्रेस इन दिनों तीन प्रकार के राजनीतिक संकटों से घिरी हुई है। एक तो यह कि अण्णा के आंदोलन के कारण बने हालात में सत्ताधारी गठबंधन का प्रमुख सहयोगी दल पूरी तरह राजनीतिक दूरी बनाये रहा। यहां तक कि अण्णा को तिहाड़ जेल से ही रालेगण सिद्धी भेजने के प्रस्ताव का भी राष्ट्रवादी कांग्रेस ने यह कहते हुए विरोध किया कि अण्णा ने अगर महाराष्ट्र में आकर अपना अनशन-आंदोलन जारी रखा तो उसे संभालने में राज्य के पुलिस-प्रशासन को अधिक कठिनाई होगी और राज्य गृह मंत्रालय इसके लिए तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि राज्य का गृह मंत्रालय राष्ट्रवादी कांग्रेस के पास है।
दूसरी ओर कांग्रेसी खेमे में अब बात उभर कर आ रही है कि इससे पहले अण्णा हजारे ने जब भी अनशन किया तब राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे तथा विलासराव देशमुख ने राज्य स्तर पर ही उसका तोड़ निकाला। विपरीत इसके इस बार के आंदोलन में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कोई योगदान नहीं दे पाये। कांग्रेसी नेता- कार्यकर्ता इस बात को पृथ्वीराज की राजनीतिक असफलता से जोड़ रहे हैं। एक बात यह भी है कि समूचे महाराष्ट्र में पहले से ही अण्णा के प्रति सम्मान की भावना है। अब दिल्ली में अनशन-आंदोलन को उन्होंने सफलता के साथ जिस बुलंदी तक पहुंचाया है, उससे उनका सम्मान महाराष्ट्र में कई गुना बढ़ गया है। राज्य के महानगरों से लेकर कस्बों तक आम आदमी, खासकर युवा वर्ग ने अण्णा के आंदोलन को जिस तरह समर्थन दिया, उसने कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनों दलों की चिंता को बढ़ा दिया है। यह चिंता इसलिए भी अधिक बढ़ गयी है कि राज्य के स्थानीय निकायों के चुनाव शीघ्र ही होने वाले हैं। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 168 नगर निकायों के चुनाव घोषित हो चुके हैं तथा उसके बाद बारी आएगी नगर निगम एवं जिला पंचायतों के चुनावों की। मौजूदा हालात में अण्णा के आंदोलन का लाभ भाजपा एवं शिवसेना को हो सकता है, यही बात कांग्रेसियों की चिंता का कारण है।
इस राजनीतिक चिंता के कारण ही आगामी स्थानीय चुनावों की नीति तय करने के लिए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार से गहन चर्चा की। उल्लेखनीय है कि अण्णा द्वारा प्रदेश में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन छेड़ने पर कांग्रेस की तुलना में राष्ट्रवादी कांग्रेस को अधिक मात खानी पड़ी है। भ्रष्टाचार के मामलों में अनशन कर राज्य के जिन तीन मंत्रियों की छुट्टी अण्णा ने कराई, संयोगवश वे तीनों ही मंत्री राष्ट्रवादी कांग्रेस के ही कोटे से थे। यहां तक कि भ्रष्टाचार से संबद्ध राष्ट्रीय समिति में शरद पवार को शामिल करने के मुद्दे पर अण्णा ने जोरदार आपत्ति उठाई, जिसके चलते शरद पवार को भ्रष्टाचार विरोधी केन्द्रीय समिति से त्यागपत्र देना पड़ा था, यह बात भी राज्य के राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं को खल रही है। इसीलिए अण्णा के इस बार के अनशन-आंदोलन के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, उपमुख्यमंत्री अजित पवार, उद्योग मंत्री नारायण राणे तो टिप्पणी करते रहे, पर शरद पवार ने चुप्पी साधे रखी। राजनीतिक खेमे में चर्चा है कि शरद पवार विवादास्पद मसलों पर जब भी बोलते हैं तो उन्हें पछताना ही पड़ता है। और अण्णा के बारे में टिप्पणी कर कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी को मुंह की ही खानी पड़ी। इसलिए महाराष्ट्र के भ्रष्ट नेता और सत्तारूढ़ गठबंधन के भ्रष्ट लोग अब अण्णा से अधिक सतर्क रहने को कह रहे हैं।











