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कुछ तथ्य- एक नजर में

Written byArchiveArchive
Oct 10, 2010, 12:00 am IST
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दिंनाक: 10 Oct 2010 00:00:00

अयोध्या पर मुकदमा 60 साल से अधिक समय तक चला। माना जा रहा है कि अपने आपमें पहला ऐसा संवेदनशील मुकदमा रहा जिसको निपटाने में इतना लम्बा समय लगा। इसमें कुल 82 गवाह पेश हुए। हिन्दू पक्ष की ओर से 54 गवाह और मुस्लिम पक्ष की ओर से 28 गवाह पेश किये गये। हिन्दुओं की गवाही 7128 पृष्ठों में लिपिबद्ध की गयी जबकि मुसलमानों की गवाही 3343 पृष्ठों में कलमबद्ध हुई। पुरातात्विक महत्व के मुद्दों पर हिन्दुओं की ओर से चार गवाह और मुसलमानों की ओर से आठ गवाह पेश हुए। इस मामले में हिन्दू पक्ष की गवाही 1209 तथा मुस्लिम पक्ष की गवाही 2311 पृष्ठ में दर्ज की गयी। हिन्दुओं की ओर से अन्य सबूतों के अलावा जिन साक्ष्यों का संदर्भ दिया गया उनमें अथर्ववेद, स्कन्द पुराण, नरसिंह पुराण, बाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, केनोपनिषद और गजेटियर आदि हैं। मुस्लिम पक्ष की ओर से राजस्व रिकार्डों के अलावा बाबरनामा, हुमायूंनामा, तुजुक-ए-जहांगीरी, तारीख-ए-बदायूंनी, तारीख-ए-फरिश्ता, आइना-ए-अकबरी आदि का हवाला दिया गया। पूरा फैसला 8189 पृष्ठों में समाहित है। द शशि सिंहश्रीरामजन्मभूमि दोलन कुछ महत्वपूर्ण तथ्य और आयामअयोध्या की स्थापना – वैवस्वत मनु महाराज द्वारा सरयू तट पर अयोध्या की स्थापना की गई। मनु उन 14 मनवंतरों के उद्गाता हैं जिनसे मिलकर कल्प बना है। वर्तमान में 7वां मनवंतर चल रहा है।भगवान श्रीराम का जन्म – भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का जन्म त्रेता युग में अयोध्या में हुआ।श्रीराम मंदिर – श्रीरामजन्मभूमि पर स्थित मंदिर का जीर्णोद्धार कराते हुए 2100 साल पहले सम्राट शकारि विक्रमादित्य द्वारा काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभों पर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया।मंदिर का ध्वंस – मीर बाकी मुस्लिम आक्रांता बाबर का सेनापति था, जिसने 1528 ईस्वी में भगवान श्रीराम का यह विशाल मंदिर ध्वस्त किया।पहला 15 दिवसीय संघर्ष -इस्लामी आक्रमणकारियों से मंदिर को बचाने के लिए रामभक्तों ने 15 दिन तक लगातार संघर्ष किया, जिसके कारण आक्रांता मंदिर पर चढ़ाई न कर सके और अंत में मंदिर को तोपों से उड़ा दिया। इस संघर्ष में 1,76,000 रामभक्तों ने मंदिर रक्षा हेतु अपने जीवन की आहुति दी।ढांचे का निर्माण – ध्वस्त मंदिर के स्थान पर मंदिर के ही टूटे स्तंभों और अन्य सामग्री से आक्रांताओं ने मस्जिद जैसा एक ढांचा जबरन वहां खड़ा किया, लेकिन वे अजान के लिए मीनारें और वजू के लिए स्थान कभी नहीं बना सके।संघर्ष – 1528 से 1949 ईस्वी तक के कालखंड में श्रीरामजन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण हेतु 76 संघर्ष/युद्ध हुए। इस पवित्र स्थल हेतु श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज, महारानी राज कुंवर तथा अन्य कई विभूतियों ने भी संघर्ष किया।रामलला प्रकट हुए – 22 दिसंबर, 1949 की मध्यरात्रि में जन्मभूमि पर रामलला प्रकट हुए। वह स्थान ढांचे के बीच वाले गुम्बद के नीचे था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे जवाहरलाल नेहरू, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे पंडित गोविंद वल्लभ पंत और केरल के श्री के.के.नैय्यर फैजाबाद के जिलाधिकारी थे।मंदिर पर ताला – कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ने ढांचे को आपराधिक दंड संहिता की धारा 145 के तहत रखते हुए प्रिय दत्त राम को रिसीवर नियुक्त किया। सिटी मजिस्ट्रेट ने मंदिर के द्वार पर ताले लगा दिए, लेकिन एक पुजारी को दिन में दो बार ढांचे के अंदर जाकर दैनिक पूजा और अन्य अनुष्ठान संपन्न करने की अनुमति दी। श्रद्धालुओं को तालाबंद द्वार तक जाकर दर्शन की अनुमति थी। ताला लगे दरवाजों के सामने स्थानीय श्रद्धालुओं और संतों ने “श्रीराम जय राम जय जय राम” का अखंड संकीर्तन आरंभ कर दिया।मंदिर बनाने का संकल्प – पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, 1983 में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में अयोध्या, मथुरा और काशी के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री गुलजारी लाल नंदा भी मंच पर उपस्थित थे।पहली धर्म संसद – अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया।राम जानकी रथ यात्रा – विश्व हिन्दू परिषद् ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु सीतामढ़ी से दिल्ली तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की। लेकिन श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के चलते एक साल के लिए यात्राएं रोकनी पड़ी थीं। अक्तूबर, 1985 में रथ यात्राएं पुन: प्रारंभ हुर्इं।ताला खुला – इन रथ यात्राओं से हिन्दू समाज में ऐसा प्रबल उत्साह जगा कि फैजाबाद के जिला दंडाधिकारी ने 1 फरवरी, 1986 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के द्वार पर लगा ताला खोलने का आदेश दिया। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे श्री वीर बहादुर सिंह और देश के प्रधानमंत्री थे श्री राजीव गांधी।श्रीराम मंदिर का प्रारूप – गुजरात के सुप्रसिद्ध मंदिर शिल्पकार श्री चंद्रकांत भाई सोमपुरा द्वारा प्रस्तावित मंदिर का रेखाचित्र तैयार किया गया। श्री चंद्रकांत के दादा पद्मश्री पी.ओ.सोमपुरा ने वर्तमान सोमनाथ मंदिर का प्रारूप भी बनाया था।रामशिला पूजन – जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुंभ मेले के पवित्र अवसर पर त्रिवेणी के किनारे विश्व हिन्दू परिषद् ने धर्म संसद का आयोजन किया। इसमें पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में तय किया गया कि देश के हर मंदिर- हर गांव में रामशिला पूजन कार्यक्रम आयोजित किया जाए। पहली शिला का पूजन श्री बद्रीनाथ धाम में किया गया। देश और विदेश से ऐसी 2,75,000 रामशिलाएं अक्तूबर, 1989 के अंत तक अयोध्या पहुंच गर्इं। इस कार्यक्रम में 6 करोड़ लोगों ने भाग लिया।मंदिर का शिलान्यास – 9 नवम्बर, 1989 को बिहार के वंचित वर्ग के एक बंधु श्री कामेश्वर चौपाल द्वारा शिलान्यास किया गया। उस समय श्री नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और प्रधानमंत्री थे श्री राजीव गांधी।कारसेवा का आह्वान – 24 जून, 1990 को संतों ने देवोत्थान एकादशी (30 अक्तूबर 1990) से मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा शुरू करने का आह्वान किया।राम ज्योति – अयोध्या में अरणि मंथन से एक ज्योति प्रज्ज्वलित की गई। यह “राम ज्योति” देश भर में प्रत्येक हिन्दू घर में पहुंची और सबने मिलकर इस ज्योति से दीपावली मनाई।हिन्दुत्व की विजय – 30 अक्तूबर 1990 को हजारों रामभक्तों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गर्इं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया।कारसेवकों का बलिदान – 2 नवम्बर, 1990 को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें कोलकाता के राम कोठारी और शरद कोठारी (दोनों भाई) सहित अनेक रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं।ऐतिहासिक रैली – 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर अभूतपूर्व रैली हुई। इसी दिन कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया।रामपादुका पूजन – सितम्बर, 1992 में भारत के गांव-गांव में श्री राम पादुका पूजन का आयोजन किया गया और गीता जयंती (6 दिसंबर, 1992) के दिन रामभक्तों से अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया गया।अपमान का प्रतीक ध्वस्त – लाखों राम भक्त 6 दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।मंदिर के अवशेष मिले – ध्वस्त ढांचे की दीवारों से 5 फुट लंबी और 2.25 फुट चौड़ी पत्थर की एक शिला मिली। विशेषज्ञों ने बताया कि इस पर बारहवीं सदी में संस्कृत में लिखीं 20 पंक्तियां उत्कीर्ण थीं। पहली पंक्ति की शुरुआत “ओम नम: शिवाय” से होती है। 15वीं, 17वीं और 19वीं पंक्तियां स्पष्ट तौर पर बताती हैं कि यह मंदिर “दशानन (रावण) के संहारक विष्णु हरि” को समर्पित है। मलबे से करीब ढाई सौ हिन्दू कलाकृतियां भी पाई गर्इं जो फिलहाल न्यायालय के नियंत्रण में हैं।वर्तमान स्वरूप – कारसेवकों द्वारा तिरपाल की मदद से अस्थायी मंदिर का निर्माण किया गया। यह मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया जहां ध्वंस से पहले श्रीरामलला विराजमान थे। श्री पी.वी.नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन केन्द्र सरकार के एक अध्यादेश द्वारा श्रीरामलला की सुरक्षा के नाम पर लगभग 67 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। यह अध्यादेश संसद ने 7 जनवरी, 1993 को एक कानून के जरिए पारित किया था।दर्शन-पूजन निविघ्र्न – भक्तों द्वारा श्रीरामलला की दैनिक सेवा-पूजा की अनुमति दिए जाने के संबंध में अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की। 1 जनवरी, 1993 को अनुमति दे दी गई। तब से दर्शन-पूजन का क्रम लगातार जारी है।राष्ट्रपति का प्रश्न – भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा 143(ए) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न “रेफर” किया। प्रश्न था, “क्या जिस स्थान पर ढांचा खड़ा था वहां रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले कोई हिन्दू मंदिर या हिन्दू धार्मिक इमारत थी?”सर्वोच्च न्यायालय ने कहा – सर्वोच्च न्यायालय ने करीब 20 महीने सुनवाई की और 24 अक्तूबर, 1994 को अपने निर्णय में कहा-इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विशेष “रेफरेंस” का जवाब देगी।लखनऊ खण्डपीठ – तीन न्यायमूर्तियों (दो हिन्दू और एक मुस्लिम) की पूर्ण पीठ ने 1995 में मामले की सुनवाई शुरू की। मुद्दों का पुनर्नियोजन किया गया। मौखिक साक्ष्यों को रिकार्ड करना शुरू किया गया।भूगर्भीय सर्वेक्षण – अगस्त, 2002 में राष्ट्रपति के विशेष “रेफरेंस” का सीधा जवाब तलाशने के लिए उक्त पीठ ने उक्त स्थल पर “ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार सर्वे” का आदेश दिया जिसे कनाडा से आए विशेषज्ञों के साथ तोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया। अपनी रपट में विशेषज्ञों ने ध्वस्त ढांचे के नीचे बड़े क्षेत्र तक फैले एक विशाल ढांचे के मौजूद होने का उल्लेख किया जो वैज्ञानिक तौर पर साबित करता था कि बाबरी ढांचा किसी खाली जगह पर नहीं बनाया गया था, जैसा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दिसंबर, 1961 में फैजाबाद के दीवानी दंडाधिकारी के सामने दायर अपने मुकदमे में दावा किया है। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक उत्खनन के जरिए जीपीआरएस रपट की सत्यता हेतु अपना मंतव्य भी दिया।खुदाई – 2003 में उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक तौर पर उस स्थल की खुदाई करने और जीपीआरएस रपट को सत्यापित करने का आदेश दिया। अदालत द्वारा नियुक्त दो पर्यवेक्षकों (फैजाबाद के दो अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी) की उपस्थिति में खुदाई की गई। संबंधित पक्षों, उनके वकीलों, उनके विशेषज्ञों या प्रतिनिधियों को खुदाई के दौरान वहां बराबर उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आदेश दिया गया कि श्रमिकों में 40 प्रतिशत मुस्लिम होंगे।मंदिर के साक्ष्य मिले – भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा हर मिनट की वीडियोग्राफी और स्थिर चित्रण किया गया। यह खुदाई आंखें खोल देने वाली थी। कितनी ही दीवारें, फर्श और बराबर दूरी पर स्थित 50 जगहों से खंभों के आधारों की दो कतारें पायी गई थीं। एक शिव मंदिर भी दिखाई दिया। जीपीआरएस रपट और भारतीय सर्वेक्षण विभाग की रपट अब उच्च न्यायालय के रिकार्ड में दर्ज हैं।कानूनी प्रक्रिया पूरी – करीब 60 सालों (जिला न्यायालय में 40 साल और उच्च न्यायालय में 20 साल) की सुनवाई के बाद इस मामले में न्यायालय की प्रक्रिया अब पूरी हो गई।राम मंदिर के निर्माण में हो रही देरी को देखते हुए पुन: जनजागरण हेतु – 5 अप्रैल 2010 को हरिद्वार कुंभ मेला में संतों और धर्माचार्यों ने अपनी बैठक में श्री हनुमत शक्ति जागरण समिति के तत्वावधान में तुलसी जयंती (16 अगस्त, 2010) से अक्षय नवमी (16 नवम्बर, 2010) तक देश भर में हनुमान चालीसा पाठ करने की घोषणा की। प्रत्येक प्रखंड में देवोत्थान एकादशी (17 नवम्बर, 2010) से गीता जयंती (16 दिसंबर, 2010) तक श्री हनुमत शक्ति जागरण महायज्ञ संपन्न होंगे। ये सभी यज्ञ भारत में लगभग आठ हजार स्थानों पर आयोजित किए जाएंगे।ऐतिहासिक दिन – 30 सितम्बर, 2010 को अयोध्या आंदोलन के इतिहास का ऐतिहासिक दिन माना जाएगा। इसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ ने विवादित ढांचे के संबंध में निर्णय सुनाया। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति एस.यू. खान ने एकमत से माना कि जहां रामलला विराजमान हैं, वही श्रीराम की जन्मभूमि है।ऐतिहासिक निर्णय – उक्त तीनों माननीय न्यायधीशों ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि जो विवादित ढांचा था वह एक बड़े भग्नावशेष पर खड़ा था। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि वह 12वीं शताब्दी के राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि वह किसी बड़े हिन्दू धर्मस्थान को तोड़कर बनाया गया और न्यायमूर्ति खान ने कहा कि वह किसी पुराने ढांचे पर बना। पर किसी भी न्यायमूर्ति ने उस ढांचे को मस्जिद नहीं माना। सभी ने उस स्थान को रामजन्मभूमि ही माना।द12

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