| दिंनाक: 06 Jan 2008 00:00:00 |
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आरक्षण से रक्षणपुस्तक का नाम : आरक्षण का दंश लेखक : अरुण शौरी अनुवादक : अमरनाथ श्रीवास्तव प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-52 पृष्ठ : 384 – मूल्य : 400 रुपएविगत तीस वर्षों से आरक्षण पर चली आ रही सार्वजनिक बहस को विभिन्न संदर्भों, साक्ष्यों एवं वक्ताओं के परिप्रेक्ष्य में उद्घाटित करने के खोजपूर्ण कार्य की परिणति है अरुण शौरी की पुस्तक आरक्षण का दंश। इसमें लेखक ने आरक्षण के दंश से पीड़ित जाति, समाज, राष्ट्र की पीड़ा के लिए उन सिद्धांतहीन राजनेताओं को उत्तरदायी ठहराया है जो आरक्षण के नाम पर राजनीति की रोटी सेंकते हैं। विषय को और स्पष्ट करने और परिणामों को सामने लाने के लिए लेखक ने सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्णयों को माध्यम बनाने की कोशिश की है।अध्याय आठ में लेखक ने स्पष्ट किया है कि सक्षम और कुशल प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक शर्तों-मानदंडों को पीछे छोड़ दिया गया। अध्याय बारह “”योग्यता” अथवा “श्रेष्ठता” क्या है?” में न्यायमूर्ति ओ. चिनप्पा रेड्डी की टिप्पणी का खंडन है। स्वयं रेड्डी जब यह कहते हैं कि आरक्षण के कारण कुशलता अथवा गुणवत्ता का स्तर नीचे नहीं गिरेगा तो वे स्वयं ही यह भी तो कह रहे हैं कि अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों को गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी। आखिर यह कड़ी प्रतिस्पर्धा इन्हीं प्रतियोगी परीक्षाओं में तो हो सकती है, जिसमें प्रत्येक अभ्यर्थी की योग्यता की एक ही कसौटी होती है-उसके द्वारा प्राप्त किया गया अंक। क्या इस मनमाने नियम के माध्यम से हम स्वयं को एक अच्छे प्रशासन के लाभ से वंचित नहीं कर रहे हैं। (पृ.-255)मंडल आयोग द्वारा तैयार की गयी सूची के आधार पर आज पिछड़ी जाति को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। किन्तु न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह एवं न्यायमूर्ति आर.एम.सहाय ने इंद्रा साहनी मामले में मंडल आयोग का खुलासा किया था कि तथाकथित सामाजिक-शैक्षिक सर्वेक्षण एक खानापूर्ति थी। देशभर के मात्र 0.06 प्रतिशत गांवों का ही सर्वेक्षण किया गया था। इस प्रकार जो कुछ किया गया, वह सब एक लिपिकीय कार्य ही था। कई जातियों को राज्य सूची की जांच किए बिना ही सूची में शामिल कर लिया गया था-जो पूरी तरह अवैधानिक था। परन्तु इतनी खामियों के बावजूद आरक्षण का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। खामियों को दूर करने की बात करना अप्रासंगिक हो गया है। पांचवें अध्याय “धुंधलापन गहरा गया” में मंडल आयोग की खामियों का विस्तार से पर्दाफाश है। पुस्तक में आद्योपान्त लेखक का न्यायमूर्तियों की टिप्पणियों एवं विभिन्न आयोगों की रपटों की तह में जाकर राष्ट्र के वर्तमान एवं भविष्य के प्रति हो रहे खिलवाड़ से सजग रहने, स्वविवेक का सहारा लेने का आग्रह झलकता है।अंतिम अध्याय “दूसरा उपाय या रास्ता” में लेखक न्यायाधीशों से सामाजिक क्रांति की बात करके प्रगतिवादी प्रवृत्ति के विश्लेषण के प्रति सजग रहने की अपेक्षा करता है ताकि वे राजनीतिक वर्ग की दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने के कलंक से बच सकें। क्योंकि इससे समानता सुनिश्चित करने का कार्य संभव हो या न हो मगर इसका दंश समस्त राष्ट्र को भोगना पड़ रहा है और ए.पटिया करुणप्पन मामले में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरक्षण किसी के निहित स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए।…. आरक्षण नीति की सफलता की कसौटी यही होगी कि कितनी जल्दी आरक्षण की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है। (पृ.- 366)।” परन्तु दुर्भाग्य की अनारक्षित जातियां भी अब आरक्षण प्राप्त करने के लिए आंदोलनरत हो रही हैं। आरक्षण का भयावह परिणाम सामने आ रहा है। किन्तु इस विषय पर चिंतन-मंथन करने की बजायअपने सच को जानेंपुस्तक का नाम : कालचक्र: उत्तर कथा लेखक : वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-52 पृष्ठ : 182 – मूल्य : 200 रुपएभारतीय संस्कृति मानव जगत की सर्वोपरि संस्कृति रही है किन्तु इसमें अंधविश्वासों के घर कर जाने, बाह्र आक्रमण और तज्जनित आतंरिक विकृतियों के प्रवेश से भारी क्षति हुई। “कालचक्र: उत्तर कथा” में लेखक ने विभिन्न घटनाओं, दृष्टांतों एवं उदाहरणों द्वारा यही समझाने का प्रयास किया है। “कालचक्र: उत्तर कथा” कहानी की शैली में लिखी गई है। यह विशुद्ध इतिहास नहीं है, यह विचारों की कहानी है। काल चक्र: उत्तर कथा में लेखक का उद्देश्य भारतीय संस्कृति की अपार अंत:शक्ति को उजागर करना और भारतीयों में स्व-संस्कृति के प्रति अहोभाव विकसित करना है, ताकि समाज के एक वर्गहीन की भावना से मुक्ति हो सके। इस सम्बंध में श्री चौधरी द्वारा लिखित “कालचक्र: सभ्यता की कहानी” पुस्तक का भी अवश्य अध्ययन करना चाहिए।पुस्तक के प्रथम अध्याय में वर्णित है कि यज्ञ में पशु वध करने का कोई मंत्र नहीं है। “मेध” का अर्थ बुद्धि-वैभव बढ़ाना है। और “अश्वमेध” शब्द का अर्थ “अश्व की वृद्धि” है। “शतपथ ब्रााहृण” में कहा गया है, “राष्ट्रसेवा की अश्वमेध है।” (राष्ट्रं वा अश्वमेध:) मगर वामाचार ने पशुबलि को साधन बनाने का यत्न किया। इस अध्याय में भारत के गौरवपूर्ण योगदान का विवरण दिया गया है और प्रतिपादित किया गया है कि किस प्रकार ज्ञान-विज्ञान के समस्त क्षेत्रों में भारतीय विश्व के अन्य राष्ट्रों की तुलना में अग्रसर बने रहे। मगर भारत की खोज ने यूरोप की सर्वग्रासी भूख जगा दी। लेखक ने लिखा है, “ऊपरी तौर पर अपने को व्यापारी कहने वाले परन्तु पोतों में तोपें छिपाए और पंथ का दंभ भरने वाले ईसाइयत की खाल ओढ़े, पादरी को शिखंडी बनाकर आगे करते ये यूरोपीय देश इनकी चालबाजियों से अनभिज्ञ भारत एवं उसके पूर्व के देशों पर टूट पड़े। (पृ.-73)पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय है “भारत”। इसमें विदेशी आक्रांताओं के दुष्कर्मों की कहानी विस्तारपूर्वक लिखी गई है। साथ ही हिन्दुओं द्वारा लगातार पांच सौ वर्षों तक मुगल/इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध साहसपूर्ण संघर्ष को भी दर्शाया गया है। लेखक ने विदेशियों द्वारा फैलाये गए भ्रम एवं उनके द्वारा लिखे गए झूठे इतिहास पर करारी चोट की है। इस अध्याय में अकबर और औरंगजेब के इतिहास को भी रखा गया है। इस संदर्भ हेतु मुख्य तौर पर पी.एन.ओक के विचारों एवं उनकी पुस्तकों को आधार बनाया है। इसमें लेखक ने इस्लाम, ईसाईयत एवं साम्यवादियों के कृत्यों का पर्दाफाश किया है। साथ ही “भारत” में पंथनिरेक्षता की उत्पत्ति तथा विकास का विवरण है। मगर लेखक ने पंथनिरपेक्षता को भारत के लिए अनुपयुक्त माना है। पुस्तक की प्रस्तुति बहुत सहज और सरल है। अपने गौरवपूर्ण इतिहास, उसके संघर्ष, विकृतियों और भविष्य के प्रति चिंता को जानना हो तो यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। लेखक ने इस सम्बंध में हिन्दी की 46 और अंग्रेजी की 19 पुस्तकों का संदर्भ लेकर इस कृति को अमूल्य बना दिया है।इस पर पुनर्विचार की बात करने वालों को ही मनुवादी, गरीब विरोधी घोषित कर दिया जाता है। लेखक ने आरक्षण के दंश से बचने हेतु विभिन्न उपायों, समाधानों की चर्चा की है कि हमें वर्तमान व्यवस्था के विकल्पों पर विचार करना चाहिए, सहायता के लिए उपयुक्त व्यक्ति का पैमाना व्यक्तिगत स्तर पर तय किया जाना चाहिए, सामूहिक स्तर पर नहीं। व्यक्ति के पिछड़ेपन के मूल्यांकन में उसकी आय, परिसपंत्ति एवं शैक्षिक स्थिति को ही कसौटी मानना चाहिए, न कि जाति या धर्म को।22