| दिंनाक: 03 Nov 2007 00:00:00 |
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क्या वे लोग तिब्बत छोड़ जाएंगे?तिब्बत की स्वतंत्र सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता के प्रश्न पर दुनिया भर के सेकुलर देशों की चुप्पी तोड़ने की दिशा में एक सकारात्मक उपन्यास “गेशे जम्पा” की आठवीं कड़ी। -सं.-नीरजा माधव”देखो शीतल, अब अगर हमें तुम वापस भेजना चाहते हो तो, जरा सोचो वहां हमारी ये हिन्दी भाषा कौन समझेगा? तिब्बती तो बहुत थोड़ी ही आती है हमें! हां, सोचो जरा, हम वहां जाकर क्या करेंगे? कोई बात ही नहीं समझेगा हमारी।” फुङ्चुङ् ने भी समझाने का प्रयास करते हुए कहा था।”वहां तो चीनी सैनिकों ने डेरा डाला हुअा है। स्कूलों, दफ्तरों, सभी जगहों पर बस चीनी कब्जा हो गया है। तिब्बतियों को नौकरी कहां मिलेगी? न तो खुलकर सांस ले पाते हैं और न ही सुरक्षित हैं। विरोध करने पर जेलों में ठूंस दिया जाता है।” डोलकर अभी तक शीतल को समझा रहा था। नशे की हालत में मनुष्य सारी सच्चाइयां उगलने लगता है। सभी के अपने भीतर की भावनाएं बाहर आ रही थीं।”अब तुम्हीं बताओ शीतल, छोटे-छोटे बच्चों तक को छीनकर सेना में भर्ती कर लिया जाता है। मां-बाप को उनके सामने ही गोलियों से उड़ा दिया जाता है। हम वहां जाकर बच्चे कैसे बनाएंगे? तुम्हीं सोचो, शीतल।” लेटे-लेटे फुङ्चुङ् कह रहा था।”इसकी नीयत ठीक नहीं है।” पेमा बुदबुदा रहा था।”नहीं, वापस तो जाना ही पड़ेगा फुङ्चुङ्। अपने चाट के ठेले के बगल में मैं तुमको ठेला नहीं लगाने दूंगा। भले ही प्राण चले जाएं पर अपने बाल-बच्चों की रोटी नहीं छीनने दूंगा। समझ लो तुम लोग।” शीतल नशे में चूर लेटे-लेटे सिसकने लगा।थोड़ी ही देर में वहां एक सन्नाटा खिंच गया था। वे सभी रेती पर लेटे नशे में धुत थे। नाव वाला डरते-डरते पास आया था। धीरे से आवाज लगाई-भइयाजी, भइयाजी।कोई उत्तर न पाकर वह वापस अपनी नाव पर चला गया था। कुछ ही देर में पानी पर छप्-छप् की आवाज के साथ अंधेरे का सन्नाटा भंग हुआ था। नाव वाला उन सबको कोसता हुआ पंचगंगा घाट की ओर जा रहा था।5वां अध्यायअपने कक्ष में बैठे हुए गेशे जम्पा की उंगलियां कालबेल पर पहुंच गई थीं। उन्होंने उसे धीरे-से दबाया और दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाकर टेक लिया था। कुर्सी पर धीरे-धीरे आगे-पीछे झूलते हुए उनका मन आज भी अस्थिर था। कक्ष में चल रहा ए.सी., फर्श पर बिछी कालीन, परदे, सोफे, सब दमघोंटू-से लग रहे थे।”जी, गेला?” संस्थान का चपरासी हाथ बांधे खड़ा था।”ए.सी. बंद कर दो और सारी खिड़कियां खोल दो।””जी, गेला।” और चपरासी ने जल्दी-जल्दी सारी खिड़कियां खोल दी थीं।”देखो, इस समय मुझसे मिलने किसी को न भेजना। बस देवयानी मैडम अपना पीरियड लेने के बाद आएंगी। मुझे सूचित कर देना।””जी उनको क्या कहूंगा?” उसे समझ में न आया।”अरे भाई, उन्हें मैंने किसी काम से बुलवाया है, इसलिए उन्हें आने देना। बाकी लोगों को बता देना कि बाद में मिलें।””जी, गेला।” कहते हुए चपरासी चला गया।गेशे जम्पा की दृष्टि खिड़की से बाहर सारनाथ के लॉन में खड़े अशोक स्तंभ पर गड़ गई थी। एक विशाल नरसंहार के बाद उपजी करुणा का प्रतीक। शांति का स्मृति-चिह्न। अनेक वर्षों से यूं ही तना खड़ा। क्या फिर कोई अशोक पैदा होगा जो कर सकेगा पश्चाताप आज के नरसंहारों पर? बनवाएगा वह भी स्तूप अपने भीतर उपजी करुणा के कारण? शांति और सह-अस्तित्व का प्रतीक-चिन्ह?उनका मन शांति और अशांति की वीथियों में भटकता हुआ अपनी जन्मभूमि पर पहुंच चुका था।मग्-पा रात के अंधेरे में नङ्-गर्-चे स्थित उनके घर आए थे। दरवाजे पर आहट हुई थी तो पिताजी ने पूछा था-“कौन है?” उनकी आवाज में थोड़ा भय था, कारण-दो दिन में ल्हासा के बारे में उड़ती उड़ती-सी भयानक खबरें। लाखों की भीड़ ने ल्हासा शहर से निकलकर नीर्बूलिङ्खा को घेर रखा है, ताकि परम पावन दलाई लामा को चीनियों द्वारा बंदी न बनाया जा सके। चीनी सेना और खम्पा गुरिल्ला में दो-दो बार झड़पें हो चुकी हैं। तिब्बती जनता बहुत आक्रोश में है। कभी भी स्थिति विस्फोटक हो सकती है। दमन का इतना बड़ा विरोध शायद पहली बार हो रहा है तिब्बत जैसे शान्त देश में। पिताजी रेडियो से कान सटाए रहते। वायस आफ अमेरिका और बी.बी.सी. से खबरें प्रसारित हो-होकर लोगों की धड़कने तेज कर रही थीं। दूर-दराज के गांवों के लोग भी किसी आशंका से सहमे हुए थे। मार्च के महीने में, जब तिब्बत का मौसम सुहाना रहता है, तब भी नङ्-गर्-चे गांव अन्य स्थानों की अपेक्षा ठंडा रहता है। कारण-शायद समुद्र तल से चौदह-पन्द्रह हजार फुट ऊंचाई पर बसा होना। सभी अपने घरों में सहमे से पड़े थे।”खोलिए, मैं हूं छेरिंग।” मग्-पा की धीमी आवाज कपाटों के बाहर से आई थी।सुनते ही नन्हें जम्पा हुलस पड़े थे- “मग्-पा आ गए, मां।” वे अंदर की ओर भागे थे।”इतनी तेज क्यों चिल्ला रहे हो जम्पा? धीरे से बोलो।” मां हिदायत देते हुए रसोई से बाहर निकल आई थी।दीये को उन्होंने रसोई की चौखट के पास रख दिया। ताकि दोनों तरफ उजाला रहे। दरवाजा खुलने की चरमराहट से बगल के ओसारे में बैठी भेड़ें कुनमुना उठी थीं। पिताजी ने “हुई-हुई” करके उन्हें आश्वस्त किया तो वे सब अपने-अपने स्थान पर बैठकर जुगाली करने लगीं। उनके मल-मूत्र का तेज भभका दरवाजे के भीतर घुसा तो पता चला कि बाहर हवा भी जोर से चल रही थी।पिताजी ने मग्-पा को भीतर करते हुए पुन: दरवाजे की सिटकिनी लगा दी। बगल में लटक रहे बड़े से लोहे के रॉड को बीचोबीच इस पार से उस पार सटाकर उढ़का दिया था। सुरक्षा के लिए इसे लगवाया गया था ताकि एक बारगी सिटकिनी के टूट जाने पर भी इस राड के कारण दरवाजे खुल न सकें। अंदर आते ही मग्-पा कराहते हुए पास पड़ी चौकी पर औंधे मुंह लेट गए थे।”क्या हुआ मग्-पा?” मां घबड़ा उठी थीं।”ओह, पानी…पानी…।” वे कराह रहे थे।”कैसे चोट लगी?” पिताजी लगभग चीख पड़े थे। मग्-पा की पीठ से खून बह रहा था। घाव होने के कारण वहां का कपड़ा फटकर लटक रहा था। बड़ा-सा सुराख नन्हें जम्पा ने भी देखा था मग्-पा की पीठ पर।”किसी तरह बचकर आ पाया हूं पिताजी। वहां बहुत-से लोग मारे गए हैं।” मग्-पा ने बताने का प्रयास किया था।मां इतनी देर में पानी ले आर्इं थीं।”पानी नहीं दो जम्पा की मां। घी-मिश्रित चाय ले आओ। मग्-पा बुरी तरह घायल है। उपचार करना पड़ेगा।” कहते हुए पिताजी अंधेरे में ही उपत्यका में दौड़ गए थे। शायद कोई जड़ी ले आने। जम्पा हतप्रभ से मग्-पा को देख रहे थे।घाव को अच्छी तरह धोकर पिताजी ने लेप लगाया था। घी-मिश्रित नमक वाली चाय पीकर मग्-पा कुछ चैतन्य हुए थे तो पिताजी ने पूछा-“कहां लड़ाई हुई?””नोर्बूलिङ्खा पर। परम पावनजी की सुरक्षा में कई तिब्बती संगठन और खम्पा गुरिल्ला के लोग बाहर जमा थे। हजारों की भीड़ थी वहां।” मग्-पा की आंखों के सामने बीता दृश्य सजीव-सा हो उठा था।”फिर?” पिताजी बौखलाए-से पूछ रहे थे।”उन्होंने तमाम दिन नोर्बूलिङ्खा पर बमबारी की। फिर तोपों का मुंह शहर की ओर मोड़ दिया। पोताला मंदिर और आसपास के मठों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने।””हे भगवान्! बहुत नरसंहार हुआ होगा?” मां लगभग रो पड़ी थीं।”हां, ल्हासा शहर में कितने लोग मारे गए, यह तो नहीं ज्ञात हो सका पर नोर्बूलिङ्खा के भीतर बाहर हजारों लाशें गिरी थीं।” मग्-पा के स्वर में बैचेनी थी पर भय नहीं था।”क्या परम पावन…?” पिताजी अपना प्रश्न पूरा नहीं कर सके थे।”नहीं, वे दो दिन पूर्व ही सुरक्षित दूसरे स्थान पर पहुंचा दिए गए थे।”मग्-पा के स्वर में आश्वस्ति भाव था।”नोर्बूलिङ्खा की इमारतें सुरक्षित हैं या नहीं?””नहीं। भीतर की कई इमारतें क्षतिग्रस्त हुर्इं हैं। बस आश्चर्यजनक रूप से महाकाल का मंदिर सुरक्षित है। मैं उसी के पास था इसलिए शायद बच गया।””कोन्-चोग् कहां है मेरा?” मां विक्षिप्त-सी थीं।”हां, हां, कोन्-चोग् कहां है?” पिताजी को भी याद आया था। एक सप्ताह पूर्व ही कोन्-चोग् भइया मग्-पा के साथ गए थे। कहां गए थे, इसके बारे में उन लोगों ने कुछ भी साफ-साफ नहीं बताया था।”वह शायद पूरी तरह सुरक्षित हो। खम्पा सिपाहियों के साथ वह पहले ही केशुङ् गांव पहुंच गया था।” मग्-पा धीरे-धीरे भेद खोल रहे थे।”क्यों, केशुङ् क्यों?””वहां गांव के लोगों के साथ वह भी सुरक्षा में है परम पावन दलाई लामाजी की।””पर वह कब खम्पा सिपाही बना?” मां के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।”बहुत पहले से मां।””बताया क्यों नहीं तुम लोगों ने? हां बोलो?” मां ने मग्-पा की हथेली पकड़कर धीरे से हिलाया। मां का ह्मदय था, अपने बेटे की कुशलता के लिए चिंतातुर।”उचित समय की प्रतीक्षा कर रहे थे हम। अब वो समय आ गया है।” मग्-पा की आंखें कोठरी की धुआंई छत पर जमी थीं।”वह सुरक्षित तो है? कहां तक यात्रा करनी है उसे?””दोनों ही प्रश्नों का उत्तर अनिश्चित है अभी।” मग्-पा ने मां को ध्यान से देखते हुए कहा था।”क्या वे लोग तिब्बत छोड़ जाएंगे?” अब पिताजी पूछ रहे थे।”यहां खतरा अधिक है अब। जनता के कल्याण और देश के लिए कुछ करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह कदम आवश्यक समझा गया।”मग्-पा का यह स्वरूप नन्हें जम्पा ने कभी न देखा था। इस समय वे कहानी सुनाने और ठहाके लगाने वाले मग्-पा नहीं लग रहे थे। कुछ विचित्र-सी उनकी मुख-मुद्रा थी।”कितने लोग और हैं साथ?” मां हताश थी।”बहुत-से लोग हैं।””क्या सब छोड़ जाएंगे अपना देश?” मां का प्रश्न निराशा और द्वंद्व से भरा था।”नहीं, कुछ बाहर जाकर सहयोग करेंगे हमें। हम उपनिवेश नहीं बनने देंगे इसे। वे बाहर से हमें सम्बल प्रदान करेंगे। हम भीतर से मुक्ति की लड़ाई लड़ेंगे।””हे भगवान्, चिनये खो गई। मेरी गोद सूनी हो गई थी। अब कोन्-चोग् भी…।” मां बिलख पड़ी थी। उनकी सिसकियों से घर की दीवारें मद्धिम पीली रोशनी में कांप-सी रही थीं। सहमे से जम्पा जाकर मां की गोद में बैठ गए। वे भी अधीर हो उठे थे।”मां, कोन्-चोग् भइया को क्या हुआ? मां बोलो न…बोलो मां।” जम्पा अपनी हथेलियों से मां की आंखों के आंसू पोंछते हुए बोल पड़े।”चुप रहो जम्पा की मां। यह समय रोने का नहीं है। बाहर कभी भी गश्ती पुलिस आ सकती है।” पिताजी ने धीरे से मां को समझाया था।जम्पा ने भी इधर दस पंद्रह दिनों में नङ्-गर-चे के आसपास सैनिक वेश में कई घुड़सवारों को इधर-उधर घूमते देखा था। उस दिन भी युम्-डोग्-छो (एक अति विशाल सरोवर जो बीच-बीच में सूख चुका है और उसमें हरी-हरी घास उगी है।) के हरे-भरे घास के मैदान में भेड़ों को चराते हुए जम्पा अपने दोस्त के साथ एक ऊंची-सी चट्टान पर बैठे खेल रहे थे। वहां से भेड़ें भी दिखाई दे रही थीं और बीच की छोटी पहाड़ी के उस पार अपना खेत भी। दूर-दूर तक युम्-डोग्-छो का घेरा फैला दिखाई पड़ रहा था। कहीं-कहीं पानी की पतली पतली धाराएं आकर इस विशाल सरोवर में मिलती जान पड़ती थीं। आसपास की कितनी नदियां अपना जल लाकर इसी में छोड़ती थीं। यद्यपि इसका पानी बाहर कहीं नहीं निकलता था, फिर भी प्रकृति के वरदान-स्वरूप इस सरोवर का पानी अत्यन्त मीठा था। कई मील में फैले इस विशाल सरोवर के बीच-बीच में ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के होने से किनारे-किनारे घूमने पर यह चक्कर खाती नदी की तरह मालूम होता था। क्रमश…31