| दिंनाक: 04 Aug 2007 00:00:00 |
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तर्क और समझ से परे यह सरकारी षडंत्र-वी. सुन्दरम, आई.ए.एस.एसोसिएट संपादक, दैनिक न्यूजटुडे (चेन्नै) एवं प्रथम अध्यक्ष, तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्टविनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीति!सफेद रेखाओं के माध्यम से सेतु समुद्रम नहर मार्ग का नक्शा। भारत और श्रीलंका के बीच दिख रही सफेद रेखा वह मार्ग है जिस पर खनन शुरू किया गया है और यह राम सेतु को तोड़ते हुए गुजरता है। श्रीलंका के नीचे से घूमकर जाती सफेद रेखा वर्तमान में प्रयुक्त मार्ग दर्शाती है।”नासा” द्वारा लिए गए इस उपग्रह चित्र में भारत (दाएं) और श्रीलंका के बीच जो पतली रेखा जैसी दिखाई दे रही है, वही है रामायणकालीन श्रीराम सेतु, जो सेतु समुद्रम् प्रकल्प के कारण नष्ट हो जाएगासेतु समुद्रम नहर प्रकल्प (एस.एस.सी.पी.) वास्तविकता से कोसों दूर एक विध्वंसक प्रकल्प है। संप्रग सरकार में कैबिनेट के कुछ मंत्रियों ने अपनी राजनीतिक स्वार्थ-पूर्ति के लिए तमिलनाडु के अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर इसका प्रारूप तैयार कराया है। भारत और अन्य देशों के विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रकल्प तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से ठीक नहीं है। सुनामी विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय भू-वैज्ञानिकों के अनुसार यह योजना असंगत और समझ से परे सरकारी षड्यंत्र है। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मार्च, 2005 में इस प्रकल्प से सम्बंधित कई सवाल उठाए गए थे। हैरत की बात तो यह भी है कि भारतीय नौसेना के आला अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। इस सार्वजनिक योजना को कुछ लोग ज्यादा रुचि दर्शाकर अपनी झोली में डालना चाहते हैं। ये ही अब पाक बे के नौसैन्य रणनीतिकार बन बैठे हैं।सेतु समुद्रम नहर प्रकल्प का मौजूदा प्रारूप निम्नलिखित वैज्ञानिक और तकनीकी कारणों की वजह से अयोग्य है-“नेरी” के डा. रमेश की अध्ययन रपट में पाक जलडमरू मध्य से निकलने वाले अवसादी पदार्थों के अध्ययन पर ध्यान नहीं दिया गया है। साथ ही ऐसे किसी स्थान की खोज नहीं की गई जहां खुदाई से निकले मलबे को फेंका जा सके। इस तरह के अध्ययन प्रकल्प के स्थायी रहने में आर्थिक और तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। अध्ययन में इस ओर भी ध्यान नहीं दिया गया है कि खुदाई से निकलने वाला मलबा बदलते मौसम में कहां से कहां जा पहुंचेगा।भू-गर्भ विज्ञान का अध्ययन आदम सेतु क्षेत्र में नहर की केवल 20 किलोमीटर लंबाई (दूरी) तक ही किया गया है। पाक स्ट्रेट क्षेत्र की भू-गर्भ स्थिति के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। इस वास्तविकता को समझना होगा कि नहर की लंबाई 54.2 किलोमीटर होगी। अगर तल पथरीला निकला तो योजना की लागत बढ़ जाएगी और इन चट्टानों के टूटने से पाक जलडमरूमध्य में पर्यावरण पर गहरा असर पड़ेगा। यह “नेरी” की रपट में साफ लिखा था पर नेताओं ने इसे अनदेखा करके प्रकल्प को राजनीतिक मान्यता दे दी।इस क्षेत्र में वर्ष 1860 से 2000 के बीच आए चक्रवातों के ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चलता है कि इस क्षेत्र में और इसके आसपास के क्षेत्रों में चार वर्षों में एक बार चक्रवात आता है। ऐतिहासिक रूप से हमारे पास पर्याप्त आंकड़े हैं जो यह दर्शाते हैं कि इन सभी चक्रवातों से पाक जलडमरूमध्य की खाड़ी और आदम पुल क्षेत्र में सागर के भीतर संरचना में भारी बदलाव होता है। ये चक्रवात अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी व पत्थरों को खाड़ी से ले जाते हैं। “नेरी” की रपट में इस प्राकृतिक आपदा की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है।इस प्रकल्प में इंडोमर के हाइड्रोडाीइनैमिक माडलिंग अध्ययन ने चक्रवातों से नहर योजना पर पड़ने वाले असर की अनदेखी की है। अत: हम नहीं जानते कि चक्रवात के समय नहर पर वैज्ञानिक दृष्टि से क्या प्रभाव पड़ेगा।कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो. स्टीवन एनवार्ड इंडोनेशिया के बानडुंग के पेनेलिशियन केलौटन इंस्टीटूट टेक्नोलाजी के प्रो. आदित्य रियादी तथा अमरीका और नीदरलैंड और अमरीका के विशेषज्ञों द्वारा बनाए गए सुनामी के कम्प्यूटरीकृत प्रभाव ने स्पष्ट किया है कि सुनामी लहरों ने 26 दिसम्बर, 2004 को पाक की खाड़ी में भी असर दिखाया था। योजना के नकारात्मक प्रभाव के बारे में अंतरराष्ट्रीय सुनामी विशेषज्ञ प्रो. टाड एस. मूर्ति ने 30 जनवरी, 2005 को प्रधानमंत्री कार्यालय को चेतावनी दी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने योजना के लिए अधिकृत रूप से नियुक्त सलाहकार “नेरी” को भेजने के बजाय इस मामले को सीधा तुतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट (टी.पी.टी.) के अध्यक्ष को भेज दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा 8 मार्च, 2005 को उठाए गए 16 बिन्दुओं का 30 जून, 2005 को जवाब दिया। इसके बाद अचानक 2 जुलाई, 2005 को प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने इस योजना की आधारशिला रखी।दिसम्बर, 2004 से पहले ही “नेरी” को इस योजना के लिए नियुक्त किया गया था, जबकि दिसम्बर, 2004 में सुनामी ने तमिलनाडु और केरल में कहर बरपाया था। पर्यावरण और वन मंत्रालय के लिए भू-गर्भ विभाग द्वारा 2005 के शुरू में किए गए सर्वेक्षण में बताया गया है कि 2004 में आई सुनामी से तमिलनाडु और अंदमान-निकोबार के तटीय क्षेत्रों में तबाही हुई थी तथा बंगाल की खाड़ी में जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा था। योजना से सम्बंधित किसी भी सरकारी संस्था ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। जुलाई 2005 में जब इस योजना को लागू किया गया था तब तिरुअनंतपुरम के भूगर्भ अध्ययन केन्द्र के डा. सी.पी. राजेन्द्रन ने पर्यावरण को इससे होने वाली क्षति की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि यह प्राकृतिक भू-क्षरण प्रक्रिया है जिसमें हजारों साल लगते हैं। इस योजना से ये प्रक्रिया बाधित हो जाएंगे। इस योजना के माध्यम से हम एक और प्राकृतिक आपदा को बुलावा दे रहे हैं। इस योजना पर उठाई गई आपत्तियों पर एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाना चाहिए।प्रो. जी. विक्टर राजमानिकम भारत के सागर तटीय क्षेत्रों के विशेषज्ञ हैं। अगस्त 2005 में जब प्रो. राजमानिकम से दिसम्बर 2004 में सुनामी के कारण पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि इससे कृष्णा नदी के संगम से लेकर कन्याकुमारी तक प्रभाव पड़ा। सुनामी से समुद्र की 200 मीटर गहराई तक तत्व बदल गए हैं। अगर एक अध्ययन से इस तरह के गंभीर परिणामों की जानकारी मिलती है तो हमें समुद्र तल का दोबारा अध्ययन करना चाहिए।जहाजरानी मंत्रालय द्वारा गठित संचालन समिति ने इस योजना से होने वाली पर्यावरणीय क्षति, जलीय जीवों और सूक्ष्म पादपों पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख किया है। यह हैरत की बात है कि इस समिति में भूक्षरण विशेषज्ञों, भू-संरचना विशेषज्ञों या मौसम विशेषज्ञों, भू-गर्भ शास्त्री, समुद्र तलीय तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया। समुद्रीय जीव विशेषज्ञों और मछुआरों आदि की मौजूदा समिति केवल 10 प्रतिशत जानकारी एकत्रित करने में सक्षम है तथा शेष 90 प्रतिशत जानकारी भूवेत्ता व अन्य विशेषज्ञ ही जुटा सकते हैं जो पाक स्ट्रेट के रखरखाव में भविष्य में आने वाली समस्याओं को समझने के लिए जरूरी है।प्रो. टाड एस.मूर्ति के अनुसार टी.पी.टी. के अध्यक्ष ने फरवरी 2005 के प्रारंभिक दिनों में उन्हें एक फैक्स भेजा जिसमें कहा गया था कि सेतु समुद्रम नहर योजना को फरवरी में अंतिम रूप दिया जाएगा तथा वह इस बारे में उनकी राय 24 घंटे के भीतर जानना चाहते हैं। प्रो. मूर्ति ने एक संक्षिप्त उत्तर दिया कि इस योजना में प्रस्तावित पूर्वी द्वार सही नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें टी.पी.टी. के अध्यक्ष की ओर से उत्तर मिला, जिसमें कहा गया कि टी.पी.टी. के विशेषज्ञों ने उनकी राय को बेबुनियाद बताया है, जिसका कोई अर्थ नहीं है। मूर्ति ने इस टिप्पणी पर कहा कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि टी.पी.टी. ने उनके सुझावों को खारिज किया या नहीं, मुझे उन्हें कोई सफाई देने की भी जरूरत नहीं है।उपर्युक्त तथ्यों पर ध्यान दें तो साफ होता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय, जहाजरानी मंत्रालय और तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट अपने हितों के लिए सेतु समुद्रम नहर योजना के मौजूदा प्रारूप की अनदेखी कर खतरे को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं। फिलहाल कार्य में गलत व सही के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। यह विषयवस्तु और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है। वर्तमान कानून प्रक्रिया में सही तरीके से काम करने की जरूरत है।यह प्रक्रिया भारत सरकार की अनदेखी को उजागर करती है। इसलिए मेरी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अपील है कि मेरे इस आलेख को एक जनहित याचिका के तौर पर लेते हुए योजना के कार्यान्वयन पर रोक लगाई जाए।11