| दिंनाक: 05 Jun 2007 00:00:00 |
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रेवती की व्यथा सुनने की फुर्सत किसे है!तरुण विजयचूंकि भोपाल मलेशिया नहीं है, इसलिए भोपाल के उस विवाह के बहाने हिन्दुओं को लताड़ने का अच्छा बहाना मिला। मीडिया पर चर्चा भी काफी हुई। इस चर्चा से क्रुद्ध हमारे एक मित्र ने लिखा, “मुझे लगता है कि इन हिन्दू धर्म के रक्षकों से ही हिन्दू धर्म की रक्षा की जानी चाहिए। वे जिन संस्कारों की ढपली पीटते हैं वह उनके अपने घरों से नदारद रहते हैं। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज के लोभ, बूढ़े माता-पिता की दुर्दशा, गंदे मंदिर, उससे भी गंदे और कूड़े-कचरे से भरे मंदिर को जाने वाले रास्ते, ब्राह्मण पुजारियों की दयनीय स्थिति, पुजारी के बेटे द्वारा पुजारी बनने से इनकार करने की व्यथा, अधकचरे पंडों की तीर्थों में लूट जैसे मुद्दों पर कभी आंदोलन नहीं दिखता। किसी में यह सवाल खड़ा करने का साहस नहीं है कि हर बड़ा और प्रभावशाली मुस्लिम हिन्दू युवती से ही शादी क्यों करता है और भारत के सभी राजनीतिक दल इसे सेकुलरवाद की शानदार उपलब्धि क्यों मान लेते हैं?” हम सुनते रहे। बहुत असहमत होने की भी गुंजाइश नहीं थी।पर जो हिन्दू समाज कश्मीर के सहधर्मियों को अपने घर वापस नहीं ले जा पा रहा और जिस समाज के सांसद कबूतरबाजी और अवैध कार्यों में “शानदार तरीके” से पकड़े जाते हैं, जहां विलास और ऐश्वर्य सफलता का राजनीतिक मापदंड है वहां हिन्दू पर हिन्दू होने के नाते सब ओर से आघात यदि बढ़ते ही दिखें तो इसे स्वाभाविक ही मानना चाहिए, आश्चर्यजनक नहीं। जब हिन्दू अपने ही घर में ऐसी बाधाओं का सामना कर रहा हो तो क्या उससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह पाकिस्तान, बंगलादेश या मलेशिया के हिन्दुओं की स्थिति के बारे में कुछ सोचेगा?इसलिए रेवती की व्यथा अनसुनी ही रह जाएगी। और रेवती अकेली नहीं। 18 अप्रैल को एपी समाचार एजेंसी ने मलेशिया की इस्लामी अदालत द्वारा रेवती को जबरन मुस्लिम के नाते रहने हेतु बाध्य करने के लिए एक इस्लामी “पुनर्वास” केन्द्र में भेजने का समाचार प्रसारित किया और यह भी बताया कि रेवती की पन्द्रह महीने की बच्ची को उससे तथा पिता से अलग कर रेवती के मुस्लिम माता-पिता के पास जबरन इसलिए भेज दिया गया ताकि वे उसका मुस्लिम के नाते लालन पोषण कर सकें। लेकिन भारत के किसी समाचार पत्र में यह छपा नहीं। इस घटना के बारे में भारत के पक्ष और विपक्ष में बैठे हुए राजनीतिक नेता भी नहीं बोले। लेकिन मलेशिया की डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी के अध्यक्ष श्री लिम किट सियांग ने एक बयान में कहा, “यह अत्यंत दुखद और विडम्बनाजनक है। कानून और मजहब की भुजाओं ने मिलकर एक पिता, मां और उनकी नन्ही बच्ची को जबरदस्ती अलग कर अलग-अलग जगह पर रहने के लिए मजबूर कर दिया है। जब एक परिवार को तोड़ने के लिए कानून और मजहब एक साथ सक्रिय हो जाते हैं तो इससे देश की बदनामी होती है।”रेवती को इस्लामी अदालत ने जनवरी में सौ दिन के लिए “पुनर्वास” शिविर में भेजा था। इस शिविर में रेवती को रखने का उद्देश्य था कि वह मुस्लिम तौर-तरीके अपनाना स्वीकार कर या तो अपने पति को छोड़ दे या पति को भी इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य करे। उल्लेखनीय है कि रेवती के माता पिता मुसलमान थे। पर उसकी दादी हिन्दू थीं। वह अपनी दादी के पास पली-बढ़ी, जिसने उसका हिन्दू नाम रखा और 2004 में सुरेश वीरप्पन से उसका विवाह हुआ। कुछ समय बाद रेवती ने एक बेटी को जन्म दिया। रेवती को जब इस्लामी पुलिस जबरन पकड़ कर ले गई तो सौ दिन की हिरासत के बाद भी उसने मुस्लिम बनना अस्वीकार किया। इससे चिढ़कर मौलवियों ने 17 अप्रैल को उसे पुन: 80 दिन की पुनर्वास हिरासत में भेज दिया। यानी राज्य सत्ता के क्रूर और अमानवीय इस्तेमाल से जब तक रेवती को फिर से मुसलमान नहीं बना दिया जाता तब तक उसकी पुनर्वास हिरासत की अवधि बढ़ाई जाती रहेगी। रेवती के परिवार की व्यथा को व्यक्त कर पाना भी बड़ा कठिन है। रेवती का “अपराध” सिर्फ इतना था कि उसने हिन्दू युवक सुरेश वीरप्पन से शादी कर हिन्दू के नाते जीना स्वीकार किया। उसके माता-पिता मुस्लिम थे। मलेशिया में कानून है कि मुस्लिम माता-पिता की संतान अपना मजहब नहीं बदल सकती । यह कानून व्यक्तिगत पसंद, नापसंद में दखल देता है और बसे बसाए परिवार उजाड़ देता है।यह घटना मलेशिया के लाखों हिन्दुओं की व्यथा का कारुणिक उदाहरण है। इसके बाद 24 अप्रैल को इंटरनेशल हेराल्ड में इसी प्रकार का एक समाचार छपा जिसमें मारी मुत्थु नामक हिन्दू युवक का पूरा परिवार इस्लामी अदालत के आदेश से तबाह कर दिया गया है। उसकी पत्नी को जबरन इस्लामी रीति रिवाज अपनाने के लिए “पुनर्वास” केन्द्र भेज दिया गया है। बच्चे को भी अलग कर दिया गया है। लेकिन इस पर भी भारत के किसी हिन्दू वादी, अहिन्दू वादी, राष्ट्र वादी, परराष्ट्रवादी की सामूहिक चिंता व्यक्त हुई नहीं दिखी है।गत 26 अप्रैल को मलेशिया के नये सुल्तान का राज्याभिषेक हुआ। वहां नौ राज्यों के क्षत्रप बारी-बारी से पांच-पांच साल के लिए सुल्तान बनते हैं। यह प्राचीन मलय हिन्दू परंपरा है। राज्याभिषेक, वंदन, अभिनंदन सब हिन्दू परंपरा से प्रभावित है। पर नये सुल्तान ने सिंहासन पर बैठते ही घोषित किया कि वह मलेशिया में इस्लाम की रक्षा का अपना कर्तव्य निभाता रहेगा। मलेशिया में 60 प्रतिशत मुसलमान हैं। सरकारी तौर पर 11 प्रतिशत और गैर सरकारी तौर पर 15 प्रतिशत से अधिक हिन्दू हैं। हिन्दुओं को हर क्षेत्र से उध्वस्त किया जा रहा है। वहां के हिन्दू संगठनों के अनुसार पिछले दस वर्षों में एक हजार से अधिक हिन्दू मंदिर तोड़ डाले गए हैं। पहले मंदिर तोड़े, अब परिवार तोड़ रहे हैं। लेकिन डेनमार्क के व्यंग्य चित्रों पर आगबबूला होने वाली सरकार मलेशिया में हिन्दू हनन पर क्यों बोलेगी, जब इन मुद्दों पर बाकी भी चुप ही दिखते हैं।6