| दिंनाक: 08 May 2007 00:00:00 |
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जिहादी मानसिकता को समझें जरा!- हृदयनारायण दीक्षितजिहादी आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय समस्या है। यह कट्टरपंथी मजहबी विचारधारा का व्यावहारिक कृत्य है। भारत काफी लम्बे समय से आतंकी कार्रवाई के निशाने पर रहा है। केन्द्र और अल्पसंख्यकवादी राजनीतिक पार्टियां इसके विचाररुाोत, प्रेरणा केन्द्र और देशी प्रशिक्षण केन्द्रों पर गौर नहीं करतीं। विद्वान प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कुछ समय पहले सी.एन.एन. से कहा था, “मुझे गर्व है, हमारे देश में 15 करोड़ मुसलमान हैं। इनमें एक भी अलकायदा या तालिबानी गतिविधियों से जुड़ा नहीं पाया गया।” गर्वोक्ति झूठ साबित हो गयी। बंगलौर के सुशिक्षित मुस्लिम युवक ग्लासगो षड्यंत्र में पकड़े गए हैं। विद्वान प्रधानमंत्री को पूरी रात नींद नहीं आई। उनके सामने आतंकी घटना में गिरफ्तार डा. हनीफ की बिलखती मां का रोता चेहरा बार-बार आया। नींद देशभक्तों की भी गायब है। हमारे पूर्वजों की ही वंश परम्परा में जन्मे भरतवंशी सिर्फ मुसलमान हो जाने के कारण ही क्यों जिहादी आतंकी हैं? नींद अर्थशास्त्रियों/समाजशास्त्रियों की भी उड़ी हुई है। अलकायदा जैसे आतंकी संगठन के लिए काम करने वाले जिहादी आधुनिक इंजीनियर और चिकित्सा विज्ञानी हैं। लेकिन भारत की प्रत्येक आतंकी खूनी वारदात में आस्तीन के सांप नजरअंदाज करने वाले राजनीतिबाज मजे की नींद ले रहे हैं।भारत के कोने-कोने में जिहाद की विचारधारा है, यहां आतंकवादी विचारधारा के प्रशिक्षण की नर्सरियां हैं। जिहाद की फसल है। हिन्दुओं के प्रति घृणा भाव फैलाने वाले केन्द्र हैं। हूजी आतंकी हाल ही में पकड़े गए। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आर.डी.एक्स. बरामद हुआ। राज्य सरकार ने विधानसभा में बताया कि 34 जिले आतंक की गिरफ्त में हैं। आई.एस.आई.यू.पी. में है, सारे देश में सक्रिय है। मध्यकाल लौट आया है। अयोध्या पर जिहादी हमला हो चुका, वाराणसी के संकट मोचन पर हो चुका, अक्षरधाम, रघुनाथ मंदिर पर हो चुका, संविधान के “मन्दिर” संसद पर भी हमला हो चुका। मुम्बई में हो चुका, राजधानी दिल्ली में दीप पर्व भी रक्तरंजित रहा। रेल, बस यात्राएं, बाजार, मेले असुरक्षित हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकी जिहाद लगातार चल रहा है। हम हर आतंकी वारदात में पाकिस्तानी हाथ खोजते हैं, उन हाथों का साथ देने वाले भारतीय हाथ अल्पसंख्यक विशेषाधिकार भोग रहे हैं। पाकिस्तानी आतंकी वारदात के पहले भारत में अपने सहयोगी खोजते हैं, रहने, खाने, घूमने का केन्द्र बनाते हैं, उन्हें यहीं के निवासी राष्ट्रद्रोही भारतीयों का ही सहयोग मिलता है।विद्वान प्रधानमंत्री ने कैसे कह दिया कि उनके देश में अलकायदा या तालिबानी गतिविधियों से जुड़े लोग नहीं हैं? उन्होंने स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया (सिमी) की आतंकी हरकतों पर भी गौर नहीं किया। सिमी भारत के संविधान और राष्ट्रराज्य पर यकीन नहीं करती। वह मूर्ति पूजा को कुफ्र (पाप) समझती है। सिमी अलकायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को सच्चा मुजाहिद मानती है। सिमी, पाकिस्तान, बंगलादेश की जमायते इस्लामी शाखाओं से सम्बंध रखती है। सिमी पर हिज्ब-उल-मुजाहिदीन और आई.एस.आई. से सम्बंधों के आरोप हैं। सिमी भारत पर हमला करने वाले कुख्यात महमूद गजनवी को अपना प्रेरणा पुरुष मानती है। सिमी शिक्षित लड़ाके तालिब (छात्र) तैयार करती है। वह जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानती। सिमी कार्यकर्ता दर्जनों आतंकी घटनाओं और हत्याओं में गिरफ्तार हुए हैं। सरकार ने इसे प्रतिबंधित किया, बावजूद इसके आतंकी परिवारों की ही बेबसी (?) पर रतजगा करने वाली सेकुलर राजनीति सिमी की पैरोकारी करती है। ऐसी राजनीति के माहिर मुलायम सिंह ने अपनी हुकूमत के दौरान सिमी प्रमुख शाहिद बद्र पर चल रहे राष्ट्रद्रोह के मुकदमे की जनहित (?) में वापसी की।जमायत-ए-इस्लाम के संस्थापक, कुरान और शरीयत के व्याख्याता सैय्यद अबुल आला मौदूदी के अनुसार, “कुरान सारी दुनिया की आबादी में केवल दो पार्टियां देखता है, एक- हज्बे अल्लाह-खुदा की पार्टी और दूसरी, हज्बउल शैतान। शैतान की पार्टी में कितने ही मतभेद हों, उनके सोचने और काम करने का ढंग इस्लामी नहीं है, मतभेदों के बावजूद वे सब शैतान की आज्ञाकारिता पर एक राय हैं।” मौलाना मौदूदी ने कहा, “जिन सुधारों को इस्लाम लाना चाहता है वे सिर्फ नसीहत से ही नामुमकिन हैं। दीन (मजहब) की स्थापना की खातिर हुकूमत पर कब्जा चाहिए इसलिए युद्ध अनिवार्य है।”प्रधानमंत्री जी अब भी पढ़ते होंगे। विद्वान पढ़ाई नहीं बंद करते। उन्हें समय के साथ बढ़ने के लिए पढ़ने की जरूरत पड़ती है। नींद नहीं आती, अच्छी बात है। कुरान (सूरा 73 अल मुजम्मिल) में हिदायत है-“ऐ कपड़े में लिपटने वाले रात को उठकर खड़े रहा करो- सिवाय कम रातों के और कुरान को भलीभांति ठहरकर पढ़ो। निस्संदेह रात का जो समा है वह अत्यंत अनुकूल होता है।” (आयत 1-6) कुरान कलामे इलाही है और एक मुकम्मल हिदायतनामा है। कुरान (सूरा 2:216) में नसीहत है, “तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया और वह तुम्हें अप्रिय है। बहुत सम्भव है कि कोई चीज अप्रिय हो लेकिन अच्छी हो, कोई चीज प्रिय हो, लेकिन बुरी हो। जानता अल्लाह है, तुम नहीं जानते” और “अल्लाह के मार्ग पर युद्ध करो।” (वही आयत 244) और “जो लोग अल्लाह” के मार्ग में मारे जाएं उन्हें मुर्दा न कहो, बल्कि वे जीवित हैं, तुम्हें अहसास नहीं (2.154)” और “जिन लोगों ने कुफ्र किया और काफिर (इनकार करने वाले) ही होकर मरे, वही हैं जिन पर अल्लाह की, सारे मनुष्यों की फिटकार है।” (2.161) काफिर कैसे होते हैं? आगे बताया गया, “ये बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, इसलिए ये कुछ नहीं समझते।” (2.18 व 2.171) सूरा 3 आलेइमरान आयत 3 में दीन के बारे में कहा है, “दीन (पंथ) तो अल्लाह की दृष्टि में इस्लाम ही है। जो अल्लाह की आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेने वाला है।” और “जो इस्लाम के अलावा ही आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेने वाला है।”इस्लामी विचारधारा दीगर मजहब वालों के खिलाफ युद्ध की अपीलों से भरी पड़ी है। शांति पसंद मुसलमान युद्ध नहीं चाहते, उनके लिए भी हिदायत है, “अल्लाह के मार्ग पर युद्ध करो, ईमानवालों की कमजोरियों को दूर करो और उन्हें उभारो” (सूरा 4:84) और “ऐ नबी मोमिनों की कमजोरियों को दूर करो, युद्ध पर उभारो (8:64) क्योंकि “निश्चय ही अल्लाह की निगाह में सबसे बुरे वे लोग हैं जिन्होंने इनकार किया।” (सूरा 8:55) इसलिए “यदि तुम उन पर युद्ध में काबू पाओ तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछे वाले भी भाग खड़े हों ताकि वे शिक्षा ग्रहण कर लें।” (वही : 57)। कट्टरपंथी मजहबी राजनेता, उनके समर्थक मौलवी और उलेमा अपनी आक्रामक कार्रवाइयों के पक्ष में ऐसे ही तमाम उद्धरण देकर लड़ाके तैयार करते हैं। जिहादी आतंकवाद एक सुगठित राजनीतिक विचारधारा है। सारी दुनिया को मुसलमान बनाना उसका मकसद है। भारत में तमाम इस्लामी अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं। बावजूद इसके विद्वान प्रधानमंत्री की नींद नहीं उड़ती। दोष आंखों का है या नजर का या चश्मे के नंबर का?17