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-प्यारेलाल खंडेलवाल, राज्यसभा सांसद (भाजपा)
पैगम्बर मोहम्मद साहब के विवादास्पद कार्टून पर मचा हंगामा अब विश्व के कोने-कोने में पहुंच चुका है और इस मुद्दे पर हो रही हिंसा में न जाने कितने लोगों की जानें गई हैं। यही नहीं अब तो मजहबी भावनाएं भड़काकर अपनी वोट बैंक की राजनीति को मजबूत करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष डेनमार्क के एक अखबार ने सबसे पहले पैगम्बर मोहम्मद साहब का कार्टून छापा था। इस पर थोड़ा-बहुत विवाद हुआ, जो अखबार द्वारा माफी मांगने के बाद बंद हो गया। लेकिन इस मुद्दे पर असली विवाद तब शुरू हुआ जब पिछले महीने यूरोप के कुछ अखबारों ने दोबारा इस कार्टून को छाप दिया। माना जा रहा है कि फ्रांस में गत वर्ष हुए दंगे के कथित दोषी इस्लामिक कट्टरपंथियों को हतोत्साहित करने के लिए इन कार्टूनों का प्रकाशन किया गया था। लेकिन इसका असर उल्टा पड़ा और इस मुद्दे ने समूचे जगत में इस्लामिक कट्टरपंथियों को एकजुट होने का मौका दे दिया। इस पूरे प्रकरण में उदार इस्लाम एक बार फिर अकेला पड़ गया जिसका हिंसा और आगजनी से कोई वास्ता नहीं है।
डेनमार्क और यूरोप में छपे कार्टूनों के लिए विभिन्न देशों में स्थित डेनमार्क के दूतावासों को आग के हवाले किया जाए, यह उचित नहीं है। भारत में भी जिस तरह यह विरोध प्रदर्शन उग्र रूप धारण कर रहा है वह भी गलत है। इस विरोध-प्रदर्शन के दौरान लखनऊ में जिस तरह भाजपा मुर्दाबाद के नारे लगाए गए और भाजपा कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की गई, उसका औचित्य भी समझ से परे है। भाजपा का मत है कि किसी भी पंथ-मजहब के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए।
फिलहाल तो अमरीका इस मुद्दे को आंदोलन का रूप देने के लिए ईरान और सीरिया को दोषी ठहरा रहा है, लेकिन उसने खुद आगे बढ़कर विश्वव्यापी आकार ले रहे इस आंदोलन को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। वैसे “जाईलैंड्स पोस्टेन” (डेनमार्क का अखबार) के सांस्कृतिक संपादक ने कहा है कि उनके समाचार पत्र का उद्देश्य इस्लाम का अनादर करना नहीं है। लेकिन लोकतंत्र में सार्वजनिक बहस को रोका नहीं जाना चाहिए। हालांकि इस पूरे विवाद की जड़ समझे जाने वाले व्यंग्य चित्रकार कर्ट वेस्टरगार्ड ने इस मामले में माफी मांगने से इंकार कर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया है, लेकिन उन्हें भी यह समझना चाहिए कि किसी भी विषय पर मिली स्वतंत्रता तभी तक ठीक है जब तक कि वह किसी दूसरे को ठेस न पहुंचाए।
साफ है कि इस मुद्दे पर भड़का असंतोष फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। लेकिन इन सबसे परे हिन्दू धर्म के खिलाफ की जा रही अपमानजनक टिप्पणियों और हिन्दू देवी-देवताओं के अभद्र चित्रों को बनाने या उनके प्रकाशन पर भी रोक लगानी चाहिए।
जिस तरह यूनान के एथेंस शहर में मां दुर्गा के हाथ में शराब की बोतल वाले विज्ञापन प्रदर्शित किये गये, चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने भारत माता का अश्लील चित्र बनाया, पश्चिमी कंपनी ने शौचालय के कमोड पर गणेश जी के चित्र बनवाये, जूतों पर भगवान श्रीकृष्ण के चित्र छापे, जर्मनी में टिश्यू पेपर पर श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र छापे गये और हाल ही में फ्रांसीसी फिल्म “द टैंड 3: फ्रेंड्स फार एवर” में जिस प्रकार भगवान शिव और हिन्दू पूजा पद्धति का उपहास उड़ाया गया है, यह सब भी किसी दृष्टि से सही नहीं कहा जा सकता। इस संदर्भ में एक प्रश्न यह उठता है कि जिस प्रकार सरकार ने पैगम्बर मोहम्मद के कार्टूनों को लेकर डेनमार्क सरकार से आपत्ति जताई, क्या हिन्दू धर्म के अपमान से जुड़े इन मामलों पर भी सरकार ने ऐसी ही कोई कार्रवाई की है? यदि नहीं तो क्यों?
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