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मंथन

Written byArchiveArchive
Sep 7, 2006, 12:00 am IST
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दिंनाक: 07 Sep 2006 00:00:00

ब्रिटिश कूटनीति की विजय है आरक्षण सिद्धांत-2

भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध ब्रिटिश षडंत्र

देवेन्द्र स्वरूप

1857 की क्रांति या प्रथम स्वातंत्र्य समर ब्रिटिश शासकों के लिए बहुत बड़ा धक्का बनकर आया। जिस बंगाल नेटिव इन्फेन्ट्री के बल पर उन्होंने पूरे भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया, जिसकी वफादारी पर उन्हें नाज था वह यकायक बगावत का धमाका कर देगी, यह वे सोच भी नहीं सकते थे। इससे भी बड़ा धक्का यह था कि क्रांति की यह ज्वाला केवल सिपाहियों तक सीमित नहीं थी, आम आदमी भी उसमें पूरे जोशो खरोश के साथ कूद पड़ा था। उस समय के गवर्नर जनरल केनिंग ने बोर्ड आफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष चाल्र्स वुड को ठीक ही लिखा था कि यदि ग्वालियर के दीवान दिनकर राव और हैदराबाद के दीवान सालारजंग ने हमारा साथ न दिया होता तो भारत से हमारा बोरिया बिस्तरा बंध ही चुका था। ब्रिटिश शासकों के लिए सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि 1857 के युद्ध में हिन्दू और मुसलमान समान उत्साह से भाग लेते दिखाई दे रहे थे। क्या वे मान लें कि उनके विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम एक हो गए हैं? क्या भारत की धरती पर हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के एक हजार साल लम्बे अध्याय का पटाक्षेप हो गया है?

ब्रिटिश शासकों ने इन प्रश्नों का बहुत गहराई से अध्ययन किया। इस अध्ययन से उन्होंने जाना कि 1857 की क्रान्ति में दोनों ने भाग अवश्य लिया पर दोनों की प्रेरणा भिन्न थी, लक्ष्य अलग था। मुसलमानों का नेतृत्व वहाबी कर रहे थे, जिनका एकमात्र लक्ष्य भारत में पुन: इस्लामी राज्य स्थापित करना था। “व्हाइट मुगल्स” नामक शोधपूर्ण पुस्तक के बहुचर्चित इतिहासकार विलियम डेलरिम्पिल ने अपनी आगामी रचना “द लास्ट मुगल” के निष्कर्षों पर प्रकाश डालते हुए अंग्रेजी साप्ताहिक “आउटलुक” के ताजे अंक (3 जुलाई, 2006) में लिखा है कि दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में विद्यमान 1857 सम्बंधी अभी तक अनछुए उर्दू स्रोतों के अध्ययन से उन्होंने पाया कि उस विद्रोह में भाग लेने वाले मुस्लिम नेता और सैनिक स्वयं को जिहादी, मुजाहिदीन और गाजी कह रहे हैं। ये समकालीन दस्तावेज इस शब्दावली से भरे पड़े हैं और 1857 की क्रान्ति में मुस्लिम सहभाग की ओर देखने की अलग दृष्टि प्रदान करते हैं। विलियम डेलरिम्पिल स्वतंत्र रूप से उन्हीं निष्कर्ष पर पहुंचे हैं, जो हमने पाञ्चजन्य (21 मई, 2006) में प्रस्तुत किए थे। ब्रिटिश शासकों को मुस्लिम मानस की जानकारी एक अलग स्रोत से भी उपलब्ध थी। वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा कलकत्ता में स्थापित “कलकत्ता मदरसा” का प्रिंसिपल बनाकर एक अंग्रेज फारसीदां कैप्टन (ली) को 1854 में इंग्लैंड से भारत भेजा गया। कैप्टन ली ने चार वर्ष तक मुस्लिम मानस एवं आकांक्षाओं का गहरा अध्ययन करके 1858 में गवर्नर जनरल को एक गुप्त नोट भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि सही या गलत, अधिकांश भारतीय मुसलमान स्वयं को भारत की मिट्टी से जन्मे नहीं मानते। वे स्वयं को विदेशी आक्रांताओं का वंशज मानते हैं। उनकी इस मानसिकता का हमें लाभ उठाना चाहिए। यही मानसिकता सर सैयद के लेखन और कार्यों में पूरी तरह अभिव्यक्त हुई। नोबल पुरस्कार विजेता विद्यासागर नायपाल भी अपनी दो बहुचर्चित पुस्तकों “अमंग दि बिलीवर्स” एवं “बियोन्ड बिलीफ” में इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस्लाम में मतान्तरित व्यक्ति अपने देश, इतिहास और संस्कृति से पूरी तरह कटकर सातवीं शताब्दी के अरब इतिहास और संस्कृति में विलीन हो जाता है।

राष्ट्रीयता की आधारभूमि

इसके विपरीत हिन्दू मानस को भारत भक्ति से ओतप्रोत पाया। “भारत माता” का भाव हिन्दू चेतना में गहरा संस्कारित था। इसी भाव को अठाहरवीं शताब्दी में मुस्लिम दासता के विरुद्ध “सन्तान विद्रोह” के “वन्देमातरम्” युद्ध गीत के रूप में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने मुखरित किया। अंग्रेजी शिक्षा में पहल करने वाले जिन बंगालियों के पूर्ण अंग्रेजीकरण का भ्रम पाल कर वे चल रहे थे उन्हीं बंगालियों ने 1866 से ही स्वदेशी का मंत्र जाप प्रारंभ कर दिया। 1856 में ही महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर के सहयोगी अक्षय कुमार दत्त ने स्वदेशी शिक्षा की आवश्यकता पर बल देना आरम्भ कर दिया। 1866 में राजनारायण बोस ने विकास के स्वदेशी माडल की पूरी रूपरेखा प्रकाशित कर दी। 1867 में उन्होंने नबगोपाल मित्र के सहयोग से “स्वदेशी मेला” का श्रीगणेश किया। उल्लेखनीय है कि “स्वदेशी मेला” को “हिन्दू मेला” या “राष्ट्रीय मेला” भी कहा जाता था। अर्थात् उस समय का प्रबुद्ध हिन्दू मन “स्वदेशी” “हिन्दू” व “राष्ट्रीय” को एक ही समझता था। उसकी यह दृष्टि ब्रिटिश शासकों से छिपी न रह सकी। 1880 में सर जान सीले ने इंग्लैंड में एक भाषण माला में स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादित किया कि भारत में राष्ट्रीयता की आधारभूमि हिन्दू समाज या ब्राह्मणवाद में ही विद्यमान है अत: भारत में ब्रिटिश शासन के स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि हिन्दू मन की सामाजिक विजय के उपाय खोजे जाएं। सर जान सीले की प्रसिद्ध पुस्तक “एक्सपेंशन आफ इंग्लैंड” के इन अंशों को प्रसिद्ध देशभक्त लाला हरदयाल ने “सोशल कान्क्वेस्ट आफ हिन्दू रेस” शीर्षक से प्रकाशित किया था। 1945 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संघ-स्वयंसेवकों को यह पुस्तक आग्रहपूर्वक पढ़वायी जाती थी।

ब्रिटिश शासकों की यह विशेषता रही है कि वे किसी समस्या का गहरा अध्ययन कर एक दूरगामी रणनीति तैयार करते थे। वे समझते थे कि किसी देश की सामाजिक विजय के लिए आवश्यक है कि उनके मन-मस्तिष्कों को बदला जाए, उनके मस्तिष्क-बोध को घायल किया जाए, उनकी इतिहास दृष्टि को विकृत किया जाए अर्थात् सामाजिक विजय के पूर्व उसकी बौद्धिक आधारशिला निर्माण की जाए। इस दृष्टि से उन्होंने हिन्दू समाज की रचना का सूक्ष्म अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि हिन्दू समाज का ऐतिहासिक विकास वर्ण, जाति और जनपद के आधार पर हुआ है। इतिहास द्वारा प्रदत्त जाति और जनपद चेतना की जड़ें हिन्दू मानस में गहरी जमी हैं। जाति, क्षेत्र व भाषा की यह विविधता हिन्दू समाज जीवन का दृश्यमान यथार्थ है। उन्होंने यह भी देखा कि इस ऊपरी विविधता के नीचे सामाजिक‚, भौतिक एवं सांस्कृतिक एकता का एक अखिल भारतीय शक्तिशाली अन्तप्र्रवाह भी विद्यमान है, जो आधुनिक परिभाषा की राष्ट्रीयता की आधारभूमि प्रदान करता है। संचार, परिवहन और विचार प्रसारण के आधुनिक साधनों का उपयोग कर यह अखिल भारतीय सांस्कृतिक अन्तप्र्रवाह धीरे-धीरे राजनीतिक धरातल पर भी प्रगट हो सकता है। अत: ब्रिटिश नीति का लक्ष्य बन गया-जाति और जनपद की संकुचित चेतना का अखिल भारतीय राष्ट्रीय चेतना में उन्नयन होने से रोकना, इन संकुचित निष्ठाओं को उत्तरोत्तर गहरा करते हुए उन्हें परस्पर प्रतिस्पर्धी बनाना, उनमें एक दूसरे के प्रति शत्रुभाव पैदा करना। एकता के सूत्रों को दुर्बल करना और भेद भावना को सुदृढ़ करना।

इसकी बौद्धिक आधारशिला तैयार करने के लिए उन्होंने नवोदित आर्य आक्रमण सिद्धान्त का पूरा-पूरा उपयोग किया। 1880 में एक ओर तो सर जान स्ट्रेची ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “इंडिया” में लिखा कि भारत कोई देश या राष्ट्र नहीं है, वह मात्र एक भूखण्ड है, जिस पर एक दूसरे से पूरी तरह असम्बद्ध जातियों, भाषा-भाषी, उपासना पद्धतियों एवं नस्लों के लोग वास करते हैं। उसी समय सर विलियम हंटर ने भारत के गजेटियर के लिए “भारत” पर एक लम्बा निबन्ध लिखा जिसमें आर्य आक्रमण सिद्धान्त का उपयोग करते हुए कहा गया कि पहले हम भारत में “हिन्दू और मुसलमान” जैसी केवल दो जातियों का ही अस्तित्व देखते थे पर अब गहरा अध्ययन करने से हम जान पाए हैं कि भारत में चार अलग-अलग मनुष्य समूहों का वास है। हंटर ने लिखा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जैसी उच्च जातियां, जिनकी जनसंख्या केवल 16 प्रतिशत है, आक्रमणकारी आर्यो की शुद्ध सन्तान हैं। अस्पृश्य जातियां एवं जनजातियां भारत के मूल निवासियों की वंशज हैं, जिनकी रगों में शुद्ध अनार्य रक्त बहता है। इन दोनों के बीच जो मध्यम जातियां हैं, उनकी रगों में आर्य-अनार्य रक्त का मिश्रण है जिसमें अनार्य तत्व अधिक है और चौथा समूह है मुसलमान। कितना विचित्र है कि हंटर ने उपासना पद्धति के आधार पर मुसलमानों को तो एक अलग नस्ल मान लिया जबकि हिन्दू समाज को नस्ल के आधार पर तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया। यही हंटर साहब हैं, जिन्होंने वायसराय लार्ड मेयो के आदेश पर भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध एंग्लो-मुस्लिम गठबंधन का बौद्धिक पुल तैयार करने के लिए 1871 में “इंडियन मुसलमान्स” नामक महत्वपूर्ण रचना लिखी थी।

कृत्रिम विभाजन

इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह है कि हिन्दू समाज के भीतर जो कृत्रिम विभाजन रेखाएं हंटर ने 1880 में खींची थीं वे स्वतंत्रता प्राप्ति के 60 वर्ष बाद भी भारत में मिटने के बजाय और गहरी हुई हैं। सवर्ण या कास्ट हिन्दू, अनुसूचित जाति/जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्ग या जातियां हंटर द्वारा खींची गयीं विभाजन रेखाओं पर आधारित हैं। यह जानने के बाद भी कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के बीच भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं जीवनशैली की दृष्टि से कुछ भी समान नहीं है। स्वाधीन भारत इन दो सर्वथा भिन्न जनसमूहों को एक ही अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग की रस्सी से बांध कर चलता रहा। भला हो पिछली एन.डी.ए. सरकार का कि उन्होंने पहली बार इन दोनों समूहों के लिए अलग अलग आयोग स्थापित कर इस साम्राज्यवादी विकृति से छुट्टी पायी। किन्तु आर्य आक्रमण सिद्धान्त आज भी अन्य पिछड़े वर्गों या जातियों, अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के पृथकतावादी चिन्तन व लेखन का मुख्य बौद्धिक अधिष्ठान है।

जाति, जनपद और भाषा की संकुचित चेतनाओं को गहरा करने और उन्हें परस्पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मुख्य भूमिका निभाई ब्रिटिश जनगणना नीति ने। 1864-65 से कुछ प्रान्तों में प्रारम्भ हुई जनगणना को ब्रिटिश शासकों ने 1871 में अखिल भारतीय दसवर्षीय जनगणना का रूप दे दिया। उसी परम्परा का हम आज भी पालन कर रहे हैं। 1980 के दशक में पंजाब में सिख पृथकतावाद के हिंसक विस्फोट से चौंक कर हमने इस पृथकतावाद की जड़ों को खोजने की दृष्टि से जब राष्ट्रीय अभिलेखागार में दस्तावेजों का आलोकन किया तो पाया पृथक सिख पहचान को स्थापित करने में ब्रिटिश जनगणना नीति का ही मुख्य योगदान है। उन्होंने ही सिख पहचान को दशम गुरु गोविन्द सिंह द्वारा 1699 में रचित खालसा पंथ के पंच ककार जैसे बाह्र लक्षणों में समाहित करके सिख समाज को गुरु नानक देव से गुरु तेगबहादुर तक के नौ गुरुओं की आध्यात्मिक परंपरा एवं उनके स्रोत गुरु ग्रन्थ साहब व दशम ग्रन्थ से अलग कर दिया।

तभी हमने यह भी पाया कि ब्रिटिश जनगणना रपटों में हिन्दू शब्द को उसके भू-सांस्कृतिक अर्थों से काटकर इस्लाम और ईसाई मत जैसे संगठित उपासना पंथों की पंक्ति में खड़ा कर दिया गया, यद्यपि प्रत्येक जनगणना अधिकारी ने हिन्दू शब्द की व्याख्या करते समय यह स्वीकार किया कि हिन्दू शब्द किसी विशिष्ट उपासना पद्धति का परिचायक नहीं है। इस अर्थान्तरण के साथ ही उन्होंने हिन्दू शब्द से द्योतित समाज की परिधि को भी छोटा करना प्रारंभ कर दिया। परिधि- संकुचन की इस प्रक्रिया के आधार पर हिन्दू की व्याख्या करते हुए 1891 के जनगणना आयुक्त सर अर्थल्स्टेन बेन्स ने अपनी रपट में लिखा, “सिख, जैन, बौद्ध, एनीमिस्टिक (अर्थात् जनजातियां) तथा इस्लाम, ईसाइयत, पारसी एवं यहूदी मतानुयायियों को अलग करने के बाद जो बचता है वह “हिन्दू” शब्द के अन्तर्गत आता है।

विविधता पर बल

यह जो बचा खुचा हिन्दू समाज है उसे भी जातीय, भाषायी एवं क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में उलझा कर खंड-खंड करने का प्रयास ब्रिटिश जनगणना नीति के द्वारा आगे बढ़ता रहा। इस दिशा में हंटर के काम को हर्बर्ट रिस्ले ने आगे बढ़ाया। रिस्ले के आग्रह पर ब्रिटिश सरकार ने पूरे भारत में जातियों एवं नस्लों की सूचियां व जानकारी एकत्र करने के लिए रिस्ले की अधीनता में एक सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की, जिसने सिर, नाक आदि प्राकृतिक मानव अंगों के आधार पर नस्ल निर्धारण की अधुनातन यूरोपीय विद्या का भारत में प्रयोग किया और प्रत्येक भारतीय जाति में कितना आर्य, कितना अनार्य अंश है इसका निर्णय करने वाली एक विशाल ग्रंथ श्रृंखला का निर्माण कराया। क्षेत्रश: “कास्ट्स एण्ड ट्राइब्स” की ये सूचियां आज भी भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध के मुख्य सन्दर्भ ग्रन्थ हैं। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के पूर्व कुलपति स्व. डा. एस.के. गुप्त के निर्देशन में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एच.आर.) ने ब्रिटिश जनगणना नीति के दस्तावेजीकरण पर एक बृहत प्रकल्प अंगीकार किया। प्रो. एस.के. गुप्त की अकस्मात् अनपेक्षित अकाल मृत्यु के बाद भी वह प्रकल्प आगे बढ़ता रहा। चार शोधार्थियों ने तीन-साढ़े तीन वर्ष तक कठिन परिश्रम करके 1871 से 1941 तक की जनगणना रपटों का गहन अध्ययन करके ब्रिटिश नीति पर प्रकाश डालने वाले हजारों दस्तावेज ढूंढ निकाले। किन्तु भारत का बौद्धिक क्षेत्र भी संकीर्ण दलीय राजनीति का बन्दी बन गया है। अत: 2004 के सत्ता परिवर्तन के बाद आई.सी.एच.आर. पर काबिज माक्र्सवादी मस्तिष्क ने ऐसे मूलगामी निरापद राष्ट्रोपयोगी प्रकल्प पर भी रोक लगा दी।

खैर, इन जनगणना रपटों का अध्ययन करने से जो बात उभर कर सामने आई वह यह थी कि एक ओर तो ब्रिटिश जनगणना अधिकारी इस्लाम, ईसाई आदि उपासना पंथों को संगठित रूप देने का प्रयास कर रहे थे, दूसरी ओर हिन्दू समाज में जाति, भाषा और क्षेत्र की विविधता पर बल देकर आन्तरिक कटुता और प्रतिस्पर्धा के बीज बोने में लगे थे। एक ओर तो वे अंग्रेजी शिक्षित हिन्दू मस्तिष्क में यह धारणा बैठा रहे थे कि जातिभेद ही भारत की अवनति और पराधीनता का मुख्य कारण है इसलिए जाति विहीन समाज रचना ही उनका लक्ष्य होना चाहिए, दूसरी ओर वे जनगणना के द्वारा जाति संस्था को सुदृढ़ एवं परस्पर प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस विषय को लेकर ब्रिटिश जनगणना अधिकारियों के बीच समय-समय पर आन्तरिक बहस भी हुई जिसमें एक पक्ष का कहना था कि सभ्यता के आधुनिक स्वरूप परिवर्तन के कारण जाति संस्था अप्रासंगिक एवं शिथिल हो रही है अत: उस पर इतना आग्रह करने का औचित्य क्या है? पर सरकार की अधिकृत नीति जाति के आधार पर शैक्षणिक, आर्थिक एवं सामाजिक जानकारी का वर्गीकरण करना थी। (क्रमश:) (30 जून, 2006)

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