| दिंनाक: 01 Jan 2006 00:00:00 |
|
क्या हुआ अमरीकी दूतावास में?कश्मीर अलग करने पर गंभीरता से काम चल रहा हैजम्मू से विशेष प्रतिनिधिडल झील जम्मू-कश्मीर मेंशंकराचार्य मन्दिरजम्मू-कश्मीर हालांकि संवैधानिक तौर पर भारत का अभिन्न अंग है पर आज इसके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल घुमड़ रहे हैं। एक ओर विदेशी राजनयिक “कश्मीर समस्या” के हल की तलाश को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ कश्मीरी नेता, अलगाववादी तत्वों के साथ मिलकर “स्व-शासन” के पाकिस्तानी सुर में सुर मिला रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार मूक बनी हुई है। इससे पूरी स्थिति बहुत विचित्र नजर आने लगी है।हाल ही में दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास ने कश्मीर पर एक बैठक आयोजित की थी। इस बंद दरवाजे के पीछे हुई चर्चा-वार्ता में अन्य लोगों के अलावा हाउस आफ रीप्रेजेंटेटिव की अंतरराष्ट्रीय सम्बंध समिति के उपाध्यक्ष डान बर्टन, 15 अमरीकी सांसद, नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, हुर्रियत के अध्यक्ष मीरवायज उमर फारूख, भारत सरकार के सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला, दिल्ली पुलिस के समूह निदेशक राधा कुमार और मानवाधिकारकर्मी मधु किश्वर शामिल थे।पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को हालांकि बुलाया गया था पर वे बैठक में नहीं आईं। पर उन्होंने भारत-पाकिस्तान के मत की परिधि में से निकलने वाले हल का समर्थन करने की बात कही। अमरीकी राजनयिकों द्वारा बुलाई इस गुप्त बैठक में शामिल लगभग सभी लोग विवादित रहे हैं और जम्मू-कश्मीर को भारत के जितना संभव हो दूर रखे जाने की सोच के पक्ष में ही दिखे हैं। यह सोच पाकिस्तानी सैन्य शासक जनरल परवेज के उस फामूर्ले से उपजी है जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर को मजहबी और सामुदायिक आधार पर सात खण्डों में बांटकर “स्व-शासन” के तहत उन पर भारत और पाकिस्तान का संयुक्त नियंत्रण होने की बात कही थी।हुर्रियत नेताओं ने जनरल मुशर्रफ के सुझाव का समर्थन किया। महबूबा मुफ्ती ने भी “स्व-शासन” के जनरल के विचार पर गौर किया। नारेबाजी के वातावरण में नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने महत्वपूर्ण बात कही कि उनकी पार्टी राज्य के लिए और स्वायत्तता देने की मांग करती है जो “स्व-शासन” से बहुत अलग नहीं है। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि राज्य विधायिका ने स्वायत्तता समिति की रपट को चार साल पहले स्वीकारा था। रपट भारत के हिस्से वाले कश्मीर राज्य को आठ प्रखण्डों में बांटने की बात करती है जहां नई दिल्ली का केवल सुरक्षा, विदेश मामलों और संचार पर ही नियंत्रण हो। उन्होंने इस स्वायत्तता के विचार पर जनरल मुशर्रफ से मिलने की ओर इशारा भी किया। भाजपानीत राजग सरकार ने स्वायत्तता की रपट को सिरे से नकार दिया था।लेकिन इस वक्त माहौल एक अजीब सी शक्ल लेता दिख रहा है। ऐसी बातें सुनाई दे रही हैं कि केन्द्र 1975 के शेख-इंदिरा समझौते के प्रकाश में राज्य को वृहत स्वायत्तता देने का मन बना रहा है। इस समझौते में 1953 के बाद जम्मू-कश्मीर में लागू कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों की पुनर्समीक्षा का प्रबंध है। शेख अब्दुल्ला के 100 वें जन्मदिवस की पूर्व संध्या पर नए मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद, जो वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हैं, के बयान कि अब मरहूम शेख के सपनों को पूरा करने का समय आ गया है, से ऐसी रपटों की सत्यता सिद्ध होती है। शेख ने हालांकि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय का समर्थन किया था पर बाद में अपने विरोधाभासी बयानों से उन्होंने अजीब स्थिति पैदा कर दी थी। “50 के दशक की शुरूआत में प्रजा परिषद ने उनके बयानों और गतिविधियों के विरोध में बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उस समय संसद में प्रमुख विपक्षी दल, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में जनसंघ ने इसका समर्थन किया था। इस आंदोलन का देशभर में व्यापक असर हुआ और शेख हकबका गए थे। परिस्थिति इतनी प्रचंड हुई कि शेख को कांग्रेस की मदद से उनके ही सहयोगियों द्वारा कुर्सी से हटा दिया गया और 9 अगस्त, 1953 को जेल में बंद कर दिया गया। वे कई साल जेल में रहे और 1975 में शेख-इंदिरा समझौते के चलते कांग्रेस के समर्थन से फिर सत्ता में लौटे।आज शांति प्रक्रिया के नाम पर कई तरह के प्रस्ताव लाए जा रहे हैं। नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्म्द सईद, अलगाववादी तत्व आदि ऐसे बयान दे रहे हैं जिनसे बजाय 1954 में शेख को अपदस्थ करने के बाद एकीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के कश्मीर को भारत से दूर किए जाने की सोच दिखाई देती है। यह अनिश्चितता केवल मुख्यधारा के राजनीतिज्ञों के बयानों के चलते ही नहीं पैदा हो रही है बल्कि विदेशी भारत-विरोधी सोच के राजनयिकों के सहयोग से पाकिस्तान के सुझाव के साथ उनके सहानुभूति दर्शाने से भी बनी है। पाकिस्तान के “स्व-शासन” के नारे और जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त नियंत्रण को लेकर लोग पसोपेश में हैं। वे कहते हैं कि इस राज्य में चुनी हुई सरकार कायम है और पहले भी कई चुनाव हो चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान में सैन्य शासन रहा है, जनरल मुशर्रफ इसके प्रतीक हैं। “स्व-शासन” की कोई भी बात करने से पहले पाकिस्तान अपने कब्जे वाले क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में ऐसा शासन लागू करे, जो सीधे पाकिस्तान के अधीन हैं और इस क्षेत्र के लोगों ने मतदान का कभी मुंह तक नहीं देखा है।जम्मू से विशेष प्रतिनिधि11