| दिंनाक: 12 Nov 2005 00:00:00 |
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हिन्दुत्व के प्रतिनिधिनिशा मित्तलपुस्तक का नाम : “तोड़ो कारा तोड़ो” भाग-4पृष्ठ संख्या : 458मूल्य : 300 रुपएलेखक : नरेन्द्र कोहलीप्रकाशक : किताब घर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्लीस्वामी विवेकानन्द आज भी भारतीय जनमानस को शुद्ध, प्रबुद्ध और जाग्रत करने में उतने ही समर्थ हैं, जितने वे सौ साल पहले अपने समय में थे। नरेन्द्र कोहली ने भारतीय पाठकों पर दो उपकार किए हैं, एक राम कथा लिखकर, दूसरा स्वामी विवेकानन्द के जीवन पर आधारित औपन्यासिक कृति द्वारा। उन्होंने विवेकानन्द को उसी तरह से जीया फिर लिखा, जैसा उन्होंने राम के सन्दर्भ में किया था। नरेन्द्र कोहली के विवेकानन्द हमारे पड़ोसी, सखा और अभिन्न आत्मीय हैं, जो समाज की कुरीतियों, रूढ़ियों और गलत परम्पराओं की कारा तोड़कर विद्रोह का स्वर गुंजाते हैं।तोड़ो कारा तोड़ो- भाग-4 पुस्तक में शिकागो धर्म संसद में स्वामी जी द्वारा हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व वर्णित है।स्वामी विवेकानन्द भारत भूमि पर गोरों के आधिपत्य, पतनोन्मुख भारतीय समाज तथा हिन्दू धर्म की दुर्दशा को लेकर क्षुब्ध हैं। उनको प्रतीक्षा है मां तथा गुरु के निर्देश की। अपनी वेदना मित्रों के समक्ष व्यक्त करते हुए स्वामी जी स्वीकार करते हैं कि हमारे राजाओं का पारस्परिक वैमनस्य ईष्र्या-द्वेष, धन लोलुपता देश को ले डूबी और हमारी पराधीनता का कारण बनी। मतांतरण के कारण हिन्दू धर्म की घटती संख्या का दु:ख तो उन्हें है ही, विडम्बना भी है कि यही हिन्दू मतान्तरित होकर हमारी शत्रु संख्या में वृद्धि करता है तथा हिन्दू धर्म रूपी वृक्ष की जड़ें खोदता है।स्वामी जी धर्म संसद में अपने देश, अपने श्रेष्ठ हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्ञान के विपुल भंडार स्वामी जी, अपने आत्मीयतापूर्ण संबोधन, वाक् क्षमता व अकाट तर्कों के द्वारा धर्म संसद में अपना विलक्षण प्रभाव छोड़ते हैं। समस्त धर्म-पंथ ईश्वर तक पहुंचने की सीढ़ी है परंतु हिन्दू धर्म सभी मत-पंथों का आदर करना सिखाता है। उदारता और सहिष्णुता हिन्दू धर्म के आवश्यक व प्रमुख गुण हैं। मंत्रमुग्ध होकर जन समुदाय उनके विचारों का श्रवण करता है, स्थान-स्थान पर उनके विचार सुनने के लिए विदेशी आतुर हैं। उनकी शंकाओं का समाधान करते हुए स्वामी जी अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। परंतु ईष्र्यावश कुछ भारतीय, कुछ पादरी दुष्प्रचार करते हुए उनके चरित्र हनन का ही नहीं, उनके प्राण लेने का भी प्रयास करते हैं।परन्तु भारत माता के इस सपूत को अपने प्राणों की नहीं, अपने देश व धर्म का ध्वज ऊंचा रखने की चिंता है। सुन्दर भाषा प्रवाह, मधुर रोचक शैली में लिखित यह पुस्तक पाठक को आद्यान्त आबद्ध रखती है।निशा मित्तलNEWS