| दिंनाक: 07 Oct 2005 00:00:00 |
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यह देखिए, जिन दो नदियों से वाराणसी का नाम पड़ा उनमें से असी “नाली” बना दी गयी और वरुणा खतरे मेंअसी नदी, जो अब “नाली” भर रह गई है, (रेखांकित हिस्सा)। इस नदी के बिल्कुल मध्य मेंकिया गया अवैध निर्माण, जिसके थोड़े हिस्से को हाल ही में प्रशासन ने ढहायाहम सुजलाम, सुफलाम… वन्देमातरम् का गायन करते हैं, लेकिन जब देश की महान नदियां सूख रही हों तो उसकी चिन्ता नहीं होती। आज स्थिति यह है कि देश के हर क्षेत्र में प्राचीन, परम्परागत नदियों का प्रवाह सूख रहा है। केरल में, जहां भारतपुझा जैसी महान व जीवनदायिनी नदी सूख गयी है वहीं गुजरात में साबरमती विलुप्तप्राय है। दिल्ली में यमुना कूड़े-करकट से भरा गन्दा नाला जैसी बन गयी है तो कानपुर में गंगा की दुर्दशा है। (इस सम्बंध में इसी अंक में छपा विशेष पाठकीय पत्र पढ़ें)। मोक्षदायिनी वाराणसी की दो प्राणवाहिनी नदियां-वरुणा और असी अब किताबों में ही देखने को मिलेंगी। एक सूख गयी है, दूसरी सूखने के कगार पर है और इन नदियों के प्रवाहमार्ग में जहां कभी कल-कल करता निर्मल जल बहता था, अब मकान, आश्रम और दुकानें बन गयी हैं और यह सब आस्थावान हिन्दुओं के हाथों द्वारा ही हो रहा है। इसके लिए किसी अन्य को दोष नहीं दिया जा सकता। यहां प्रस्तुत है राकेश उपाध्याय की रपट, जिसमें वरुणा और असी नदियों की दुर्दशा का जीवंत चित्रण किया गया है और यह भी बताया गया है कि इन नदियों का विलुप्त होना, वाराणसी के तीर्थत्व पर भीषण आघात है। सं.-असी और वरुणा नदियों का वाराणसी से सरोकार क्या है, यह कोई पूछने की बात नहीं है। वाराणसी अथवा काशी का अस्तित्व ही इन दोनों के कारण है। वामनपुराण में वरुणा और असी नदियों के गंगा में मिलने से जो संगम बनता है, उन दो संगमों के मध्य के भू-भाग को काशी क्षेत्र की सीमा माना गया है।असी वरुणयोर्नद्योरूत्पत्यादौ च संगमम् (वामनपुराण)वर्तमान असी घाट, जहां गोस्वामी तुलसीदास का शरीरांत हुआ, वह घाट असी नदी व गंगा के संगम पर होने के कारण ही असी कहलाया, जहां पर आज भी असी संगमेश्वर मंदिर स्थित है और गंगा दशहरा के दिन आज भी वहां संगम स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। लेकिन इन श्रद्धालुओं को अब संगम के दर्शन नहीं होते। “60 के दशक के अन्त में जब पहली बार गंगा जी के शुद्धीकरण के प्रयत्न प्रारंभ किए गए तो हमारे योजनाकारों ने पहला काम यह किया कि लाखों वर्ष पूर्व के गंगा-असी के संगम के प्रवाह का रुख मल शोधन संयंत्र के नाम पर असी घाट से लगभग 1 कि.मी. और दक्षिण में नगवां मुहल्ले की ओर मोड़ दिया। पुराणों में प्रयाग के योगशायी भगवान विष्णु के बाएं व दाएं पैर से क्रमश: असी और वरुणा की उत्पत्ति मानी गई है। एक और लोक मान्यता है कि मां दुर्गा ने जब शुम्भ का वध कर अपना खड्ग फेंक दिया, तब उस खड्ग के कारण धरती से जो जलधारा फूटी वह असी कहलाई। वाराणसी-प्रयाग जनपद की सीमा पर यह उत्पत्ति स्थान एक बड़े जल स्रोत में स्थित माना गया है। यह स्थान अब भदोही जनपद में आता है।वरुणा पुल के पास का वह नजारा, जहां नदी को मलबे से पाटा जा रहा है।वस्तुत: असी का लघु नदी जैसा स्वरूप हजारों वर्षों से रहा था, गर्मियों में यह अवश्य सूख जाती थी लेकिन शेष मौसम में काशीवासी असी और गंगा के संगम तट पर स्नान और विहार करते थे। स्थानीय भाषा में इसे “बाहरी अलंग” कहा जाता था। वाराणसी के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में रीडर डा. कौशल किशोर मिश्र के अनुसार, “सन् 1975 के आपातकाल के वक्त मैं और मेरे साथी असी नदी के किनारे “बाटी-चोखा” बनाते थे, खूब खेल-कूद होता था। असी के तट पर संत-महात्मा निवास करते थे।” काशी का प्रसिद्ध मुमुक्षू आश्रम असी के तट पर ही है। असी मुहल्ले के ही रहने वाले और काशी के वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी बताते हैं, “हम लोगों के देखते ही देखते असी नाला हो गई। पहले इसे प्रशासन ने नाला कहना शुरू किया फिर नगर निगम के कर्मचारियों ने इसी हिसाब से इसमें गन्दे नाले, मल और सीवर का गंदा पानी डालने की मौन अनुमति दे दी।”काशी विश्वनाथ मंदिर का शिखरकल की असी नदी नाला बना दी गई। आज वाराणसी का हाल क्या है, इसे केवल असी के हाल को देखकर जाना जा सकता है। इसे नाला घोषित करने के बाद तो मानो इस पर कब्जा करने की होड़ लग गयी। इसके लम्बे चौड़े पाट-किनारों पर भू-माफियाओं की निगाह ऐसी गड़ी कि मात्र पिछले 10 वर्षों में ही इन भू-माफियाओं, धन पिपासुओं ने इसे नाले से नाली में बदल दिया। वाराणसी की पहचान इस प्राचीन नदी पर कब्जा करने वालों में आज कौन शामिल नहीं है। इसमें महाविद्यालयों से जुड़े शिक्षक हैं, प्राचार्य हैं, राजनेता हैं, वकील हैं, प्रशासनिक अधिकारी हैं और तो और सन्त-महात्मा भी हैं। वाराणसी नगर निगम, वाराणसी विकास प्राधिकरण, राजनेता-व्यापारी- नौकरशाह, सब ने असी को सुखाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। पैसा देकर सरकारी कागजातों में असी नदी के प्रवाह मार्ग के सूखे भूखण्ड पर अवैध तरीके से पहले व्यक्तिगत नाम चढ़वाए गए, फिर पुलिस-प्रशासन और सत्ता की आड़ लेकर इन भूखण्डों पर कब्जा किया गया। विडम्बना तो यह है कि यह प्रक्रिया उस राज में ज्यादा परवान चढ़ी जिन्होंने हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के नाम पर एक प्रकार से पिछले पन्द्रह वर्षों से वाराणसी पर अपना शासन जमा रखा था। वाराणसी नगर निगम पिछले 10 वर्षों से भाजपा के पास है, वाराणसी लोकसभा की सीट तो 1990 से लगातार भाजपा के पास रही, शहर की उत्तरी विधानसभा सीट छोड़कर शेष दोनों के विधायक भी भाजपा के ही हैं। लेकिन किसी को फुरसत नहीं कि दम तोड़ चुकी असी को पुनरुज्जीवन दे सके। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक एवं तत्कालीन सह-सरकार्यवाह श्री कुप्.सी. सुदर्शन सन् 1996 में जब पुरखों के श्राद्ध के लिए काशी के केदार खण्ड (केदार घाट) में निवास कर रहे थे, तब उन्होंने काशी की दशा से दु:खी होकर वरिष्ठ भाजपा नेताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया था। लेकिन कोई असर नहीं हुआ। और तो और, असी घाट स्थित असी संगम स्थान के ऊपर ही कुछ वर्ष पूर्व एक विशालकाय आश्रम भी बन गया। असी का संगम स्थान जब अपने मूल स्थान से प्रशासन द्वारा हटा दिया गया तब जो स्थान रिक्त हुआ, उस सरकारी जमीन पर अनेक लोगों की निगाहें गड़ गईं। कुछ ही वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री की कृपा से उक्त संगम स्थान को एक आश्रम के भवन के लिए निर्धारित कर दिया गया। जो भी हो, जाने या अनजाने में असी के मूल संगम स्थान पर भव्य आश्रम-प्रासाद खड़ा करके इस प्राचीन नदी को, जिसके कारण वाराणसी का अस्तित्व संसार के समक्ष आया, अन्तिम विदाई दे दी गई है।यह सुजलाम, सुफलाम देश”स्वादिष्ठम” के पीछे असी नदी की दुर्दशा, अतिक्रमणअसी को इस स्थिति तक पहुंचाने वालों की सूची में बिहार कैडर के एक वरिष्ठ आई.पी.एस.अधिकारी और जाने-माने विद्वान भी हैं। संकट मोचन मंदिर के पास असी नदी के मुहाने पर उन्होंने हाल ही में अपनी प्रसिद्ध मिठाई की दुकान “स्वादिष्ठम” नाम से खोली है। और इसके उद्घाटन में सम्मिलित होने वालों में काशी की प्रसिद्ध संस्कृतिनिष्ठ हस्तियां तो थी हीं, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और एक राज्यसभा सदस्य भी पधारे। उस समय अखबारों में जब हल्ला मचा तो उक्त अधिकारी ने अपने वैधानिक कागज-पत्रों के आधार पर स्पष्ट किया कि असी नाले से कुछ फुट जमीन छोड़कर ही यह भवन बनाया गया है। आश्चर्य इस बात का है कि आज जब सामान्य सी बरसात भी हो जाए तो यह नदी अपना पूर्व रूप लेने लगती है, लेकिन असी की सीमा अब मात्र 6 से 8 फुट बताई जाने लगी है।असी-गंगा के मूल संगम पर अब भव्य आश्रम प्रासाद बन गया हैबहरहाल, इन सबसे अलग भी कुछ ऐसे लोग हैं काशी में जो असी की दुर्दशा देखकर विक्षुब्ध हैं और उसे उसके पुराने वैभव को लौटाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मैत्री जलपानगृह में काम करने वाले साधारण कर्मचारी हैं बाबा रामचन्द्र चौबे। सफेद बाल, जर्जर देह, पर उमंगें ऐसी कि जवानों को मात कर दें। गंगा स्नान और संकट मोचन महावीर हनुमान जी का दर्शन, यह उनकी रोज की दिनचर्या है। लिखना-पढ़ना बहुत नहीं आता लेकिन असी के सवाल पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और सभी आला अधिकारियों को पत्र लिखकर गुहार लगा चुके हैं। वाराणसी के वर्तमान सांसद राजेश मिश्र के पास भी वह पिछले दिनों गए थे लेकिन वहां निराशा ही हाथ लगी। आंखों में आंसू लिए बाबा कहते हैं, ” भइया, जे जे असी के फांसी लगवले हव, ओके हनुमान जी, शंकर जी दण्डित करिहैं। देखा, एक दिन समय आई, इ सब कब्जा करय वाले बिला जइहैं।” चौबे जी व्यवस्था से निराश हैं, उन्हें भगवान की आस है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो व्यवस्था से भी लड़ रहे हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कालेज में व्याख्याता डा. आर.एस. दुबे इसी श्रेणी में हैं। उन्होंने गंगा की पवित्रता के साथ असी के पुनरोद्धार के मुद्दे पर काशी में जनजागरण का कार्य प्रारंभ किया है।असी और भदैनी मुहल्ले में भी समाप्त हो रही असी के प्रश्न पर बैचेनी है। असी मुहल्ले में ही रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पाण्डेय असी नदी को वाराणसी की प्राण रेखा बताते हैं। उनके अनुसार, “इस नदी को इसके मूल स्थान से हटाकर काशी की शास्त्रीय मर्यादा तो भंग की ही गई है, असी के लोप होने के चलते काशी ही खत्म हो जाने के कगार पर है। जब असी ही नहीं बची तो काशी कहां से बचेगी?” असी पर लगातार हो रहे अतिक्रमणों के प्रति वाराणसी प्रशासन सदा से मौन रहा है। लेकिन जनमत के दबाव का कुछ असर अब दिखने लगा है। इसी वर्ष के प्रारंभ में वाराणसी विकास प्राधिकरण ने असी पर हो रहे एक भयानक अतिक्रमण को ध्वस्त कर दिया। यद्यपि अतिक्रमण करने वाले सत्तारूढ़ पाटी से सम्बंधित माने जाते हैं, पर जनता के दबाव के समक्ष किसी की एक न चली।वरुणा नदी, जिसके तटों पर अतिक्रमण बढ़ गया हैवाराणसी की एक सीमा असी नदी अब तो दम तोड़ चुकी है और दूसरी सीमा वरुणा नदी पर भी इन कथित भू-माफियाओं की निगाहें पैनी हो गई हैं। वरुणा का प्रवाह आज भी एक अच्छी खासी नदी का स्वरूप रखता है। भीषण गर्मी में भी यह नदी जल से लबालब रहती थी। कारण, इसका जल स्रोत प्रयाग के फूलपुर के समीप स्थित एक विशाल झील से निकलता है। कई किलोमीटर के दायरे में फैली झील के जल के अतिरिक्त जौनपुर की बसुही नदी सहित कई अन्य छोटी-मोटी नदियां इसमें मिलती हैं। लेकिन वाराणसी के भू-माफिया, नगर निगम से जुड़े दलाल और कुछ प्रशासनिक अधिकारी इसे भी निगलने पर अमादा हैं। पिछले 12 वर्षों से काशी नगर का कूड़ा-मलबा कज्जाकपुरा के पास इस नदी के मुहाने पर डालकर इसे पाटा जा रहा है। जिनके मकान इस नदी के किनारे पहले से रहे हैं, वे भी बहती वरुणा को पाटने में पीछे नहीं हैं। परिणामत: वरुणा का प्रवाह जगह-जगह अवैध कब्जों की गिरफ्त में आ चुका है। लोग अब धड़ल्ले से इसके किनारे पर अपनी अट्टालिकाएं खड़ी करने लगे हैं और इन्हें सभी राजनीतिक पार्टियों का मूक समर्थन भी प्राप्त है।राजघाट के पास वरुणा-गंगा संगम स्थान की हालत तो और भी बदतर है। बरसात का महीना छोड़ दें तो अब वरुणा का संगम गंगा से होता ही नहीं। कज्जाकपुर पुल पर बराज बनाकर गंगा से लगभग आधा कि.मी. पूर्व ही वरुणा का जल रोक दिया गया है। यह वही संगम स्थान है जिसके बारे में भगवान शंकर ने पार्वती से कहा था, “हे प्रिये! पुण्य नदी वरुणा जहां गंगा से मिलती है, वह स्थान मुझे प्रिय है, इस संगम पर स्नान-अन्नदान करने से मनुष्यों का पुनर्जन्म नहीं होता”। (मत्स्य पुराण, अध्याय 6, 182-183)। लोग आज भी इस संगम स्थान पर आते हैं, लेकिन वहां की कीचड़, उसमें लोटते जानवर-मवेशी देखकर मुंह बिचकाते हुए लौट जाते हैं।NEWS