| दिंनाक: 07 Oct 2005 00:00:00 |
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बस बातें हुईं, काम नहीं-प्रो. जगमोहन सिंह राजपूतपूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एन.सी.ई.आर.टी.)प्रो. जगमोहन सिंह राजपूतमाध्यमिक स्तर के छात्रों का बस्ता भारी है, इसमें दो राय नहीं है। लेकिन यह समस्या पुरानी है। 1990-91 में राज्यसभा में आर.के. नारायण ने यह मुद्दा उठाया था। उससे पहले भी यह विषय अलग-अलग मंचों पर उठता रहा था। प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी जिसको भारी बस्ते को हल्का करने के उपाय तलाशने को कहा गया था। प्रो. यशपाल समिति की 1993 में रपट आ गई थी। तब एन.सी.ई.आर.टी. को समिति की सिफारिशों पर काम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।हमने यानी एन.सी.ई.आर.टी. ने सन् 2000 में नया पाठक्रम बनाते समय यशपाल समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखा था और कोशिश की थी कि अनावश्यक चीजें, जो अब सारहीन हैं, पाठक्रम से निकलें। समस्या है कि जो लोग पाठक्रम बनाते हैं, वे नया जोड़ने को तो तैयार रहते हैं, लेकिन जो कुछ अनावश्यक हो गया है उसे हटाने को तैयार नहीं होते। यानी पाठक्रम में चीजें बढ़ती चली जाती हैं।दूसरे, अब बच्चों की शिक्षा केवल कक्षा तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। कक्षा के बाहर बहुत कुछ है सीखने के लिए। पाठक्रम बनाने वालों को इस बात का भी ध्यान देना चाहिए। इसलिए उन अनावश्यक सूचनाओं को पाठक्रम में न जोड़ें, जिनका जीवन में महत्व बहुत कम होता है, तो समस्या अपने आप सुलझेगी। दूसरा पक्ष यह है कि हमने अपनी परीक्षा पद्धति में कोई सुधार ही नहीं किया है। हम सुधार की बातें 40 साल से कह रहे हैं, पर हुआ कुछ नहीं है। पूरी शिक्षा व्यवस्था बोर्ड की परीक्षा तक सीमित होकर रह गई है।साथ ही, आज प्रतियोगिता का माहौल बन गया है। लोग चाहते हैं कि हमारा बच्चा ज्यादा से ज्यादा पढ़े। दिल्ली जैसे शहरों में कक्षा 8 के बाद बच्चे को बोर्ड की परीक्षा के साथ-साथ कई तरह की प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती है। एक-एक विषय के लिए माता-पिता 2-3 किताबें खरीदते हैं। बच्चे को न खेलने का समय मिलता है, न दोस्तों से बात का। उसकी सारी इच्छाएं मर जाती हैं। एक बच्चा एक नहीं कई-कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता है।इन सब परिस्थितियों में बहुत आवश्यक है कि हम परीक्षा पद्धति में सुधार करें, पाठक्रम निर्माण की प्रक्रिया को वैज्ञानिक ढंग से, शोध के आधार पर विकसित करें।प्रो. यशपाल ने कहा था कि बच्चे पर समझ का बोझ ज्यादा है। किताब मोटी होने से बोझ नहीं होता। हमें देखना चाहिए कि उसका मस्तिष्क कितना समझ सकता है। अध्यापक को देखना चाहिए कि बच्चा कितना ग्रहण कर पाता है, उसी हिसाब से उसे पढ़ाया जाए।समानता के अवसर देने की बड़ी-बड़ी बातें की गई थीं। लेकिन हमारे बोर्ड की परीक्षाओं की ही विश्वसनीयता घटती गई। परिणामत: संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं का बच्चे पर बोझ बढ़ा। इस कारण कितने ही कोचिंग संस्थान खुल गए हैं। अब तो कोचिंग संस्थान में दाखिले के लिए भी प्रवेश परीक्षा देनी पड़ती है। इन संस्थानों की फीस लाखों रुपए होती है। इसमें समाज में वर्गभेद पैदा हुआ है।हमने अपने कार्यकाल में एन.सी.ई.आर.टी. में कोशिश की थी कि बच्चों की चीजों को समझने के तरीके बदलें, बच्चा खुद करके चीजों को समझे, अवलोकन जैसी बातों को लगातार महत्व दिया जाए। चर्चा-परिचर्चा, प्रश्न-प्रतिप्रश्न को महत्व दिया जाए। इन्हीं चीजों को बढ़ाएं तो बच्चे की रुचि, समझ बढ़ेगी। विषय भी सरल लगेंगे। हमने “ग्रेडिंग” की बात की थी, परीक्षा पद्धति में सुधार की बात की थी। हमने एन.सी.ई.आर.टी. में चार साल में बहुत काम किया था। लेकिन अब तो सेकुलर तत्व कहते हैं, जो हुआ था, गलत हुआ था।दुनिया भर में बस्ते का बोझ कम करने के तरीके निकाले गए हैं। लेकिन हमारी व्यवस्था इतनी जड़ हो गई है कि हम नए की ओर ध्यान ही नहीं देते। विदेशों में बच्चों पर बस्ते का बोझ नहीं होता। वहां बच्चे की रुचि को ध्यान में रखकर केवल रुचि उसी विषय में आगे बढ़ने के अवसर दिए जाते हैं।(वार्ताधारित)NEWS