| दिंनाक: 11 Jun 2005 00:00:00 |
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मन की आंखेंनेत्रहीन शिव जतन ठाकुर ने एक बार कहा था कि वह किसी की दया के नहीं बल्कि ईष्र्या के पात्र बनना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि श्री ठाकुर बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य थे और उनकी नेत्रहीनता को आधार बनाकर किसी ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी कि वह अपने कार्य में अयोग्य हैं। हालांकि उसमें जीत श्री ठाकुर की हुई थी। श्री ठाकुर की स्थिति कोलकाता के नेत्रहीन युवक अजय साव से मेल खाती है। साव भी सिर्फ अपने काम में विश्वास रखते हैं।अजय साव कोलकाता के इंडो एक्सप्रेस कूरियर में पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम करते हैं। इस काम के लिए उनके मालिक संदीप पारेख रोज अजय को पता पढ़कर सुना देते हैं और वह अपनी स्मरण शक्ति के बूते रोज 20-25 पत्रों को गंतव्य तक पहुंचा देते हैं।दक्षिण कोलकाता के गरियाहाट में अपने परिवार के साथ रहने वाले अजय को “ब्रोल लिपि” का ज्ञान है। उन्होंने आठवीं तक पढ़ाई भी की है। उनको कोलकाता का कोना-कोना इस कदर याद है कि वे पता बताने में अपने सहकर्मियों की भी मदद करते हैं। उन्होंने वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी सहित कई नामी-गिरामी हस्तियों के पते पर चिट्ठियां पहुंचाई हैं। अपनी तीन साल की नौकरी के दौरान उन्होंने पत्र बांटने में एक भी गलती नहीं की। साव का कहना है, “एक बार एक वकील ने सड़क पार करने में मेरी मदद की। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं एक कूरियर कंपनी में काम करता हूं तो वे नाराज हो गए और मुझसे अपने नियोक्ता के खिलाफ मुकदमा दायर करने के लिए कहा। यहां तक कि उन्होंने मेरी वकालत मुफ्त करने की भी पेशकश की।” थोड़ी देर तक खामोशी अख्तियार करने के बाद वे मुस्कराते हुए कहते हैं, “उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि मैं अपने रोजगार से खुश हूं। उन्हें मुझ जैसे लोगों को कानूनी सलाह देने की जगह नौकरी देनी चाहिए।” साव सहानुभूति की खातिर गिड़गिड़ाना नहीं चाहते, बल्कि आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहना चाहते हैं।(स्रोत-इंडिया टुडे, 21 मार्च, 05)NEWS