| दिंनाक: 11 Jun 2005 00:00:00 |
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डा. तारादत्त “निर्विरोध”अब न तम हमको कहीं भटका सकेगा,रोशनी का हाथ अपने हाथ में है।वह समय का सूर्य आंगन-द्वार, हर घर,हर दिशा में बांटता है किरण का सुख।सृष्टि उसकी चेतना की अमर कृति है,दृष्टि उसकी भावना का सत्य-आमुख।अब अजाना क्षण हमें क्या छल सकेगाबदलता माहौल अपने साथ में है।आदमी से है जहां सुविधा अपरिचित,विषमताएं ही वहां अन्तर्मुखी हैं।जो सभी के साथ चर्चित हो रही हैंवे विवशताएं वहां सबसे सुखी हैं।अब न बढ़ते पांव की गति थक सकेगी,प्रेम का पाथेय अपने पाथ में है।है जरूरत, दृष्टि के दीपक जलाओ,है जरूरत, चेतना को मत सुलाओ।आदमी से आदमी के बीच में भी,दूरियों को और उसके पास लाओ।अब असंभव कुछ नहीं है, सब नियंत्रित,शक्ति ऐसी किस जगह, किस नाथ में है?NEWS