| दिंनाक: 11 Jun 2005 00:00:00 |
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उनकी दीवाली के बिना अधूरा है भारत!!एक सांझ उनके साथ, जिन्हें अब तक हमारा समाज उपेक्षित, वंचित कहता रहा हैअरुण कुमार सिंहत्रिलोकी गागड़ा की उम्र लगभग 80 वर्ष है। अब दिनभर अपने घर के बाहर एक चारपाई पर बैठकर अपने नाती-पोतों की निगरानी करना ही इनका मुख्य काम है। इनकी सात बेटियां और दो बेटे हैं। एक बेटी की शादी नहीं हुई है और शेष सभी बेटे-बेटियां बाल-बच्चे वाले हैं। तीन विवाहित पुत्रियों, उनके पति और बच्चे तथा दोनों पुत्रों के परिवार, सभी साथ-साथ रहते हैं। परिवार में कुल मिलाकर 21 सदस्य हैं। घर के स्त्री-पुरुष प्राय: कहीं न कहीं सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं। कोई किसी निजी अस्पताल में तो कोई किसी मोहल्ले की सफाई का काम देखता है। फिर भी घर की आर्थिक स्थिति डावांडोल-ही रहती है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक को प्रतिमाह मुश्किल से डेढ़-दो हजार रुपए की तनख्वाह मिलती है। चूंकि सभी साथ रहते हैं इसलिए काम चल जाता है। अन्यथा इतनी कम तनख्वाह में तो एक छोटे परिवार के एक महीने का राशन भी नहीं आ पाता। ऊपर से बीमारी और महंगाई की मार। फिर बच्चे उनके जैसे ही न रहें, इसलिए उनकी पढ़ाई भी जरूरी है। इस हालत में ये लोग मलिन बस्ती में न रहें तो कहां जाएं? त्रिलोकी गागड़ा, जो अभी-अभी अस्पताल से घर लौटे थे, कहने लगे “बवासीर का आपरेशन कराना था। डाक्टर ने आज की तारीख दी थी, पर आज भी उन्होंने कहा एक हफ्ता और दवा खाओ, फिर देखेंगे, बस किसी तरह जिन्दगी कट रही है।” फिर उन्होंने कविता (छोटी बेटी) को आवाज लगाई और उसे चाय बनाने को कहा। बात बढ़ी तो बीती बातें याद कर कहने लगे, “1947 में लाहौर से आकर दादरी के पास एक गांव में बसा। फौज में नौकरी लग गई, पर बीमारी के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी। परिवार के पालन-पोषण के लिए लगभग 30 साल पहले दिल्ली आ गया, तब से इसी बस्ती में हूं। वर्षों तक बांस और प्लास्टिक की पन्नी से बनी झुग्गी में रहा। इधर कुछ वर्षों से बांस की जगह ईंट लगा पाया हूं।”अगले ही सप्ताह आने वाली दीवाली की ओर इशारा करते हुए हमने पूछा कि त्योहार किस तरह मनाते हैं? बोले, “क्या होली, क्या दीवाली, गरीबों की झोली रहती है खाली। इस हालत में बच्चों को पटाखों के लिए 5-10 रुपए देकर लक्ष्मी माता की पूजा कर लेते हैं। पूजा के लिए बाजार से मूर्ति, खील, बताशे और कुछ दूसरी मिठाइयां ले आते हैं। पूजा के बाद आस-पड़ोस में प्रसाद बांटकर मान लेते हैं कि हम जैसों की भी दीवाली हो गई।”यह प्रसंग है पूर्वी दिल्ली के दिलशाद गार्डन एवं सीमापुरी के बीच स्थित एक सेवा बस्ती का। लगभग 5 एकड़ जमीन पर फैली यह बस्ती पूरे इलाके में कलन्दर कालोनी के नाम से विख्यात है। यहां उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, उत्तराञ्चल, उड़ीसा, प. बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों से रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आए लगभग 2000 परिवार रहते हैं। गलियां इतनी संकरी हैं कि राह चलते लोगों से कंधे टकराते हैं। लगभग 7-8 फुट की एक छोटी-सी झुग्गी में चार-पांच सदस्यों का एक परिवार रहता है। हालांकि सरकारी कृपा से गलियां पक्की हो गई हैं, जगह-जगह पर पानी के नल भी लगे हुए हैं। बिजली की व्यवस्था लोग जैसे-तैसे खुद ही कर लेते हैं।उन तंगहाल गलियों में वहां रह रहे लोगों के अलावा कुछ ही लोग जाते हैं। ये लोग किसी न किसी स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता होते हैं। बस्ती के एक कोने में सेवा भारती का कार्यालय भी है। यहां बस्ती की महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाते हैं। पिछले 15 साल से यह कार्य निरन्तर चल रहा है। इस कारण अनेक महिलाएं आज स्वावलम्बी बनी हैं। बच्चों को शिक्षित और संस्कारित करने का भी प्रकल्प यहां चलता है। बच्चे स्कूल जाएं, इसकी आदत डालने के लिए सेवा भारती की ओर से एक योजना “स्ट्रीट चिल्ड्रेन प्रोजेक्ट” के नाम से चलाई जाती है। इसके अन्तर्गत बच्चों को पांच-छह महीने तक सेवा भारती के केन्द्र में ही विभिन्न प्रकार का शिष्टाचार और अक्षर ज्ञान सिखाया जाता है। इसके बाद इन बच्चों को निकटवर्ती विद्यालयों में भेजा जाता है। इस योजना में सेवा भारती के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री जगदीश मेहता लगे हैं। पिछले कई वर्षों से वे इस बस्ती के लोगों के सुख-दु:ख में भाग ले रहे हैं और उनके बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। छोटे से बड़े तक सभी उन्हें “दादा जी” कहते हैं। उनके प्रति बस्ती के लोगों में इतनी श्रद्धा है कि वे जहां भी मिलते हैं, लोग उन्हें पैर छूकर प्रणाम करते हैं। हिमाचल प्रदेश के एक विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे श्री मेहता अब अपना सारा समय सेवा कार्यों में लगाते हैं। नगर निगम में सफाई कर्मचारी 30 वर्षीय जगदीश है कहता है, “जबसे दादा जी यहां आए हैं, तब से यहां के लोगों का जीवन-स्तर ऊंचा हुआ है। पहले मैं जो भी कमाता था शराब पीकर उड़ा देता था। सप्ताह भर घर भी नहीं जाता था। पैसा खत्म होने के बाद ही घर की याद आती थी। भूखा-प्यासा घर लौटने पर मां-बाप, पत्नी, बच्चे सभी ताना मारते थे। किन्तु दादा जी के कारण मैंने शराब छोड़ दी है। अब बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई का ख्याल रखता हूं। नाते-रिश्तेदारों में भी मेरी इज्जत बढ़ी है।” दीवाली के बारे में वह बताता है, “मैंने तो पढ़ाई-लिखाई नहीं की है। और मेरे घर कोई पूजा करने के लिए आना चाहेगा या नहीं, इस संकोच में किसी को बुलाता भी नहीं हूं। इसलिए विधि-विधान से पूजा कैसे होती है, यह मुझे पता नहीं। पर आस-पड़ोस में लोगों को देखकर दीवाली के दिन लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति लाता हूं। फूल-मिठाई, जो भी उपलब्ध हो, मूर्ति के सामने रखकर सपरिवार हाथ जोड़ लेता हूं। पैसा हुआ तो कुछ रिश्तेदारों में मिठाई के डिब्बे दे आता हूं। बस यही है हमारी दीवाली।” जगदीश जब घुटनों के बल चलता था, तब अपने पिताजी के साथ बागपत (उ.प्र.) से इस बस्ती में आया था। अब वह पांच बच्चों का बाप है। पिताजी अब भी नजदीक के एक कारखाने में सफाई कर्मचारी हैं।यहां रहने वाला रामबीर भी बाल्मीकि परिवार से है। 10 साल पहले गढ़ गंगा (गाजियाबाद) से सपरिवार यहां आया था। चालक का काम करता है। कभी ऑटो तो कभी टैक्सी चलाता है। कहता है, “नियमित काम न मिलने से परिवार का खर्च भी नहीं जुट पाता है। तीज-त्योहार गरीबों पर भारी पड़ते हैं। क्योंकि बच्चों के कारण, भले ही उधार लेकर खर्च तो करना ही पड़ता है, पर उसकी भरपाई के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है।” श्री त्रिलोकी गागड़ा की 75 वर्षीया धर्मपत्नी श्रीमती रामवती अभी भी सफाई का काम करती हैं। कहती हैं, “हालांकि काम करने की उम्र तो रही नहीं, पर पेट तो पालना ही है।”इस बस्ती में ही रहने वाली किरण के पति भी सफाई कर्मचारी हैं। दादा जी की प्रेरणा से वह अपने बच्चों को पढ़ने भेजती है। सबसे बड़ा पुत्र दीपक 10वीं का छात्र है। वे कहती हैं, “बच्चों के लिए सभी त्योहार अपनी क्षमतानुसार मनाती हूं। दीवाली में लक्ष्मी पूजा करती हूं, मोहल्लों में मिठाई बांटती हूं और बच्चों के साथ एकाध पटाखे भी फोड़ लेती हूं।” और दीपक कहता है, “हमारा समाज सेवा भारती का ऋण कभी नहीं चुका सकता, क्योंकि हम जैसे सैकड़ों बच्चों को पढ़ाई करने का रास्ता इनके कार्यकर्ताओं ने ही दिखाया है। यदि ये कार्यकर्ता हमें पढ़ने के लिए प्रेरित न करते तो आज इस बस्ती के हमारी उम्र के बच्चे भी कूड़ा बीनते, सड़क पर झाड़ू लगाते या किसी गलत संगत में पड़कर अपना भविष्य खराब कर लेते।”उस दिन ऐसे कई परिवारों से मिलना हुआ। भले ही ये लोग झुग्गी बस्ती में रहते हैं, गरीब हैं, पर मेहमान-नवाजी और शिष्टाचार में दलान वालों को भी पीछे छोड़ देते हैं। सबके यहां चाय-पानी का आग्रह और बोली में इतनी मिठास कि उसके सामने चीनी भी फीकी पड़ जाए।NEWS