| दिंनाक: 11 Jun 2005 00:00:00 |
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रायबरेली के एक छोटे से गांव मुस्तफाबाद में रहने वाली 87 वर्षीया श्रीमती आतिया बेगम देश में होने वाली घटनाओं पर आज भी कितनी पैनी नजर रखती हैं, उसकी एक बानगी है यह कविता, जो उन्होंने कुछ समय पहले ही लिखी है। इस कविता में उन्होंने “अपने घर” की चर्चा भी की है और देश-विदेश में हो रही हिंसा पर चिंता भी प्रकट की है। प्रस्तुत है उर्दू में लिखी उस कविता का हिन्दी रूपान्तरण -हमको मजबूर समझते हो, यह नादानी हैरात आती है तो फुटपाथ पर बिस्तर अपना।अपनी तकदीर में लिखा ही नहीं घर अपना।खून ही खून, अब सुबह कहां, शाम कहां।ढूंढ ही लेंगे जो मिल जाए कहीं घर अपना।हमको मजबूर समझते हो यह नादानी है।बात आये तो लुटा देते हैं हम घर अपना।जोम 1 बातिल 2 पर इतना न इतराव।कुछ हमसे भी डरो।हक के हाथों से बचा पाओगे कब तक सर अपना।राह दुश्वार है सही अजम 3 तो कुस्तकम 4 है।खुल न जाये सर मकतल कहीं दफ्तर अपना।सब जमीं अपनी है परिचय यह है हक सबका।अपने घर से नहीं बेहतर है पराई बस्ती।हम जहां रहते थे बस चाहिए वो घर अपना।न हसद 5 है न कदुरत है न अदावत 6 तुमसे।रोज रोशन की तरह दिल है मनव्वर 7 अपना।(1. अभिमान, 2. असत्य, 3. बीहड़, 4. वनौषधि, 5. ईष्या, 6. शत्रुता, 7. प्रकाशवान)NEWS