| दिंनाक: 06 May 2005 00:00:00 |
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नकारी गई सच्चाईआलोक गोस्वामी18 अगस्त, 1945 को कथित दुर्घटनाग्रस्त हुए जापानी विमान का चित्र।चित्र में साफ दिख रहा है कि दुर्घटना किसी पर्वतीय क्षेत्र में हुई।यह दृश्य प्रचलित घटनाक्रम को नकारता है।जब भी मेरी अनुज से बात होती है तो लगता है जैसे उसके भीतर इतना गुस्सा, इतनी पीड़ा और इतनी वेदना भरी हुई है कि बस, मौका मिलते ही शब्दों में वह पीड़ा बह निकलेगी। अनुज ने 4 साल की कड़ी मेहनत, भागदौड़ के बाद नेताजी के जीवन (“मृत्यु” पश्चात्) के तथ्य जुटाए हैं और इस बीच किस-किस तरह के लोगों से उनका पाला पड़ा है कि बस पूछिए मत। उनकी किताब “बैक फ्राम डेड” में एक-एक तथ्य, परिस्थिति, दस्तावेज और आंकड़ा यही बताता है कि 18 अगस्त, 1945 की उस विमान दुर्घटना में नेताजी संसार से विदा नहीं हुए थे बल्कि अपनी कुछ विशद् योजनाओं को साकार होता देखने के लिए दुनिया की नजर से ओझल हुए थे। शायद रूस में। लेकिन नेहरू जी की सरकार ने खोज नहीं की। नेहरू ही क्या, बाद की इंदिरा सरकार ने भी गंभीरता नहीं दिखाई। क्यों? क्या कारण थे? क्यों नहीं विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रभारी प्रधानमंत्री नेहरू अपने विभाग द्वारा एकत्र की गईं गुप्त जानकारियों को सार्वजनिक करने की हिम्मत जुटा सके? क्यों नहीं उनके द्वारा गठित शाहनवाज आयोग रूस गया या फिर बाद की इंदिरा सरकार द्वारा गठित खोसला आयोग ने ही कोई दिलचस्पी दिखाई?मैं हवाई मार्ग से एक लम्बी यात्रा पर निकलने से ठीक पहले तुम्हें लिख रहा हूं और कौन जाने, कोई दुर्घटना ही न मुझे आ घेरे….।-इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के जानथिवी को नेताजी सुभाषबोस का संदेश,17 अगस्त, 1945अगर यह (विमान दुर्घटना) धोखे में रखने की कोई चाल है तो यह वास्तव में बहुत सावधानी और समझदारी से रची गई है।-ब्रिटिश खुफिया रपट का एक अंश,1 मार्च, 1946मैं देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को बचाए रखूंगा। मैं खुद को शत्रुओं के हाथों में नहीं सौंपना चाहता। मैं जाऊंगा केवल इसलिए कि दुनिया के किसी कोने में रहकर क्रांति की चिंगारी सुलगाए रखूं।-सुभाष बोस का एक कथन, अप्रैल, 1945वैसे भारत ही क्या, दूसरे विश्व युद्ध के समय मित्र देशों की सेनाओं की गुप्तचर एजेंसियों को भी जापान की उस सूचना पर यकीन नहीं था कि एक जापानी विमान दुर्घटना में नेताजी नहीं रहे थे। भारत में गांधी जी और मौलाना अबुल कलाम आजाद ही क्या किसी को भी इस बात पर भरोसा नहीं हुआ था। क्योंकि ऐसा कौन था जो नेताजी के जुझारू व्यक्तित्व और राष्ट्र की स्वाधीनता के प्रति उनके असंदिग्ध अनुराग को नहीं जानता था।सुप्रीम एलाइड कमांडर साउथ ईस्ट एशिया (एस.ए.सी.एस.ई.ए.) एडमिरल माउंटबेटन सुभाष बोस की खोज में थे। मित्र देशों के संयुक्त सशस्त्र बल के ले. कर्नल जे.जी. फिग्गीस को नेताजी की तलाश का काम सौंपा गया था। जापान द्वारा नेताजी की मृत्यु की घोषणा किए जाने के बावजूद उनकी खोज जारी रहना क्या संकेत करता है? उस समय भारत और आस-पास के क्षेत्र कीनिगरानी के लिए जिम्मेदार इंटेलिजेंस ब्यूरो (आई.बी.) भी इस काम में जुट गया। ले. कर्नल फिग्गीस का दस्ता उन जगहों पर पहुंच गया जहां नेताजी अंतिमदिनों में देखे गए थे। 14 सितम्बर, 1945 को सैन्य खुफिया विभाग ने रपट तैयार की- “…..”नेताजी” का मौजूद रहना (शायद भूमिगत तौर पर) नि:संदेह जापानी सैनिकों व जनसामान्य को प्रेरित करता रहेगा।….. भारत के अधिकांश लोगों द्वारा इस (मृत्यु की) खबर पर सहानुभूति व अफसोस जाहिर किया गया है…. लेकिन बंगाल में संदेह व्याप्त है। आमतौर पर माना जा रहा है कि जापान के सहयोग से झूठी खबर उड़ाई गई थी। बोस भूमिगत हो गए हैं ताकि उचित समय पर फिर से सामने आ जाएं।”इधर सैगोन और बैंकाक से भी कई रपटें आ रही थीं जो दृश्य को और धुंधला रही थीं। आखिरकार 6 नवम्बर, 1945 को एस.ए.सी.एस.ई.ए. आयोग (क्र.1) की रपट आई- “इसमें कोई शक नहीं कि उनकी (बोस की) अपने आंदोलन के कुछ चुनिंदा साथियों के साथ भूमिगत होने की योजना थी।”विदेशी खुफिया एजेंसियां साफ कहती रही हैं कि नेताजी दुर्घटना में मरे नहीं थे और उनकी जांच घटना के 15, 25 या 60 साल बाद नहीं हुई बल्कि घटना के एक-दो महीने के भीतर ही हुई थी। तथ्य पता चल चुका था कि नेता जी जीवित थे। पता इतना भर करना था कि कहां थे और किस हाल में थे। आजादी मिली अगस्त, “47 में यानी तथाकथित हवाई दुर्घटना के दो साल बाद। क्यों नहीं भारत सरकार ने तब उन रपटों के आधार पर अपनी एजेंसियों से जांच कराई? क्यों नहीं अधिकारी रूस या जापान या ताइवान या सैगोन या विएतनाम या बैंकाक या मास्को या कोलकाता या जर्मनी भेजे गए? क्यों नहीं इस बात की तहकीकात उस समय की गई जब विमान दुर्घटना के चित्र प्राप्त हुए जो किसी पर्वतीय क्षेत्र में दुर्घटना का संकेत करते थे, जबकि आधिकारिक संदेश के अनुसार ताइहोकू की हवाई पट्टी से निकलते ही जहाज गिर गया था यानी समतल भूमि पर? ऐसे एक नहीं, बीसियों “क्यों” हैं जिनका जवाब न नेहरू सरकार ने खोजने की जहमत उठाई, न इंदिरा सरकार ने।(…. जारी)NEWS