| दिंनाक: 09 Apr 2005 00:00:00 |
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हर पखवाड़े स्त्रियों का अपना स्तम्भपहले पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलेडा. सुशील कुमार गुप्तडा. सुशील कुमार गुप्तप्रश्न है कि क्या आज भी हिन्दू समाज स्त्री के प्रति कठोर है? मेरे विचार से सदियों से चली आ रही पुरुषवादी परम्परा में अन्य सम्प्रदायों के मुकाबले हिन्दू समाज स्त्री के प्रति उतना कठोर नहीं है। नारी की देवी के रूप में पूजा हिन्दू ही करते हैं। हां, यह भी सही है कि बहुत सी बातें जो पहले “परम्परागत व्यवहार” के रूप में थीं, आज “उत्पीड़न” की श्रेणी में हैं। इसे एकतरफा विरोध से बदला नहीं जा सकता।यदि पुरुष किसी का पिता, पति, बेटा, भाई या प्रेमी होकर भी पहले “मनुष्य” है, तो स्त्री मां, पत्नी, बेटी, बहन व प्रेमिका के रूप में केवल “औरत” क्यों मानी जाती है, “मानव” क्यों नहीं? हिन्दू समाज के अग्रणी विचारकों और महापुरुषों की भूमिका बस इतनी हो कि उनके प्रयास से पुरुषवादी पुरातन मानसिकता में बदलाव आ सके।नारी को केवल पुरुष के उपयोग की वस्तु और संतान पैदा करने की मशीन न समझ कर उसे “मानव” समझा जाए और गृहलक्ष्मी और गृहस्वामिनी के रूप में निर्णयों में उसकी भागीदारी सुनिश्चित कराने की मन:स्थिति पुरुषों की बन सके, ऐसा प्रयास हो। शक्तिस्वरूपा की केवल तस्वीर व मूर्ति की पूजा न होकर उसके जीवित-जागृत स्वरूप का सम्मान करने की सद्बुद्धि जब तक पुरुषों में नहीं जगेगी, तब तक सही मायने में स्त्री की भूमिका स्वीकार्य नहीं हो पाएगी। इसी क्रम में स्त्रियों को भी अपनी मानसिकता में बदलाव लाना जरूरी है क्योंकि सर्वेक्षणों से स्पष्ट हुआ है कि अनेक बार स्त्री ही स्त्री की दुश्मन रही है और कई मामलों में पुरुषों को भी स्त्रियों से उत्पीड़ित होने के मामले देखने-सुनने को मिले हैं। रही बात अन्तरजातीय विवाह की तो मैं इसे धर्मविरोधी नहीं मानता। किन्तु जिसे समाज की मान्यता न मिले और परिवार-जन का आशीर्वाद भी प्राप्त न हो, तो वैसी शादी सफल व सुखमय नहीं हो सकती, यह मैं अवश्य मानता हूं।डा. सुशील कुमार गुप्तथाना चौक, पो. खगड़िया (बिहार)NEWS