| दिंनाक: 07 Mar 2005 00:00:00 |
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जब राजनेता इतने गिर चुके हों कि और नीचे गिरने की गुंजाइश न बची हो तो सामान्य नागरिक प्रेरणा और नेतृत्व के लिए किनकी ओर देखता है- राजनेताओं की ओर या समाज नेताओं की ओर? बता रहे हैं – विनोद मेहता, हरि जयसिंह, चित्रा मुद्गल, वेद प्रताप वैदिक तथा देश के अनेक स्थानों से पाञ्चजन्य प्रतिनिधियों द्वारा लिए गए जनमत संग्रह और साक्षात्कार।प्रस्तुति: आलोक गोस्वामीसमाज के नेता हैं समाजकर्मी-चित्रा मुद्गल, प्रसिद्ध उपन्यासकारआम तौर पर देश के नेता तो राजनीतिज्ञ ही माने जाते हैं। लेकिन संस्कृतिकर्मी, कलाकर्मी, पत्रकार, न्यायकर्मी, उद्योगकर्मी, व्यवसायी आदि कहीं-न-कहीं जनतंत्र के पहरुए हैं। यह वो वर्ग है जो जन की शक्ति को चेताये रहता है, उसे सतर्क करता है, बार-बार “जागते-रहो” की गुहार लगाता है। जन को जगाए रखने का उपक्रम करता है।आजादी के काफी दिनों बाद तक तो हम स्वराज की गमक में ही गमकते रहे। इस गमक में जनता को यह अहसास नहीं हुआ कि इस स्व-राज की बुनियाद के ऊपर इमारत किस तरह की बनेगी। विचारधारा को लेकर अलग-अलग तरह से लोग आजादी की लड़ाई के हिस्से बने। आज लगता यह है कि विचारधारा की जड़ता और कई बातों की अप्रासंगिकता से बचने की जरूरत थी, पर बचा नहीं गया, न ही अब बचना चाहते हैं। सामाजिक विषमता के बावजूद लोग आजादी की लड़ाई में एकजुट होकर शामिल हुए और स्वतंत्रता हासिल की। एक आह्वान पर सब विषमताएं भुलाकर लोग साथ आए थे। लेकिन आजादी के आठ-दस साल बाद ही चित्र उभरा कि राजनीति में कोई ब्राह्मण है, कोई वैश्य है, कोई अगड़ा है, कोई पिछड़ा। जिस विषमता को हमें दूर करना था, वह आजादी के बाद और गहरी हुई, जो बहुत ही खतरनाक है। राजनीति में बड़ी चालाकी से उस विषमता को मत-पेटी बना लिया गया।ऐसी स्थिति में समाजकर्मियों को जनतंत्र के पहरूए की तरह अपनी-अपनी जगह सन्नद्ध रहना चाहिए। सच कहूं तो मुझे निराशा नहीं है। राजनेताओं की जो नौटंकी चल रही है, उसका कहीं न कहीं अंत होगा। उन्हें संभल जाना चाहिए। उन्होंने जिस तरह के नैराश्य और विकल्पहीनता की स्थिति पैदा की है, वह खत्म होगी। क्योंकि विभिन्न दलों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो उतने बढ़-चढ़कर सामने नहीं आते, उन पर जनता का ध्यान जाएगा।भविष्य की कुंजी समाजनेताओं के हाथ में ही है, लेकिन अभी ये पहरुए जनता के बीच “जागते रहो” की गुहार लगाते घूम रहे हैं। नई पीढ़ी के सामने असली प्रेरणा भी यही समाजनेता हैं। आज नई पीढ़ी को दूध और पानी का फर्क समझाना पड़ेगा। पानी बहुत गुजर गया है, इसलिए जन के तंत्र के प्रति हमें जागरूक होना पड़ेगा।NEWS