| दिंनाक: 09 Dec 2004 00:00:00 |
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इराक में इस्लामी जिहादियों द्वारा 12 नेपाली श्रमिकों की निर्मम हत्यापर गुस्से से उबला नेपालबेकाबू काठमाण्डूनिर्मम हत्याएं, उफनता आक्रोश-काठमाण्डू से राकेश मिश्रइराक में 12 नेपालियों की हत्या के विरोध में काठमाण्डू में लोग आक्रोश में उबलने लगे। 2 सितम्बर को काठमाण्डू की एक मस्जिद को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दियाइराक में अल कायदा से जुड़े एक आतंकवादी संगठन द्वारा 12 नेपाली श्रमिकों की निर्मम हत्या की खबर मिलते ही नेपाली जनता में शोक की लहर दौड़ गई। राजधानी काठमाण्डू सहित देश के विभिन्न शहरों में स्थित नेपाली श्रमिकों को विदेश भेजने का काम करने वाली कम्पनियों के कार्यालयों पर पथराव किया गया, आग लगायी गई और कम्पनियों के मालिकों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गई। मुस्लिम विरोधी नारे भी लगे। काठमाण्डू की सबसे पुरानी जामा मस्जिद और मस्जिद परिसर में बने बाजार में भी आग लगाई गई और तोड़फोड़ की गयी। स्थिति इस हद तक बेकाबू हो गई थी कि प्रशासन भी ठगा-सा देखता रह गया था। कतर और पाकिस्तानी हवाई कम्पनियों के कार्यालयों पर भी तोड़फोड़ की गयी। बाध्य होकर प्रशासन को 1 सितम्बर को दोपहर ढाई बजे से अनिश्चितकालीन कफ्र्यू लगाना पड़ा। 2 सितम्बर, 2004 की सुबह 9.30 बजे दो घंटे के लिए कफ्र्यू में ढील दी गई ताकि लोग आवश्यक सामान की खरीदारी कर सकें। इसी क्रम में 1 सितम्बर को “कान्तिपुर” दैनिक, “कान्तिपुर टेलीविजन” और “स्पेस टाइम” पत्रिका और “स्पेस चैनल” के कार्यालयों में भी प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की। सार्वजनिक वाहनों को जला दिया। “स्पेस टाइम” और “स्पेस चैनल” के स्वामी जमीम शाह वही व्यक्ति हैं, जिनके खिलाफ भारत सरकार ने लिखित रूप से शिकायत की है कि उस संस्थान में अन्तरराष्ट्रीय माफिया सरगना दाउद इब्राहीम का पैसा लगा है।इराक में काम करने के लिए भेजे गये 12 निर्दोष नेपाली श्रमिकों की क्या गलती थी? अपने परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के लिए वे अपने वतन से बहुत दूर काम करने गये थे। भेजने वाली कम्पनी ने उनसे हजारों रुपए लिए थे। खेद की बात तो यह है कि जिहादी आतंकवादियों ने अपहरण करके उन लोगों को जब तक अपने पास बंधक बनाकर रखा, उस बीच उन्हें रिहा कराने के लिए सरकार की ओर से अपेक्षित प्रयास नहीं किया गया। लोग इस कारण भी क्रुद्ध थे। उनकी निर्णय हत्या की खबर पहुंचते ही काठमाण्डू सहित विराटनगर, वीरगंज, नेपालगंज, जनकपुर, धादिंग वेशी, धनगढ़ी, वित्र्तामोड़, कलैया जैसे एक दर्जन शहरों में लोग सड़कों पर उतर आये। आक्रोश का शिकार बने कुछ मस्जिद-मदरसे। मुस्लिम विरोधी नारे लगाती हुई विशाल एवं क्रुद्ध भीड़ मस्जिदों में घुस गयी और तोड़-फोड़ की, आगजनी की। राजधानी काठमाण्डू में जामा मस्जिद के सामने हजारों की संख्या में लोग 1 सितम्बर की सुबह ही मौजूद हो गये थे। 9 बजते-बजते लोगों ने मस्जिद में घुस कर आग लगा दी, मस्जिद में रखे सामान में आग लगा दी। साम्प्रदायिक दंगा भड़कने की संभावना को देख जामा मस्जिद के नजदीक सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई, फिर भी उत्तेजित भीड़ पर काबू पाना पुलिस के लिए आसान काम नहीं था। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी और गोलियां भी चलानी पड़ीं। जामा मस्जिद में तोड़फोड़ करने के बाद उत्तेजित भीड़ कतर एयरवेज, पाकिस्तान एयरलायंस, इजिप्ट दूतावास सहित मुसलमानों द्वारा संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की ओर बढ़ी और वहां भी काफी क्षति पहुंचाई।यह पहला मौका था कि राजधानी काठमाण्डू में मुसलमानों के खिलाफ इस प्रकार का प्रदर्शन हुआ और मुस्लिम विरोधी नारे लगे। जिस निर्ममता से हत्याएं की गई, उसे देखकर आम नेपाली का खून खौल उठा था।जिहादियों द्वारा नेपाली हिन्दुओं की पहली बार हत्या की गई हो, ऐसी बात नहीं है। पर नेपाल में मुसलमानों के खिलाफ किसी प्रकार का विरोध प्रदर्शन नहीं किया गया था।नेपाल में इस घटना पर दिखे आक्रोश से साफ है कि नेपाल के लोगों में हिन्दुत्वनिष्ठ राष्ट्रवाद पनपने लगा है। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, नेपाल; विश्व संवाद केन्द्र, नेपाल; विश्व हिन्दू महासंघ, हिन्दू जागरण मंच, जनजाति कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू समन्वय परिषद, पशुपति सेना, नेपाल; शिव सेना, नेपाल आदि ने इस्लामी आतंकवाद की घोर निन्दा की है। खास बात यह है कि नेपाल की मंत्रिपरिषद में राजा के प्रतिनिधि एवं सूचना तथा संचार मंत्री के रूप में शामिल मुस्लिम मंत्री डाक्टर मोहम्मद मोहसिन के टालमटोल वाले बयान ने भी आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने कहा था, इराक में बंधक बनाये गये नेपाली श्रमिक चोरी-छिपे वहां गये थे और सरकार से वहां जाने की अनुमति नहीं ली थी, इसलिए इस घटना के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है, फिर भी नैतिक रूप से हम उन्हें रिहा कराने की कोशिश करेंगे।” लेकिन नेपाल सरकार का कोई मंत्री या प्रतिनिधि नेपाली बंधकों को छुड़ाने के लिए इराक नहीं गया।नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा ने एक सितम्बर की रात को राष्ट्र के नाम प्रसारित सन्देश में कहा कि आतंकवादियों की कोई जाति नहीं होती, आतंकवाद फैलाना ही उनका एकमात्र मकसद रहता है। इसलिए आज की विषम परिस्थिति में हम नेपालियों को संयम बरतना और आपसी भाईचारे का प्रदर्शन करना जरूरी है। 2 सितम्बर को देशभर में राष्ट्रीय शोक मनाने का ऐलान किया गया और मृतकों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये सरकार की ओर से दिये जाने की घोषणा भी की गई।इस प्रकरण के बाद नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दल भी जनता के पक्ष में बोलने को बाध्य हुए। नेपाली कांग्रेस (प्रजातांत्रिक), नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले), राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, नेपाल सद्भावना पार्टी (मण्डल) ने इसे मानवता को कलंकित करने वाली घटना बताया है और लोगों से संयम रखने की आग्रह किया है। इसी तरह, नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गिरिजा प्रसाद कोइराला, संयुक्त जनमोर्चा, नेपाल के अध्यक्ष अमिक शेरचन, नेपाल मजदूर किसान पार्टी के अध्यक्ष नारयणमान विजुक्छे और नेपाल सद्भावना पार्टी (आनन्दी देवी) के महासचिव हृदयेश त्रिपाठी ने नेपाली श्रमिकों की हत्या के लिए सरकार की अदूरदर्शी नीति को जिम्मेदार ठहराया है।भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री नटवर सिंह ने प्रधानमंत्री देऊबा से दूरभाष पर सम्पर्क कर भारत सरकार और भारतीय जनता की ओर से नेपाली जनता एवं शोकाकुल परिवारों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है।9