| दिंनाक: 11 Jul 2004 00:00:00 |
|
क्या भाजपा फिर से केन्द्र मेंसत्तारूढ़ हो पाएगी?-अरविन्द घोषलालकृष्ण आडवाणी द्वारा फिर से भारतीय जनता पार्टी की कमान संभालते ही पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं के मन में उत्साह, उमंग और आशा की लहर-सी दौड़ गई। क्या उनके सहारे 2009 में भाजपा पुन: केन्द्र में सरकार बना पायेगी या उसके पहले ही? इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले हमें कुछ बातों पर विचार करना होगा। क्या भाजपा का लक्ष्य केवल चुनाव जीतना और सरकार बनाना है या देश को 2020 तक सच्चे अर्थों में विकसित करना है? क्या पार्टी का एकमात्र लक्ष्य कांग्रेस को हराना है? आज इन प्रश्नों के उत्तर शायद ही किसी के पास होंगे।संघर्षपूर्ण होगा भाजपा कारजत जयन्ती वर्षदो माह बाद भारतीय जनता पार्टी अपने रजत जयन्ती वर्ष में प्रवेश करेगी। वर्ष 2005 को भाजपा अपने रजत जयन्ती वर्ष के रूप में मनाएगी। जब लालकृष्ण आडवाणी ने अपने संबोधन में यह जानकारी राष्ट्रीय परिषद् को दी तब लोगों ने इसे एक सामान्य जानकारी समझा। परंतु जैसे ही उन्होंने आह्वान किया कि राष्ट्रीय परिषद् में आये कार्यकर्ता यह संकल्प लेकर जाएं कि वर्ष 2005 को अविस्मरणीय बनाएंगे, तब उक्त जानकारी का अर्थ समझ में आया।1980 में जिन परिस्थितियों में भाजपा का जन्म हुआ वह किसी से छिपा नहीं है। इन 24 वर्षों में भाजपा ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। परंतु लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिली पराजय ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को हताश तो किया ही है, शिखर नेतृत्व भी इससे चिन्तित है। स्वयं भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी इसे एक बड़ा झटका मानते हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं की निराशा दूर करने के लिए ही उन्होंने कहा कि इस देश का भविष्य महान है और नियति ने हमें उपकरण बनाकर भेजा है।(हि.स.)मेरा मानना है कि देश को विकसित और शक्तिशाली बनाने के लिए आवश्यकता है एक सशक्त संगठन की। भाजपा को पहले संगठन को मजबूत करना होगा, न कि सरकार बनाने के लिए कोशिशें करते रहना होगा। सरकारें बनती हैं, टूटती हैं। प्रधानमंत्री कौन बनेगा- यह कोई भी पहले से नहीं बता सकता। यहां तक कि जो प्रधानमंत्री बने, उन्हें भी पता नहीं था। पं. जवाहर लाल नेहरू भी अपने बलबूते नहीं बल्कि महात्मा गांधी के आशीर्वाद से ही 1946 में पहले कांग्रेस अध्यक्ष बने और बाद में अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष और स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री। श्रीमती इंदिरा गांधी के 1966 में प्रधानमंत्री बनने का कोई कारण नहीं था। वे तो लन्दन जाकर अपने बेटों के साथ रहने की बात सोच रही थीं (इंदर मलहोत्रा, द हिन्दू, 3 अक्तूबर)। परन्तु श्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मृत्यु के बाद ही वे प्रधानमंत्री बनीं। और अगर आपातकाल नहीं लगता तो शायद जनता पार्टी की सरकार भी नहीं बनती।अगर इंदिरा जी की हत्या नहीं हुई होती तो क्या राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनते? नरसिंह राव तो बोरिया-बिस्तर बांधकर हैदराबाद जाने की तैयारी में थे कि राजीव गांधी की हत्या हो गई। फलत: वे प्रधानमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह, श्री चन्द्रशेखर, श्री एच.डी. देवगौड़ा और श्री इन्द्र कुमार गुजराल कैसे प्रधानमंत्री बने, सभी जानते हैं। श्री गुजराल आंध्र प्रदेश भवन में निद्रालीन थे तभी रात को 3 बजे उन्हें जगाकर बताया गया कि उन्हें प्रधानमंत्री बनना है (हरीश गुप्ता के साथ दूरदर्शन पर साक्षात्कार)।वास्तव में संसदीय लोकतंत्र की मान्यता के अनुसार तो श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और श्री अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री बने थे। यानी चुनाव के पश्चात लोकसभा में बहुमत के गणित के अनुसार वे दोनों प्रधानमंत्री बने थे। परन्तु विश्वनाथ जी के बारे में किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि वे एक दिन देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। पर अटल जी के बारे में तो नेहरू जी से लेकर आम जनता को विश्वास था कि एक दिन वे निश्चित रूप से भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे। इन सारी घटनाओं का विश्लेषण कर हम कह सकते हैं कि सरकार बनाना और प्रधानमंत्री बनना “हिट एण्ड मिस” की तरह ही है। अब डा. मनमोहन सिंह को लें। किन परिस्थितियों में वे प्रधानमंत्री बने यह सर्वविदित है।एक और विषय। अटल जी और आडवाणी जी की उम्र को लेकर बातें चलती रहती हैं या चलायी जाती हैं। क्या हम भूल गए हैं कि मोरारजी भाई 84 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे या श्री ज्योति बसु 90 से ऊपर के हो गए हैं? आज हम 90 वर्ष की आयु तक प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद कर सकते हैं। इन सभी बातों के परिप्रेक्ष्य में मेरा मानना है कि भाजपा पहले अपने आपको शक्तिशाली बनाने का प्रयास करे। केन्द्र और राज्यों में सुसंगठित इकाइयां बनाए। अगर केन्द्र के साथ राज्य स्तर पर भी भारी फेरबदल करना पड़े तो उससे हिचकना नहीं चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को लगे कि वह किसी विशेष पद के उपयुक्त नहीं है तो उसे स्वयं पदत्याग करना चाहिए। केन्द्र के सभी पदाधिकारियों को देश के भूगोल, इतिहास-संस्कृति, आर्थिक अवस्था, आधुनिक यंत्र जैसे कम्प्यूटर का व्यावहारिक ज्ञान, मातृभाषा के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और जनसभाओं को संबोधित करने की योग्यता होनी चाहिए। इसके लिए संघ शिक्षा वर्ग जैसे वर्ग भी लग सकते हैं। केन्द्र और राज्यों के मुख्यालयों पर निरंतर कार्यकर्ताओं का आना-जाना होना चाहिए, 5 बजे दफ्तर बंद कर सरकारी नौकर जैसा व्यवहार नहीं चाहिए। और सबसे आवश्यक है कि नेतागण अपने को कार्यकर्ता और कार्यकर्ता अपने को आस्थावान एवं निष्ठावान बनाए रखें।10