| दिंनाक: 06 Jun 2004 00:00:00 |
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दिल्ली दरबारआलोक गोस्वामीकुछ खिले, कुछ मुरझाएरायसीना की पहाड़ियां बीते सप्ताह भारतीय राजनीति की सरगर्मियों से सराबोर रहीं। श्रीमती सोनिया गांधी के “अंतरात्मा की आवाज” सुनने के बाद हुई गहमागहमी की बाबत पिछले अंक में काफी कुछ लिखा जा चुका है। किस तरह 10 जनपथ के बाहर कांग्रेसियों ने जमघट लगाया, कौन सा नेता किस घटक दल के नेता के घर जाकर दरवाजों के भीतर सरकार बनाने की जुगत भिड़ा रहा था, लालू प्रसाद यादव किस तरह अपने अंदाज में कैमरों के सामने हाथ पसार-पसार कर अपनी महिमा का बखान कर रहे थे और किस तरह अंतत: डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में नामित हुए। यह सब कुछ दिखा।22 मई की शाम कइयों की बांछें खिलीं, तो कई चेहरे लटक गए। केन्द्रीय स्तर, राज्य स्तर या स्वतंत्र प्रभार। कुल 67 मंत्रियों ने शपथ ली। अपने-अपने रुतबे और ठसक के हिसाब से घटक दल जितना अधिक से अधिक ले पाए, ले गए। कुछ भवैं फिर भी तनी रहीं। मुम्बई से रिपब्लिकन पार्टी के रामदास आठवले तने-तने से रहे। उन्हें कोई मंत्री पद नहीं मिला। सकपकाए आठवले इसे “दलितों का अपमान” कहते पाए गए। द्रमुक अध्यक्ष करुणानिधि राजस्व सहित कुछ “उम्दा” विभाग चाहते थे। नहीं मिले। काफी मान-मनौव्वल के बाद चेन्नै चले गए। लौटे, तो मनचाहे विभाग मिले।राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और लोकजनशक्ति पार्टी अध्यक्ष रामविलास पासवान ने कभी गलबहियां डालकर फोटो खिंचवाईं थीं। परन्तु राजनीति की क्या कहिए। अपनी-अपनी रेल पटरी पर बैठाने की जुगत में दोनों में ठन गई। बिहार के ही हैं दोनों, अत: रेल का अधिकार तो उन्हीं को न जाएगा। पर जीत हुई लालू प्रसाद यादव की। रेल मंत्रालय में आखिरकार पहुंच ही गए और पहले ही दिन अधिकारियों को कह दिया-शयनयान और निचले दर्जों के किराए न बढ़ाए जाएं, भले वातानुकूलित दर्जे का किराया बढ़ाना पढ़े। अधिकारी भिड़ गए काम में।पी. चिदम्बरम को वित्त विभाग मिल गया। लोग कयास लगाने लगे। पूर्ववर्ती जसवंत सिंह जी द्वारा जारी सुधारों का क्या होगा। चिदम्बरम जी ने मुस्कान बिखेरते हुए कहा, सुधार जारी रहेंगे। वामपंथियों की सहभागिता से सशंकित होकर उतरते शेयर बाजारों की सांस में सांस आई। सूचकांक कुछ ऊपर उठा।दिल्ली से जीते 6 कांग्रेसी नेताओं को मंत्रालय मिलने की उम्मीद थी, पर मिला केवल दो को। जगदीश टाइटलर और कपिल सिब्बल मंत्री बन गए। माकन और सज्जन कुमार मुंहबाएं देखते रहे।राजनीतिक गलियारों में उन नए मंत्रियों को लेकर सुगबुगाहट भी रही जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। ऐसे ही एक मंत्री हैं तस्लीमुद्दीन। संतोष मोहन देव को भारी उद्योगों और सार्वजनिक उपक्रमों का राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार के साथ बनाया गया था। परन्तु तस्लीमुद्दीन का नाम भी उसी विभाग के राज्यमंत्री के रूप में घोषित हुआ, तो लोग चौंक गए। तुरत-फुरत भूल सुधार हुई और तस्लीमुद्दीन को खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्रालय सौंपा गया।आंध्र प्रदेश से एक अजीब खबर आई। वहां कांग्रेस की सरकार बने अभी सप्ताह भी नहीं हुआ था कि एक मंत्री एन. राज्यलक्ष्मी ने गुस्से में इस्तीफा दे दिया। उनके गुस्से का कारण था उनके पति और पूर्व मुख्यमंत्री एन.जनार्दन रेड्डी को मंत्रिमंडल में शामिल न किया जाना। बात तो गुस्सा करने लायक ही है, नहीं क्या!इधर सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए न्यौता मिला, उधर माकपा की पोलित ब्यूरो इसी का फैसला करने कोलकाता में दो दिन के लिए बैठ गई। हां, ना के बाद सोमनाथ बाबू तय हो गए। बधाइयों के फोन पहुंचने लगे। काफी वरिष्ठ सांसद हैं सोमनाथ जी। नाम तय होते ही पहला बयान दिया-विपक्ष की आवाज दबाई नहीं जाएगी। खैर, 2 जून को लोकसभा की पहली बैठक आहूत की गई है। सोमनाथ बाबू अध्यक्ष पद पर बैठकर दोनों ओर बराबर नजर रखेंगे, यही आशा है।अर्जुन सिंह मानव संसाधन विकास मंत्री बने ही थे कि दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् द्वारा प्रकाशित की गईं 8वीं कक्षा तक की पुस्तकें जारी कर दीं। अब जुलाई से वही पढ़ाई जाएंगी, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी.) की नहीं। हां, यह आदेश केवल दिल्ली सरकार के विद्यालयों पर लागू है।कांग्रेसनीत गठबंधन, जिसका आधिकारिक नाम संयुक्त प्रगतिशील गठंबधन रखा जा चुका है, ने काफी भागमभाग के बाद न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय किया। कई बिन्दु हैं इसमें। आर्थिक सुधार जारी रहेंगे, सार्वजनिक क्षेत्र के लाभ कमाने वाले उपक्रम विनिवेशित नहीं होंगे, विकास दर 7-8 प्रतिशत रखी जाएगी आदि-आदि। वामपंथियों की कहीं चली, कहीं नहीं भी चली। कार्यक्रम कितना क्रियान्वित होगा, यह तो समय ही बताएगा।अंत में केवल मुलायम सिंह यादव का ताजा बयान-“सुरजीत के कारण हुई समाजवादी पार्टी की किरकिरी।”33