| दिंनाक: 06 Jun 2004 00:00:00 |
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मेरी सास, मेरी मांमेरी बहू, मेरी बेटीजब भी सास- बहू की चर्चा होती है तो लगता है इन सम्बंधों में सिर्फ 36 का आंकड़ा है। सास द्वारा बहू को सताने, उसे दहेज के लिए जला डालने के प्रसंग एक टीस पैदा करते हैं। लेकिन सास-बहू सम्बंधों का एक यही पहलू नहीं है। हमारे बीच में ही ऐसी सासें भी हैं, जिन्होंने अपनी बहू को मां से भी बढ़कर स्नेह दिया, उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। और फिर पराये घर से आयी बेटी ने भी उनके लाड़-दुलार को आंचल में समेट सास को अपनी मां से बढ़कर मान दिया। क्या आपकी सास ऐसी ही ममतामयी हैं? क्या आपकी बहू सचमुच आपकी आंख का तारा है? पारिवारिक जीवन मूल्यों के ऐसे अनूठे उदाहरण प्रस्तुत करने वाले प्रसंग हमें 250 शब्दों में लिख भेजिए। अपना नाम और पता स्पष्ट शब्दों में लिखें। साथ में चित्र भी भेजें। प्रकाशनार्थ चुने गए श्रेष्ठ प्रसंग के लिए 200 रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।उस प्यार का मोल नहीं…ममता का सागर मां: श्रीमती मंजुला सिंह(सबसे दाएं)अपनी सास श्रीमती प्रेमलता सिंह के साथ।गोद में है पुत्र मुदित सिंह-मंजुला सिंहमेरा विवाह मई 1983 में हुआ था। विवाह से पूर्व ही बैंक में कार्यरत थी। हम संयुक्त परिवार में रहते थे। 1986 में मैंने बैंक में पदोन्नति के लिए होने वाली परीक्षा की तैयारी प्रारम्भ की। परीक्षा के एक सप्ताह पूर्व मैं पढ़ाई के लिए अवकाश लेती थी। उन दिनों मैं पढ़ने के कारण रसोई का कोई काम नहीं करती थी।नवम्बर 1986 की एक सुबह मैं आंगन में बैठी पढ़ रही थी। सुबह 6 बजे अम्मा जी (सासूजी) आंगन में तेजी से कुछ लेने आईं। मुझे भूख लग रही थी, अत: मैंने यूं ही कहा- “अम्मा जी, रात को ही परांठे बनाकर रख लिया करेंगे, सुबह ही पेट में “वैक्यूम” हो जाता है।” पर वे मेरी तरफ देखे बिना उसी तेजी से अन्दर चली गईं। मैं फिर पढ़ाई में तल्लीन हो गई। “मंजू, किस आचार से खाओगी?” मैंने आश्चर्य से देखा-खिड़की पर एक प्लेट में गरमागरम चार पूड़ियां व चाय रखी थीं। मैंने तो सोचा था कि वह मेरी बात सुन ही नहीं पाईं। और “वैक्यूम” शब्द का अर्थ वह समझ पाई होंगी? मुझे इसमें संदेह है। पर वह मेरी बात का अर्थ समझ गई थीं।इस घटना ने मुझे अम्मा जी के भीतर छुपे ममत्व के दर्शन करा दिए-जिस समाज में बेटे-बेटी की पढ़ाई में ही अन्तर किया जाता हो, वहां बहू को पढ़ने के लिए प्रेम से प्रोत्साहित करने वाला दिल किसी बहुत अच्छी मां का ही हो सकता है। उनके उत्साह, प्रोत्साहन व सहयोग के परिणामस्वरूप मैं हर परीक्षा में उत्र्तीण हुई। आज इतने वर्ष बाद भी यदि हम संयुक्त परिवार में सुख से रह रहे हैं तो यह उनके प्रेम के कारण ही है। अम्मा जी के लिए तो बस इतना ही कहूंगी-भगवान के पास भी माता तेरे प्यार का मोल नहीं।मंजुला सिंहद्वारा-डा. शिव प्रताप सिंह तोमरएफ-3, कृषि कालोनी, बस स्टैण्ड के पास,ग्वालियर-47400220