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विभाजन की विभीषिका : न रहने का ठिकाना, न खाने का…

भारत के बंटवारे के समय मैं अपनी मां की गोद में ही थी यानी करीब चार वर्ष की। इसलिए मुझे उन दिनों की घटनाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं पता, लेकिन मां और परिवार के अन्य लोग हम बच्चों को बराबर बताया करते थे कि उन दिनों क्या-क्या होते थे

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 18, 2026, 04:09 pm IST
inभारत
सुनीता कोहली

सुनीता कोहली

भारत के बंटवारे के समय मैं अपनी मां की गोद में ही थी यानी करीब चार वर्ष की। इसलिए मुझे उन दिनों की घटनाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं पता, लेकिन मां और परिवार के अन्य लोग हम बच्चों को बराबर बताया करते थे कि उन दिनों क्या-क्या होते थे। हम चार भाई-बहन हैं। हम सभी विभाजन की घटनाओं, उसकी भयावहता, उसके दर्द और मानवीय संवदेननाओं की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए। मेरा परिवार लाहौर में रहता था। उन दिनों लाहौर में अच्छी संख्या में हिंदू रहते थे। इसलिए लोगों को पूरा भरोसा था कि लाहौर पाकिस्तान में नहीं जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा बन रहा है, इस खबर की पुष्टि के साथ ही वहां का माहौल गर्म हो गया। चारों तरफ अफरा—तफरी मच गई। काट-मार शुरू हो गई। अब हिंदुओं के सामने एक ही रास्ता था कि वे भारत की ओर बढ़ें।

एक दिन छुपते-छुपाते फटेहाल स्थिति मेें मेरे परिवार के लोग भी भारत के लिए चले। कई दिन पैदल चले। वे दिन उन माताओं के लिए बहुत ही कष्टदायक थे, जिनके पास बच्चे थे। घर के पुरुष सामान की पोटली लेकर चलते थे और महिलाएं बच्चों को जैसे-तैसे संभालती हुईं बढ़ती थीं।

मेरी मां बड़े भाई और मुझे संभाल रही थीं। हम और आप उनके दर्द का अनुमान भी नहीं लगा सकते। कहां जाना है, कब तक चलना है, कहां रहना है, क्या खाना है, कुछ भी नहीं पता। फिर भी लोग जान बचाने के लिए चल रहे थे। जैसे—तैसे मेरे परिवार के लोग जम्मू पहुंचे। वहां कुछ दिन रहे, फिर दिल्ली आ गए। न रहने का ठिकाना, न खाने का, न रोजगार का। ऐसे में हम जैसों के परिवार वालों ने जो तकलीफें झेलीं, मेहनत की, उसका अंदाजा आज की पीढ़ी लगा भी नहीं सकती।

उन लोगों ने अपने को जिंदा रखने के लिए, अपने बच्चों को पालने के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा की। आज मेरे जैसे परिवारों में जो भी थोड़ी-बहुत चमक-दमक दिखती है, उसकी नींव में वही लोग हैं, जिन्हें मजहब के नाम पर पूरी तरह उजाड़ दिया गया। प्रभु ऐसे हालात और किसी के सामने न बनाएं।

-सुनीता कोहली
मूल निवासी : लाहौर, पाकिस्तान

Topics: पुनर्वास और आत्मनिर्भरतापाञ्चजन्य विशेषविभाजन की त्रासदीसुनीता कोहलीविस्थापन और शरणार्थीलाहौर का विभाजनमानवीय संवेदनाएं और दर्दलाहौर से भारतबेघर और भुखमरीजीवन संघर्ष और परिश्रमपलायनमजहबी दंगे और हिंसाविभाजन की विभीषिका
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