आज सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। दोस्ती, पढ़ाई, नौकरी और मनोरंजन के लिए लाखों युवा रोज इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यही माध्यम आतंकवादी संगठनों और उनके समर्थकों के लिए भी एक खतरा बन गया है। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आरोप है कि पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों ने सोशल मीडिया के जरिए भारत के कुछ युवाओं से संपर्क किया और धीरे-धीरे उन्हें अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की।
सोशल मीडिया से शुरू हुआ संपर्क
पिछले दो वर्षों में देश की अलग-अलग लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों ने ऐसे कई युवाओं की पहचान की है। इनमें उत्तर प्रदेश के बाराबंकी का 23 वर्षीय अशरफ दानियाल, मुंबई के कुर्ला का 21 वर्षीय साजिद महबूब शेख और गोरखपुर का 20 वर्षीय कृष्णा मिश्रा शामिल बताए गए हैं। पंजाब के गुरदासपुर के अमरजीत सिंह, करनजीत सिंह और उनके दोस्त सतनाम सिंह का नाम भी जांच में सामने आया है। एजेंसियों के अनुसार, इन युवाओं से सोशल मीडिया के जरिए संपर्क कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की गई।
आतंकवादी नेटवर्क अक्सर युवाओं की कमजोर परिस्थितियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। आर्थिक परेशानी, अकेलापन, बेरोजगारी या जीवन में किसी तरह की निराशा से गुजर रहे युवाओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करना उनके लिए आसान हो सकता है। शुरुआत में बातचीत दोस्ती या मदद के नाम पर हो सकती है। बाद में धीरे-धीरे सोच और भावनाओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। यही प्रक्रिया आगे चलकर आतंकवाद के लिए इस्तेमाल होने वाली भर्ती का रूप ले सकती है। किसी युवा को यह भरोसा दिलाया जा सकता है कि वह किसी बड़े उद्देश्य के लिए काम कर रहा है, जबकि वास्तव में उसे हिंसा और गैरकानूनी गतिविधियों की तरफ धकेला जा रहा होता है। इस तरह आतंकवादी नेटवर्क खुद सामने आए बिना दूर बैठे लोगों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं। सुरक्षा एजेंसियों के लिए सोशल मीडिया के जरिए होने वाली ऐसी गतिविधियां बड़ी चुनौती हैं। इसलिए युवाओं में डिजिटल जागरूकता बढ़ाना, संदिग्ध ऑनलाइन संपर्कों को गंभीरता से लेना और समय रहते परिवार या संबंधित एजेंसियों को जानकारी देना जरूरी है। आतंकवाद से लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जागरूकता और सही जानकारी से भी लड़ी जाती है।
















