2012 में आरबीआई ने कहा था कि औसतन हर भारतीय साल में सिर्फ छह नॉन-कैश ट्रांजेक्शन करता है। अगर हर नागरिक महीने में एक ट्रांजेक्शन करे तो साल में 1,200 करोड़ ट्रांजेक्शन हो सकते हैं। 2025-26 में डिजिटल ट्रांजेक्शन 28,174 करोड़ हो गए, जिनमें से 86 प्रतिशत यूपीआई से हुए। आज 55 करोड़ से ज्यादा लोग यूपीआई इस्तेमाल करते हैं और 703 बैंक व पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर इससे जुड़े हैं। अप्रैल 2016 में पायलट लॉन्च हुआ और अगस्त में पूरी तरह चालू हो गया। अब पेमेंट्स एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में संशोधन से मर्चेंट्स से यूपीआई पेमेंट पर फीस लेने का रास्ता खुल गया है।
कैश ऑन डिलीवरी और तेजी से फैलाव
NPCI और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने 2012-13 से यूपीआई पर काम शुरू किया। RBI के विजन डॉक्यूमेंट में बताया गया था कि ई-कॉमर्स में लगभग एक-तिहाई पेमेंट कैश ऑन डिलीवरी से होते हैं। 2013 की RBI कमिटी रिपोर्ट में IMPS के बाद मोबाइल बेस्ड ट्रांजेक्शन के तेजी से बढ़ने की बात कही गई थी। 2016 में UPI आया। नोटबंदी से थोड़ी तेजी आई, लेकिन दिसंबर 2017 तक मासिक वैल्यू 10,000 करोड़ रुपये से कम थी। एक साल बाद यह एक लाख करोड़ पार कर गई।
MDR की रुकावट
नंदन नीलेकणि की कमिटी ने 2019 में कहा कि ग्राहकों और छोटे मर्चेंट्स से डिजिटल ट्रांजेक्शन पर बैंक चार्ज न लें और 2,000 रुपये तक के ट्रांजेक्शन पर सरकार MDR सब्सिडी दे। 2020 में सरकार ने छोटे मर्चेंट्स के लिए 2,000 रुपये तक के UPI और रुपे डेबिट कार्ड पेमेंट पर सब्सिडी शुरू की, जो ट्रांजेक्शन वैल्यू का अधिकतम 0.15 प्रतिशत थी। कोविड महामारी ने भी UPI के इस्तेमाल को बढ़ाया क्योंकि लोग कैश छूने से बचने लगे।
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निवेश से आई इनोवेशन
2019 और 2021 में फिनटेक में निवेश बहुत बढ़ा। BIS की रिपोर्ट के अनुसार पेमेंट फर्मों ने लगभग आधा हिस्सा लिया। पेटीएम और फोनपे जैसे डील इससे जुड़े थे।
बैंकों के लिए बहुत देर हो चुकी
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एसबीआई चेयरमैन सीएस सेट्टी का भारत में मजबूत हो रहे डिजिटाइजेशन को लेकर कहना है कि बैंक पेमेंट्स की बस छूट चुकी है और अब पकड़ना मुश्किल है। जुलाई में फोनपे और गूगल पे ने मिलकर 80 प्रतिशत यूपीआई ट्रांजेक्शन और 83 प्रतिशत वैल्यू हैंडल की। किसी एक प्लेयर का शेयर 30 प्रतिशत तक सीमित करने का नियम दिसंबर 2026 तक टल चुका है। एसबीआई का शेयर वॉल्यूम में सिर्फ 0.1 प्रतिशत और वैल्यू में 0.2 प्रतिशत रहा।
खर्चे बढ़ते जा रहे
नवंबर 2019 से मई तक क्रेडिट-डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन (एटीएम छोड़कर) सिर्फ 17 प्रतिशत बढ़कर 70 करोड़ हुए, जबकि यूपीआई में 1,800 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। टेक्नोलॉजी, बैंकिंग और कंप्लायंस का खर्च सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये है। सरकार की सब्सिडी इससे कम पड़ती है। पेमेंट इंडस्ट्री बड़े मर्चेंट्स पर 2,000 रुपये से ज्यादा के पेमेंट पर 0.3-0.6 प्रतिशत एमडीआर की मांग कर रही है। ऐसे ट्रांजेक्शन संख्या में सिर्फ 4 प्रतिशत हैं लेकिन वैल्यू में 68 प्रतिशत।
आगे की ग्रोथ
वित्त मंत्रालय ने कहा कि सिर्फ सब्सिडी पर निर्भर रहना अगली ग्रोथ के लिए संभव नहीं। अगली लहर ग्रामीण और सेमी-अर्बन इलाकों से आने वाली है। एनपीसीआई सीईओ दिलीप असबे ने कहा कि क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट में भी आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं। यूपीआई अभी भूटान, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका, यूएई, कतर और कंबोडिया में अलग-अलग स्तर पर चल रहा है।
सिंगापुर के पेनाउ से लिंक तीन साल से ज्यादा पुराना है। इंटरनेशनल बैंक ट्रांसफर में कई दिन लगते हैं और खर्च 7 प्रतिशत तक हो सकता है। पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया और नीलेकणि कमिटी ने भी एमडीआर को मार्केट फोर्स से तय करने की बात कही है।

















