नेपाल में हाल के दिनों में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाओं ने भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच टकराव की खबरें लगातार आ रही हैं। नेपाल में हाल में हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसा के पीछे धार्मिक कावड़ यात्रा के दौरान लाउडस्पीकर, झंडों और जुलूसों को लेकर पैदा हुआ विवाद है। जुलाई-अगस्त 2026 में नेपाल के सुनसरी, सप्तरी और मधेश-तराई बेल्ट में सांप्रदायिक झड़पें हुईं, जिनमें तीन लोगों की जान चली गई थी।
यह विवाद सावन की बोलबम यात्रा के दौरान भड़काँए के बाद में अन्य जिलों में फैल गया है। स्थिति नियंत्रित करने के लिए नेपाल के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में तनाव के मद्देनज़र कई इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, इस हिंसा में कई लोगों की मौत और अनेक लोग घायल हुए हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए निष्पक्ष जांच का दिया है।
कांवड़ यात्रा और धार्मिक जुलूसों से बढ़ा विवाद
हिन्दुओं के लिए पवित्र महीने सावन में भारत की तरह ही नेपाल में भी भगवान शिव के मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं। भारत और पूर्वी दक्षिण एशिया के देशों कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड की तरह नेपाल में पशुपतिनाथ सहित अनेक शिव मंदिरों का काफी धार्मिक महत्व है। भारत की तरह ही श्रद्धालु नेपाल में भी धार्मिक जुलूसों में भजन, डीजे, झंडे और बड़ी संख्या में पवित्र मन से भागीदारी करते हैं।
मगर हिन्दुओं का धार्मिक जुलूस जब मुस्लिम समाज की बहुतायत वाले इलाकों से गुजरती है तो कई मौकों पर लाउडस्पीकर, धार्मिक प्रतीकों और जुलूस के मार्ग में कई प्रकार की समस्या और धार्मिक टकराव भी देखा जाता है। नेपाल में भी भारत की तरह ही इस तरह के विवाद ने हिंसक टकराव का रूप ले लिया है। कांवड़ यात्रा और अन्य हिन्दुओं की धार्मिक कार्यक्रमों में मुस्लिम समाज के एक ख़ास वर्ग के द्वारा व्यवधान पैदा करना एक आम घटना है। इस प्रकार की घटना अब केवल भारत में ही नहीं, बल्कि नेपाल में भी पैर पसारना शुरू कर दिया है। नेपाल के इस घटना के बाद मुस्लिम समाज के प्रति बहुतायत हिन्दू समाज में गुस्सा और दुराव का भाव देखा जा रहा है।
संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य है नेपाल
नेपाल का संविधान देश को एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य है। पूर्व में नेपाल नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राजतंत्र था। 2008 में नेपाल ने राजशाही समाप्त करके गणराज्य का रास्ता अपनाया और इसके बाद देश की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किया गया था। वर्तमान में नेपाल में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग बढ़ती जा रही है। नेपाल की आबादी में महज पांच प्रतिशत होने के बावजूद भी मुस्लिम वर्ग के द्वारा हिन्दू धार्मिक आयोजनों और अन्य प्रकार के दैनिक जीवन में अवरोधों के कारण अब नेपाल का हिन्दू वर्ग देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का मांग कर रहा है।
नेपाल सरकार के समक्ष है कौन सी चुनौती
नेपाल सरकार काफी बचकर चल रही है, क्योंकि सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता, कानून-व्यवस्था और आर्थिक विकास है। बालेन शाह द्वारा इसी साल मार्च महीने में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनका पहला दायित्व देश में हुए सांप्रदायिक हिंसा के बाद शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।
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देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने का मन बना रही सरकार
जनता की मांग पर नेपाल सरकार देश को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए मन बनाती दिख रही है। नेपाल में जनता पूर्व की भांति ही राजशाही की वापसी की मांग कर रही है। इस मांग का एक प्रमुख कारण देश में राजनीतिक अस्थिरता है। पिछले वर्षों में सरकारों के लगातार बदलने, राजनीतिक दलों के बीच आपसी खींचतान, भ्रष्टाचार और रोजगार तथा विकास से जुड़ी समस्याओं के कारण जनता के एक बड़े हिस्से में निराशा का भाव पैदा कर दिया है।
भारत नेपाल के संबंध में सावधानी से कदम उठा रहा है। भारत नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करते हुए उसके आंतरिक धार्मिक या राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह और भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के बीच 10 अगस्त 2026 को काठमांडू के सिंहदरबार स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में एक बेहद महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक हुई। बालेन शाह के मार्च 2026 में पद संभालने के बाद किसी भी विदेशी राजनयिक के साथ यह उनकी पहली ‘वन-टू-वन’ मुलाकात है।
नेपाल में शांति रहे यह भारत के हित में है और भारत इसी दिशा में काम भी कर रहा है। भारत के लिए पड़ोसी देश नेपाल जिसके साथ खुली सीमा वाले है वहां सांप्रदायिक हिंसा के बढ़ने का असर भारत के आंतरिक स्थिति पर पड़ सकता है और यह स्थिति दोनों देशों में किसी के लिए भी अच्छा नहीं है।











