लखनऊ के थाना विभूतिखण्ड अंतर्गत साइबर हाइट बिल्डिंग के फ्लैट संख्या 420ए, जलवा बार के सामने संचालित एक संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर पकड़ा गया। इस कार्रवाई में ऐसे संगठित साइबर गिरोह का खुलासा हुआ है, जो तकनीकी संसाधनों एवं इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग कर विदेशी नागरिकों, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के नागरिकों को निशाना बनाकर साइबर धोखाधड़ी कर रहा था। पुलिस ने 4 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है तथा साइबर अपराध में प्रयुक्त बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण एवं महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए।
फर्जी कॉल सेंटर चलाकर विदेशी नागरिकों को बनाया जाता था शिकार
अभियुक्त सूरज त्रिपाठी वर्ष 2012-13 में अहमदाबाद में डायलर के रूप में कार्य करते हुए कॉल सेंटर के कार्य से परिचित हुआ। इसके बाद टेलीग्राम पर कॉल सेंटर से संबंधित समूहों से जुड़कर विदेशी नागरिकों को ठगने हेतु फर्जी कॉल सेंटर संचालन का षड्यंत्र रचा। तकनीकी सहयोग हेतु आकाश अरुण दत्ता उर्फ रिक्की को तथा प्रबंधन एवं संचालन हेतु अपने रिश्तेदारों विवेक पाण्डेय व राहुल त्रिपाठी को साथ लिया।
फर्जी Apple Customer Support वेबसाइट के जरिए की जाती थी ठगी
गूगल पर विज्ञापन (AdSense) के माध्यम से “Apple Customer Support” की फर्जी वेबसाइट को प्रमोट किया जाता था, जिससे खोज करने पर फर्जी नंबर “000 800 100 9009” पहले परिणाम के रूप में प्रदर्शित होता था।
इस नंबर पर कॉल करने वाले विदेशी नागरिकों की कॉल VOIP सिस्टम के माध्यम से कॉल सेंटर पर पहुँचती थी, जहाँ प्रथम स्तर के कॉलर पीड़ित का डेटा वेरीफाई कर कॉल को “क्लोजर” के पास स्थानांतरित करते थे।
अमेरिकी अधिकारी बनकर करते थे धन उगाही
क्लोजर द्वारा भिन्न-भिन्न स्क्रिप्ट के माध्यम से—कभी लालच देकर, तो कभी अमेरिकी सरकारी अधिकारी (जैसे FTC, सुप्रीम कोर्ट) बनकर—पीड़ितों को धमकाकर धन उगाही की जाती थी।
धनराशि अमेरिका में बैठे गिरोह के साथियों द्वारा गिफ्ट कार्ड, सोना या नगदी के रूप में प्राप्त कर हवाला के माध्यम से लखनऊ में सूरज त्रिपाठी व उसके साथियों तक पहुँचाई जाती थी। पकड़ में न आने हेतु गिरोह समय-समय पर अपना मोडस ऑपरेंडी एवं स्क्रिप्ट बदलता रहता था।
कॉलर एजेंटों को नहीं थी ठगी की पूरी जानकारी
सामान्य कॉलर/एजेंटों को केवल यह बताया जाता था कि वे एक वैध अमेरिकी कंपनी की कस्टमर सपोर्ट सेवा में कार्यरत हैं। वास्तविक ठगी की जानकारी उन्हें नहीं दी जाती थी।
संपूर्ण लेन-देन नगद में होता था। कॉल टेकर/एजेंटों को भी नगद भुगतान किया जाता था।
35 वर्क स्टेशनों पर काम कर रहे थे एजेंट, कई राज्यों और नेपाल से की गई थी भर्ती
पुलिस को मौके पर कुल 35 वर्क स्टेशनों पर 35 कॉलर/एजेंट कार्यरत मिले, जिनका क्रमवार नाम-पता दर्ज कर उनके लैपटॉप एवं मोबाइल जब्त किए गए।
इन 35 एजेंटों में सर्वाधिक 10 एजेंट उत्तराखण्ड राज्य से, इसके पश्चात 9 एजेंट महाराष्ट्र राज्य से पाए गए। इसके अतिरिक्त गुजरात एवं नागालैण्ड राज्य से 3-3 एजेंट, असम एवं मणिपुर राज्य से 2-2 एजेंट तथा पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश राज्यों एवं नेपाल देश से 1-1 एजेंट कार्यरत पाया गया।
देशभर और नेपाल तक फैला था साइबर गिरोह का नेटवर्क
इस प्रकार यह गिरोह विभिन्न राज्यों एवं नेपाल तक से युवक-युवतियों की भर्ती कर संगठित रूप से संचालित किया जा रहा था।











